(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
बारिश के पानी से हो सकती है ये ख़तरनाक बीमारी
इस बीमारी के केस तेज़ी से बढ़ रहे हैं.


बारिश का मौसम आते ही बौछार शुरू जाती है बीमारियों की. मलेरिया, डेंगू , टाइफाइड वगैरह. पर एक बीमारी ऐसी है जिसके बारे में हो सकता है आपने पहले कभी सुना ही न हो. पर इसके केसेज भयानक तरीके से बढ़ रहे हैं. इस बीमारी का नाम है लेप्टोस्पायरोसिस.
कुछ हफ़्ते पहले तेज़ बारिश की वजह से मुंबई में लेप्टोस्पायरोसिस को लेकर अलर्ट घोषित कर दिया गया. जहां-जहां भी बारिश ज़्यादा होती है, ये बीमारी शुरू हो जाती है. वजह है बारिश से जमा हुआ पानी. डेंगू या मलेरिया की तरह इसमें मच्छरों का कोई रोल नहीं है. बारिश का पानी ही काफ़ी होता है. इसलिए अगर आपको सड़कों पर जमा हुए पानी में छप-छप करना पसंद है तो एकदम न करें. पिछले तीस सालों में लेप्टोस्पायरोसिस के केसेज देश में तेज़ी से बढ़े हैं. दक्षिण भारत में इस बीमारी का पॉजिटिविटी रेट है 26.6 प्रतिशत. नॉर्थ इंडिया में 8.3 प्रतिशत. पश्चिम भारत में 3.5 प्रतिशत. पूर्वी भारत में 3.1 प्रतिशत और सेंट्रल भारत में 3.3 प्रतिशत.
दिक्कत ये है कि जब लोगों को बीमारी का नाम ही नहीं पता तो वो लक्षण कैसे पहचान पाएंगे. तो सबसे पहले ये जान लेते हैं लेप्टोस्पायरोसिस क्या है और ये बीमारी कैसे होती है.
लेप्टोस्पायरोसिस बीमारी क्या और क्यों होती है?ये हमें बताया डॉक्टर विक्रांत शाह ने.

-वाइल्ज़ बीमारी (Weil's Disease) लेप्टोस्पायरोसिस (leptospirosis) का एक कॉम्प्लिकेटेड फॉर्म है.
-लेप्टोस्पायरोसिस बीमारी बारिश के मौसम में बहुत आम है.
-इसमें बीमार चूहों का पेशाब पानी में मिल जाता.
-अगर स्किन पर किसी तरह की चोट है और आप इस पानी के संपर्क में आए तो ये इन्फेक्शन स्किन से अंदर चला जाता है.
-इन चोटों के ज़रिए इन्फेक्शन को शरीर के अंदर जाने की एंट्री मिल जाती है.
-इससे आप बीमार पड़ जाते हैं.
-उस बीमारी का नाम है लेप्टोस्पायरोसिस.
-लेप्टोस्पायरोसिस के दो प्रकार देखे जाते हैं.
-इक्टेरिक लेप्टोस्पायरा और एनइक्टेरिक लेप्टोस्पायरा.
-एनइक्टेरिक का मतलब हुआ पीलिया नहीं होने वाला लेप्टोस्पायरा (बैक्टीरिया).
-इक्टेरिक लेप्टोस्पायरा (बैक्टीरिया) यानी पीलिया होने वाला.
-जो पीलिया नहीं होने वाला लेप्टोस्पायरा (बैक्टीरिया) होता है वो माइल्ड होता है.
लक्षण-इसके लक्षण तीन चीज़ों का संगम होते हैं.
-तेज़ बुखार आता है.
-आंखें बहुत लाल हो जाती हैं.
-घुटनों के नीचे वाले हिस्से में पीछे की तरह बहुत ज़्यादा दर्द होता है.
-अगर पीलिया हो गया तो ये बहुत सीरियस हो सकता है.
-इसको वाइल्ज़ (वील्स) बीमारी कहा जाता है.
-इसमें तीन चीज़ें दिखती हैं.
-पीलिया होता है.
-किडनी फ़ेल हो सकती है.
-शरीर में ब्लीडिंग हो सकती है.
-सीरियस केस में खांसी में खून आता है.
-रेस्पिरेटरी फेलियर हो जाता है.
-ये जानलेवा हो सकता है.
-वाइल्ज़ (वील्स) बीमारी लेप्टोस्पायरोसिस का सीरियस फॉर्म है.
इलाज-अगर कहीं पानी जमा हो रखा है तो वहां आना जाना अवॉइड करें.
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-जाना अगर ज़रूरी है तो गम बूट्स पहनें या पूरी सावधानी रखें.
-अगर पैर में ज़ख्म है तो जमा हुए पानी में न जाएं.
-लक्षण दिखने पर डॉक्टर को ज़रूर दिखाएं.
-अगर फौरन इलाज शुरू हो जाए तो ये आसानी से ठीक हो सकता है.
-कई बार हम 2-3 दिन के बुखार के बाद डॉक्टर के पास जाते हैं.
-अगर डॉक्टर को शक है कि लेप्टोस्पायरोसिस है तो 2 तरह के टेस्ट किए जाते हैं.
-जो आम टेस्ट है उसे IgM लेप्टोस्पायरा कहा जाता है.
-पर वो सात दिन के बुखार के बाद टेस्ट किया जाता है.
-अगर ये टेस्ट पहले, दूसरे या तीसरे दिन करते हैं तो टेस्ट नेगेटिव आता है.
-पर अगर 7 दिन से पहले डायग्नोसिस करवाना ज़रूरी है.
-तो आपको लेप्टोस्पायरा का टेस्ट PCR के ज़रिए करना चाहिए.
-पानी अच्छी मात्रा में लें.
-बारिश से जमा हुआ पानी आसपास है तो उसे अवॉइड करें.
-अगर ऐसे पानी में जा रहे हैं तो पूरा ख्याल रखें.
लेप्टोस्पायरोसिस क्या होता है, ये तो समझ में आ गया. अब अगर इस मौसम में आपको तेज बुखार, सिर दर्द, ठंड लगना, मांस पेशियों में दर्द, उल्टी, पीलिया, आंखें लाल होना, पेट में दर्द होना या दस्त जैसे लक्षण महसूस हो रहे हैं तो डॉक्टर से तुरंत मिलें और टेस्ट करवाएं. क्योंकि अगर इलाज सही समय पर न मिले तो ये सीरियस और जानलेवा हो सकता है.
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