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क्या है ट्रॉमा बॉन्डिंग जिसके चलते लोग 'टॉक्सिक' रिश्तों से नहीं निकल पाते?

इसमें विक्टिम और शोषण करने वाला - दोनों एक दूसरे पर निर्भर होते हैं. इसीलिए इस चक्र से निकलना बहुत मुश्किल होता है.

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विक्टिम ये मानता है कि शोषण करने वाला जो कर रहा है वो उसके भले के लिए कर रहा है.

*ये स्टोरी कुछ लोगों के लिए थोड़ी ट्रिगरिंग हो सकती है. पाठक अपने विवेक से काम लें.*

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हम अक्सर लोगों को ऐसे रिश्तों में देखते हैं, जिसमें हमें साफ़-साफ़ दिख रहा होता है कि एक इंसान, दूसरे इंसान का फ़ायदा उठा रहा है या उसका शोषण कर रहा है. तब हमारे मन में एक ही सवाल आता है -विक्टिम को आखिर दिख क्यों नहीं रहा कि उसके साथ गलत हो रहा है. या वो इस रिश्ते से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा. अब ये रिश्ता कोई भी हो सकता है. रोमैंटिक, पारिवारिक या ऑफिशियल.

जब हमारा कोई दोस्त हमें बताता है कि उसका पार्टनर या परिवार में कोई उसके साथ बुरा कर रहा है, तो हम छूटते ही उसे राय देते हैं कि मत सहो! छोड़ दो उसे. पर कुछ समय बाद आप वापस उस दोस्त को उसी इंसान के साथ देखते हैं जो उसको नुकसान पहुंचा रहा था. जिसकी बुराई आपका दोस्त आपसे कर रहा था. ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसे ज़हरीले रिश्तों से निकलना इतना मुश्किल क्यों है? क्यों विक्टिम बार-बार शोषण करने वाले के पास वापस चला जाता है. इसके पीछे वजह है ट्रॉमा बॉन्डिंग. क्या है ये? जानिए एक्सपर्ट्स से.

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ट्रॉमा बॉन्डिंग क्या होती है?

ये हमें बताया डॉक्टर ज्योति कपूर ने.

Dr. Jyoti Kapoor – India's Top Psychiatrists | Mental Wellness
डॉक्टर ज्योति कपूर, सीनियर साइकॉलोजिस्ट एंड फाउंडर, मनस्थली

ट्रॉमा बॉन्डिंग दो शब्दों के मेल से बना है - ट्रॉमा और बॉन्डिंग. ये एक तरह का डिसफंक्शनल कनेक्शन है, जो अब्यूज़ करने वाले और उसके विक्टिम के बीच देखा जाता है. अब्यूज़ का मतलब होता है शोषण. ये शोषण भावनात्मक, शारीरिक या सेक्शुअल हो सकता है. जो इंसान अब्यूज़ का शिकार होता है, वो आमतौर पर शोषण करने वाले पर निर्भर होता है.

ट्रॉमा बॉन्डिंग एक डिसफंक्शनल अटैचमेंट है. इसके चलते हमारे नर्वस सिस्टम में बदलाव आता है. हॉर्मोनल बदलाव आते हैं क्योंकि ऐसा उस स्थिति में होता है जहां शोषण एक साइकिल की तरह चलता रहता है. ऐसे में दिमाग उस स्थिति में अडजस्ट करने की कोशिश करता है. अडजस्ट करने के लिए दिमाग शोषण करने वाले की एक पॉजिटिव छवि बनाने लगता है क्योंकि ये इस सिचुएशन में विक्टिम को सर्वाइव करने में मदद करता है. लेकिन कुछ समय के बाद जब इसके साइकोलॉजिकल लक्षण दिखने लगते हैं तो विक्टिम को एहसास होता है कि कुछ गड़बड़ है. कई बार दूसरे लोग इसे पहचानते हैं. जब इस बात का एहसास हो जाता है कि आप ट्रॉमा बॉन्डिंग के शिकार हैं तब इस तरह के रिश्ते से निकलना इलाज का हिस्सा होता है.

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आमतौर पर शोषण करने वाला और विक्टिम एक दूसरे पर निर्भर होते हैं.
लक्षण

इसका विक्टिम कोई भी हो सकता है. इसमें विक्टिम को लगता है कि गलती उसकी है. इसलिए विक्टिम ख़ुद को दोष देता है और उसके साथ जो हो रहा है, उसके लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानता है. साथ ही शोषण करने वाले की गलतियों पर पर्दा डालता है. जब दूसरे लोग शोषण करने वाले की गलती निकालते हैं तो विक्टिम बहाना बनाकर उसको कवर करता है. विक्टिम के मन में एक आशा रहती है कि शोषण करने वाला अपना रवैया बदल लेगा. 

विक्टिम ये मानता है कि शोषण करने वाला जो कर रहा है वो उसके भले के लिए कर रहा है. आमतौर पर शोषण करने वाला और विक्टिम एक दूसरे पर निर्भर होते हैं. इसमें एक साइकिल जैसा पैटर्न फॉलो होता है. इसमें पहले शोषण होता है और उसके बाद शोषण करने वाला ही विक्टिम को परेशानी से बाहर निकालता है. विक्टिम को लगता है कि शोषण करने वाला उसकी मदद कर रहा है या बेहतर महसूस करवाने की कोशिश कर रहा है. एक पैटर्न के चलते इसको 7 स्टेज में बांटा गया है. इस शोषण के चलते विक्टिम न सिर्फ़ शोषण करने वाले से आईडेंटिफाई करने लगता है, बल्कि उसे अपना रक्षक भी मानने लगता है. वो एक तरह की आशा में जीने लगता है कि वो इंसान बदल जाएगा और उसे नुकसान नहीं पहुंचाएगा.

हर उस इंसान, जिसके मन में ये सवाल आता है कि वो टॉक्सिक रिलेशन से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा, उसका जवाब ट्रॉमा बॉन्डिंग है. जिसका एक बड़ा हिस्सा है निर्भरता. ये किसी भी चीज़ की निर्भरता हो सकती है. इसलिए ट्रॉमा बॉन्डिंग के लक्षणों को पहचानिए. अपनी दिक्कत अपने परिवार या दोस्तों से शेयर करें. अगर आपके साथ ऐसा हो रहा है तो आप प्रोफेशनल मदद ले सकते हैं. 

(यहां बताई गईं बातें, इलाज के तरीके और जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से जरूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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