आपने नरेंद्र मोदी के दावे सुने. वो कह रहे हैं कि प्राइवेट अस्पतालों में दुनिया में सबसे सस्ता यानी सिर्फ 250 रुपये का टीका लगाया जा रहा है. ये वीडियो इसी साल 7 मार्च की तारीख़ का है. लेकिन लगभग डेढ़ महीने के समयांतराल में चीज़ें बदल गयी हैं. कैसे? 21 अप्रैल को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने केंद्र, राज्यों और निजी अस्पतालों के लिए अपनी कोरोना वैक्सीन कोविशील्ड के दाम तय किए. सीरम ने राज्य सरकारों को 400 रुपये प्रति डोज और प्राइवेट अस्पताल को 600 रुपये प्रति डोज़ पर अपनी कोरोना वैक्सीन कोविशील्ड मुहैया कराने का ऐलान किया. सीरम इंस्टिट्यूट की इस रेट लिस्ट में केंद्र सरकार के लिए प्रति डोज़ का दाम नहीं बताया गया. लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने ऐलान किया है कि उन्हें कोविशील्ड और कोवैक्सीन दोनों ही 150 प्रति डोज़ के दाम पर मिल रही हैं.
और जब सीरम इंस्टिट्यूट राज्य और प्राइवेट अस्पताल को क्रमशः 400 और 600 रुपए प्रति डोज़ पर कोरोना की वैक्सीन दे रहे हैं, तो ज़ाहिर है कि जिस मूल्य पर जनता को वैक्सीन मिलेगी, वो इससे ज़्यादा ही होगा. और ठीक इसी जगह पर नरेंद्र मोदी का ये दावा कि हम प्राइवेट अस्पतालों में भी सबसे सस्ती वैक्सीन दे रहे हैं, निष्प्रभावी साबित हो जाता है. लेकिन कहानी बस इतनी नहीं है. बात इससे आगे जाती है.
कोविडशील्ड दुनिया में सबसे महंगी भारत में?
क्या आपको पता है सीरम इंस्टिट्यूट दुनियाभर के कई देशों को वैक्सीन की सप्लाई कर रही है, और उन सभी देशों में सीरम इंस्टिट्यूट की वैक्सीन का एक डोज़ भारत में मिल रहे एक डोज़ के दाम से काफ़ी कम है.
जी. इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बर का रूख कर रहे हैं. इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यूरोपीय यूनियन के देश कोरोना की वैक्सीन के लिए 160 रुपये से 260 रुपये तक प्रति डोज़ के हिसाब से पेमेंट कर रहे हैं. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के मुताबिक़ ब्रिटेन प्रति डोज़ के लिए करीब 225 रुपये और अमेरिका करीब 300 रुपये का पेमेंट कर रहा है. ब्रिटेन और अमेरिका ये पेमेंट डायरेक्ट एस्ट्राज़ेनेका को कर रहे हैं न कि सीरम इंस्टिट्यूट को. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ ब्राजील करीब 240 रुपये प्रति डोज़ के हिसाब से पैसे दे रहा.
न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट मुताबिक़ बांग्लादेश सीरम इंस्टिट्यूट को प्रति डोज़ करीब 300 रुपये दे रहा है. हालांकि बीबीसी की एक रिपोर्ट में बांग्लादेश के स्वास्थ्य अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि प्रति डोज़ की कीमत करीब 375 रुपये की बन रही है. इसमें बांग्लादेशी वैक्सीन डिस्ट्रीब्यूटर बेक्सिम्को का मार्जिन भी शामिल हैं.
इसके अलावा यूनिसेफ के कोविड वैक्सीन मार्केट डैशबोर्ड के मुताबिक़, दक्षिण अफ्रीका और सऊदी अरब ने सीरम इंस्टिट्यूट को प्रति डोज़ करीब 395 रुपये के हिसाब से पेमेंट किया है.
