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यात्रीगण कृपया ध्यान दें, ये रेलवे स्टेशन बिना नाम का है

रैना गांवों के चक्कर में रैना बीती जाए, स्टेशन का नाम न पड़ पाए.

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फोटो - thelallantop

ये ट्रेन वहां जाएगी क्या? कहां? अरे वहीं, जहां पीला सा बोर्ड लगा है. नाम तो बताओ स्टेशन का. नाम तो नहीं पता. क्योंकि स्टेशन बेनाम है. पागल हो क्या?

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ये स्टेशन दोनों गांवों के बीच पड़ता है. तो हमारी सलाह है कि क्यों न इसका नाम रैना रख लिया जाए. कित्ता प्यारा लगेगा ये सुनना कि रैना पर कोई मेरा इंतजार कर रहा है.

कसम धरती माता की. बिलकुल पागल नहीं हैं हम. एक ऐसा स्टेशन है अपने इंडिया में. जिसका नाम नहीं है. बस एक पीला बोर्ड लगा है. नाम लिखा जाना बाकी है. पेंटर बाबू छुट्टी पर नहीं गए हैं. एक्चुली इस स्टेशन का ऑफिशियली नाम अब तलक धरा ही नहीं गया है. पश्चिम बंगाल के बर्दवान से 35 किलोमीटर दूर है ये स्टेशन. सालों पहले बन गया था. लेकिन नाम की लड़ाई अब भी जारी है. दो गांव हैं. रैना गांव और रैनागढ़. एक गांव के लोग कहते हैं हमारे गांव के नाम पर स्टेशन का नाम धरो. तो दूजे गांव वाले कहते हैं हमारे गांव के नाम पर. रैना गांवों के इसी चक्कर में रैना बीती जाए, स्टेशन का नाम न पड़ पाए. इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक, इस स्टेशन में अच्छे खासे लोगों की भीड़ रहती है. ट्रेन आती है. लोग पानी भरने या 'यूरिया' गिराने के लिए उतरते हैं तो पाते हैं कि स्टेशन का कोई नाम ही नहीं है. नामकरण का ये मामला अब प्रभु के हाथ में है. रेलवे मिनिस्टर सुरेश प्रभु के हाथ में. बताते हैं कि पुकारने वाले कुछ लोग इसे रैनागढ़ के नाम से जानते थे. लेकिन 200 मीटर सरकाकर रेलवे वालों ने गांव बनाया तो नाम को लेकर बवाल शुरू हो गया. ये स्टेशन बांकुरा-दामोदर रूट पर है. अच्छा यहां टिकट अब भी रैनागढ़ छप कर ही मिल रहा है. पर ये नाम सिर्फ टिकट तक ही सीमित है. लोकल लोग सुरेश प्रभु से चाहते हैं कि जल्दी से नाम पड़वाएं इस स्टेशन का.

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