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चुड़ैल बताकर हमने 156 औरतों को मार डाला

ये औरत चुड़ैल है. बच्चों को इससे दूर रखो और हो सके तो इसे मार डालो. वरना यह सबको खा जाएगी. यही है अंधविश्वासी भीड़ का त्वरित न्याय!

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फोटो - thelallantop
'ये औरत चुड़ैल है. जादू-टोना करती है. बच्चों को इससे दूर रखो और हो सके तो इसे मार डालो. वरना यह अपने पति को खा गई, बाकी को भी खा जाएगी.'

...और ऐसा कहते हुए गांव वालों की भीड़ एक महिला के घर में घुसती है और उसे मार डालती है. यह सीन थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ भारत में कई बार-कई जगह दोहराया जा चुका है. इसके लिए अंग्रेजी में शब्द है- 'विच हंट'. यानी 'चुड़ैल बताकर की गई हत्या.' अगर आपको लगता है कि हम एक समाज के तौर पर बहुत सभ्य हो गए हैं तो यह खबर पढ़िए. जानकर हैरानी होगी कि 2014 में देश में 156 औरतों को 'चुड़ैल' बताकर मार डाला गया. इनमें सबसे ज्यादा हत्याएं झारखंड में हुईं. 2012 से 2014 के बीच झारखंड में ऐसे 127 कत्ल हुए. यही है अंधविश्वासी भीड़ का त्वरित न्याय! एक सवाल के जवाब में राज्यमंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी ने बुधवार को राज्यसभा में ये आंकड़े बताए.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक:

झारखंड में विच हंट की घटनाएं 2012: 26 2013: 54 2014: 47

2014 में पूरे देश में ऐसी 156 हत्याएं हुईं. किस प्रदेश में कितनीं?

झारखंड: 47 (सबसे ज्यादा, करीब 30 फीसदी) ओडिशा: 32 हत्याएं मध्य प्रदेश: 24 हत्याएं छत्तीसगढ़: 16 हत्याएं
झारखंड और ओडिशा में सबसे ज्यादा औरतों का चुड़ैल बताकर कत्ल किया गया. दोनों प्रदेशों में ट्राइबल आबादी काफी है.
अपेक्षाकृत रूप से सुरक्षित दिल्ली में बैठे हुए हम अपराध को जिस नजर से देखते हैं, उसमें इसको भी शामिल कर लीजिए. यूरोप में 18वीं सदी तक औरतों को 'चुड़ैल' घोषित किया जाता रहा. एक अनुमान के मुताबिक, भारत में 2000 से 2012 तक 2100 हत्याएं हुईं जिनके 'विच हंट' से जुड़े होने का शक है. जाहिर है, इनमें से ज्यादातर महिलाएं थीं.
और ज्यादा पीछे क्यों जाएं. 29 और 30 जून 2015 को ISIL (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लैवेंट) ने दो औरतों का सिर कलम कर दिया, क्योंकि वे कथित तौर पर जादू-टोना करती थीं. उनके पतियों को भी मार डाला गया.
मान लीजिए कि किसी औरत की दिमागी हालत खराब हो जाए, तो क्या उसे समाज से वैसा बर्ताव नसीब होगा, जैसा एक पागल पुरुष को मिलता है. एक मेल-सेंट्रिक दुनिया में आदमी और औरत का पागल होना दो अलग चीजें हैं. औरत सिर्फ हमारे यहां नहीं, पूरी दुनिया में हाशिए पर रही है. अपने यहां तो खास तौर से उसकी सेक्शुएलिटी को लेकर बेहद नैतिकतावादी रवैया रहा है और समाज हमेशा इसकी 'रक्षा' के लिए फिक्रमंद रहा है. इसमें औरत की सेक्शुअल आजादी और यौन सुख की जगह बहुत बाद में बन पाई. इसलिए एक 'विधवा' या 'पागल' औरत 'वल्नरेबल' समझी गई. इसलिए उसका पागल या विधवा होना, हमेशा उसके लिए दोहरा विनाश लेकर आया. एक चीज होती थी 'फीमेल हिस्टीरिया'. पहले बीमारी मानते थे इसे. इसके लक्षण थे औरतों का बेहोश होना, नर्वस होना, उनकी सेक्शुअल इच्छाएं बढ़ जाना, जांघों के बीच नमी होना. सांस पूरा नहीं आता था, भूख नहीं लगती थी. बाद में पता लगा कि ज्यादातर मामलों में सेक्शुअल फ्रस्टेशन ही इसकी वजह थी. तब महिलाओं के ऑर्गेज्म का कॉन्सेप्ट इस मेल-सेंट्रिक समाज ने जाना ही नहीं था. तो महिलाएं वजाइनल इंटरकोर्स के जरिये अपना स्ट्रेस नहीं घटा पाती थीं. तब डॉक्टरों ने 'क्लिटोरियल' ऑर्गेज्म का सुझाव दिया. तो मूल दिक्कत कहीं और थी और आप उसे बीमारी समझते रहे. 20वीं सदी तक फीमेल हिस्टीरिया बीते हुए कल की बात हो चुकी थी और 'वायब्रेटर्स' पूरी दुनिया के बाजारों में आ चुके थे. इस खबर को आप ऐसे भी देखिएगा. गांवों में ही औरतें ज्यादा पागल या चुड़ैल घोषित की जाती हैं? कहीं हम कुछ मिस तो नहीं कर रहे?

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