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ज्ञानवापी मस्जिद में मिली जिस आकृति को शिवलिंग कहा जा रहा, उसका वीडियो सामने आ गया

वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर वजूखाने में शिवलिंग मिलने के दावे के बीच एक वीडियो सामने आया है. वीडियो को लेकर कहा जा रहा है कि इसमें उस कथित शिवलिंग को देखा जा सकता है

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shivling gyanwapi

वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर वजूखाने में शिवलिंग मिलने के दावे के बीच एक वीडियो सामने आया है. वीडियो को लेकर कहा जा रहा है कि इसमें उस कथित शिवलिंग को देखा जा सकता है, जिसके मिलने पर हिंदू पक्ष के वकीलों और समर्थकों में खासा उत्साह है. इंडिया टुडे/आजतक के पास इस वीडियो की फुटेज है. वहीं सोमवार 16 मई की शाम तक ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो गया. इसमें गोलाकार शेप में कटे पत्थर के बीच एक आकृति दिख रही है जो शिवलिंग से मिलती जुलती है.

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ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे के बाद हिंदू पक्ष के वकीलों ने इसके ही शिवलिंग होने का दावा किया था. लेकिन ये शिवलिंग ही है या कुछ और, ये 17 मई को अदालत की कार्रवाई के दौरान ही पता चलेगा. फिलहाल आप वीडियो देखिए.

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शिवलिंग नहीं फव्वारा?

दिनभर की गहमागहमी के बीच इस आकृति को लेकर एक और दावा सामने आया. कहा गया कि वजूखाने में बनी जिस चीज को शिवलिंग बताया जा रहा है, वो असल में वजूखाने का फव्वारा है. वीडियो में दिख रहे लोग इस चीज के साथ पूरे वजूखाने की सफाई कर रहे हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वजूखाने की साफ सफाई का यह वीडियो सोमवार 16 मई का नहीं है. मतलब इसका संबंध ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे से नहीं है. वीडियो को कुछ समय पहले का बताया जा रहा है. इसे लेकर अल्पसंख्यक कांग्रेस अध्यक्ष शाहनवाज़ आलम ने कहा है कि ये आकृति शिवलिंग नहीं, बल्कि फव्वारे के बीच का टूटा हुआ पत्थर है. शाहनवाज़ आलम ने आरोप लगाते हुए कहा,

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"ज़िला अदालत का सर्वे का आदेश ही पूजा स्थल अधिनियम 1991 के खिलाफ़ था. लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया. दो दिनों तक कथित सर्वे के बाद जब कुछ भी नहीं मिला तो तीसरे दिन सांप्रदायिक मीडिया के सहयोग से यह नाटक खड़ा किया जा रहा है."

शाहनवाज ने दावा किया कि मस्जिद में वज़ू करने के लिए बने पुराने फव्वारे के बीच में लगा पत्थर काफी पहले टूट गया था, जिसे अब शिवलिंग बताकर अफवाह फैलाई जा रही है. शाहनवाज ने कहा कि देश की क़रीब सभी पुरानी और बड़ी मस्जिदों में इस तरह के फव्वारे और उसके बीच में ऐसे ही पत्थर लगे हुए हैं. शाहनवाज़ आलम ने कहा,

"वर्ष 1937 में बनारस ज़िला न्यायालय में दीन मोहम्मद द्वारा दाखिल वाद में ये तय हो गया था कि कितनी जगह मस्जिद की संपत्ति है और कितनी जगह मंदिर की संपत्ति है. इस फैसले के ख़िलाफ़ दीन मोहम्मद ने हाई कोर्ट इलाहाबाद में अपील दाखिल की जो 1942 में ख़ारिज हो गई थी. इसके बाद प्रशासन ने बैरिकेटिंग करके मस्जिद और मंदिर के क्षेत्रों को अलग-अलग विभाजित कर दिया. वर्तमान वजूखाना उसी समय से मस्जिद का हिस्सा है."

इससे पहले हिंदू पक्ष ने दावा किया कि वजूखाने के तालाब, जिसे कुआं कहा जा रहा है, उसमें शिवलिंग बना देखा गया है. कोर्ट कमीशन के सदस्य और हिंदू पक्ष के पैरोकार सोहनलाल ने सर्वे के बाद मस्जिद के बाहर आकर कहा था,

"शिवलिंग…जिसका नंदी इंतजार कर रही थीं, वो मिल गया. शिवलिंग मिलने पर मस्जिद परिसर में हर हर महादेव के नारे लगने लगे."

चलते-चलते बता दें कि वजूखाने में कथित रूप से शिवलिंग मिलने का दावा किए जाने के बाद कोर्ट ने इस जगह को सील करने का आदेश दिया था.


 

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