फ़र्क़ साफ़ दिख रहा है. राज्य सरकारों को जिस क़ीमत पर सीरम इंस्टिट्यूट वैक्सीन मुहैया करा रहा है, दुनिया के कई देशों को वही वैक्सीन उससे काफ़ी कम क़ीमत पर मिल रही है. प्राइवेट अस्पतालों के दाम से अगर अन्तर्राष्ट्रीय रेट कार्ड की तुलना करें तो ये फ़र्क़ और भी बड़ा हो जाता है. साफ़ है कि ग्लोबल मार्केट में कोविशील्ड की ये सबसे अधिक क़ीमत है. इसी दाम में प्राइवेट अस्पताल अपना प्रॉफ़िट का मार्जिन जोड़ देते हैं, तो ये अंतर और भी बड़ा हो जाता है.
केंद्र सरकार के तमाम आश्वासनों का क्या?
अब केंद्र सरकार की बात करते हैं. वो भी तब जब केंद्र सरकार ने संसदीय समिति के सामने ये वादा किया हो कि सरकार वैक्सीन का दाम 250 प्रति डोज़ से अधिक नहीं होने देगी. जी. दैनिक भास्कर में छपी ख़बर के मुताबिक़ केंद्र सरकार ने प्राइवेट अस्पतालों में वैक्सीनेशन शुरू करने के पहले समिति के सामने वादा किया था कि इन अस्पतालों में 250 रुपए प्रति डोज़ ही लिए जाएंगे. वैक्सीन के लिए बजट में अलग से 35 हज़ार करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे. आशा थी कि इससे वैक्सीन के 150 करोड़ डोज़ ख़रीदे जा सकेंगे. जिससे 75 करोड़ की आबादी को वैक्सीन के दो डोज़ लगाकर वैक्सीनेट किया जा सकेगा.
बजट के एक महीने बाद संसद की स्थायी समिति में हुए विचार विमर्श के दौरान यह बात खुलकर सामने आई कि कोविड टीकाकरण के लिए राज्यों को अनुदान मांगों के तहत सीधे ये राशि उपलब्ध कराई जाएगी. संसदीय समिति ने इस पर आपत्ति ज़ाहिर की. तर्क दिया गया कि कोविड वैक्सीन की नोडल एजेंसी स्वास्थ्य मंत्रालय है. लेकिन मार्च 2021 के शुरुआती हफ़्ते, जिस समय ये पूरा उलटफेर हो रहा था, ये साफ़ नहीं था कि वैक्सीन के मूल्य के अलग-अलग खांचे तय किए जाएँगे, वो भी वैक्सीन बनाने वाली कम्पनी द्वारा.
ऐसे में जब राज्यों को ख़ुद से ही वैक्सीन ख़रीदनी है तो केंद्र के 35 हज़ार करोड़ रुपयों का क्या होगा, जो बजट में अलग से आवंटित किए गए हैं.

अदार पूनावाला सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के सीईओ हैं. (तस्वीर: पीटीआई)
सीरम इंस्टिट्यूट क्या कह रही?
अब वैक्सीन के दामों पर जो इतनी बहस है, उस पर सीरम इंस्टिट्यूट की ओर से सफ़ाई आयी है. सीरम इंस्टिट्यूट ने अपने बयान में कहा है कि वैक्सीन के ग्लोबल रेट्स की तुलना करना ग़लत है. कोविशील्ड अभी भी सबसे ज़्यादा सस्ती कोरोना वैक्सीन है. सीरम ने कहा है कि शुरुआती दाम कम रखा गया था क्योंकि वैक्सीन पाने वाले देशों ने एडवांस फ़ंडिंग की थी. भारत समेत सभी देशों के लिए वैक्सीन का दाम सबसे कम था. लेकिन अपने बयान में सीरम इंस्टिट्यूट ने ये नहीं बताया है कि भारत के अलावा दूसरे देशों को इस समय किस दाम पर फ़ंडिंग की जा रही है, या आने वाले समय में दूसरे देशों में वैक्सीन के दाम क्या होंगे?
सीरम इंस्टिट्यूट ने आगे कहा है कि मौजूदा परिस्थिति गम्भीर है. वायरस म्यूटेट कर रहा है. हमें पता नहीं कि आगे परिस्थितियां क्या होंगी. ऐसे में हमें वैक्सीन का प्रोडक्शन करते रहना होगा, साथ ही ये भी सुनिश्चित करना होगा कि हम वैक्सीन के उत्पादन की अपनी क्षमता को बढ़ाएँ, लोगों की जान बचाएं और इस महामारी का मुक़ाबला करें.
सीरम ने कहा है कि प्राइवेट अस्पतालों को 600 रुपए प्रति डोज़ में वैक्सीन की सीमित मात्रा दी जाएगी. साथ ही ये तर्क गिनाया है कि वैक्सीन का ये दाम कोरोना के ट्रीटमेंट में इस्तेमाल हो रहे अन्य संसाधनों ने बेहद कम है. इस जगह पर भी सीरम ने ये नहीं बताया है कि वैक्सीन के दो डोज़ मिलाकर अस्पताल को 1200 रुपए की लागत आएगी, प्रॉफ़िट का मार्जिन जोड़ दें तो ये मूल्य वैक्सीन लगवाने वाले व्यक्ति के लिए शायद और ज़्यादा हो जाता है.

सीरम ने कहा है कि प्राइवेट अस्पतालों को 600 रुपए प्रति डोज़ में वैक्सीन की सीमित मात्रा दी जाएगी.
सीरम के बयान से अलग कई राज्यों ने वैक्सीन मुफ़्त में देने की घोषणा की है. यूपी, मध्य प्रदेश, झारखंड, केरल, तेलंगाना, बिहार, असम और छत्तीसगढ़ की सरकारों के नाम इस फ़ेहरिस्त में लिए जा सकते हैं. बीजेपी ने कहा है कि बंगाल में चुनाव जीतेंगे तो फ़्री में वैक्सीन देंगे, लेकिन ममता बनर्जी ने भी ये ऐलान कर दिया है कि 1 मई से वैक्सीन फ़्री में लगायी जाएगी.
क्या वैक्सीनेशन का स्ट्रक्चर इतना मुस्तैद है कि हम सभी को वैक्सीन 1 मई से लगा सकें?
हमने कुछ अधिकारियों से बात की. महाराष्ट्र में काम कर रहे एक पूर्व स्वास्थ्य अधिकारी बताते हैं कि वैक्सीनेशन के इस स्ट्रक्चर में ख़ास दिक़्क़त नहीं होती. उनका कहना था कि वैक्सीन लगवाने आने वाली भीड़ में से लगभग 30 प्रतिशत लोग प्राइवेट अस्पतालों में ज़्यादा पैसा देकर वैक्सीन लगवा लेंगे. जुगत बाक़ी को सरकारी व्यवस्था में लगाने की है.
वहीं यूपी के एक अधिकारी बताते हैं कि 1 मई से वैक्सीनेशन ओपन करना समस्या नहीं है. हम वैक्सीनेशन कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं. लेकिन इस समय हमें कोरोना की दूसरी लहर में केसों से लड़ने की ज़रूरत है. क्योंकि स्वास्थ्यकर्मियों का एक बड़ा हिस्सा इस लहर में लोगों की जान बचाने में जुटा हुआ है. हम लोगों को बेड नहीं दे पा रहे हैं, ऐसे में प्रभावी तरीक़े से वैक्सीन कैसे दें, बात इस पर आती है. और इसका इलाज ढूंढना है.
दक्षिण भारत के बारे में बात करते हुए अधिकारी बताते हैं कि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में वैक्सीनेशन की समस्या इतनी विराट नहीं भी हो सकती है. क्योंकि अंतर व्यवस्था का है, जो संभवत:, तुलनात्मक रूप से कुछ ज़्यादा मज़बूत है. अब देश भर में वैक्सीनेशन का स्वरूप कैसा होना चाहिए? कैसे बड़ी आबादी को कम समय में वैक्सीन दी जा सकती है?
देश को वैक्सीन चाहिए और इलाज भी चाहिए. देश के हर तबके के लिए इलाज और बचाव सुलभ को ये भी सुनिश्चित करना होगा. जो तंत्र 8 चरणों के चुनाव करा सकता है, ज़ाहिर है उसी तंत्र के पास इतनी क्षमता ज़रूर है कि वो नागरिकों को प्रभावी ढंग से वैक्सीनेट कर सकता है.

















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