अभी कुछ दिन पहले की बात है. एक खबर आई थी उत्तर प्रदेश से. वो ये कि वहां के प्रोफेसर को अपने
सब्जेक्ट की नॉलेज नहीं है. इकनॉमिक्स के प्रोफेसर को IMF की फुलफॉर्म तक नहीं पता थी. अंग्रेजी वाले प्रोफेसर साहेब को Evaluation की स्पेलिंग नहीं आती थी. खोपड़ी को सनका देने वाली ऐसी ही एक और खबर यूपी से आ टपकी है.
अलीगढ़ में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ओपन यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर आजकल चूरन बेच रहा है, वो भी खाना पचाने वाला. अब फैक्ट ये कि यूजीसी ने इस यूनिवर्सिटी को फेक बता कर इसका शटर 30 जून को गिरा दिया है. क्योंकि ये यूनिवर्सिटी उन 8 में से एक है, जिन्हें यूपी सरकार ने फर्जी बताकर बंद करने का ऐलान किया है. वैसे भी लोकल पीपुल इस यूनिवर्सिटी का न कभी बोर्ड देख पाए, न बिल्डिंग.
द टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, श्याम सुंदर शर्मा का खोखा अलीगढ़ में है. इनके पप्पा आयुर्वेदिक डॉक्टर थे. शर्मा जी को अपने
जइसा बनाना चाहते थे, पर शर्मा जी ग्रेजुएशन में लटक लिए. बीएससी की पढ़ाई खोपड़िया से ऊपर निलकने लगी. भाई साहब ने पता है, फिर क्या किया. आगरा यूनिवर्सिटी से समाज सेवा में सर्टिफिकेट कोर्स कर लिया. शर्मा जी बचपन से सुभाष चंद्र बोस के
बहुते बड़के वाले पंखा थे.
समाज सेवा की डिग्री, बोस जी के फैन और ऊपर से बीएससी फेल. इतना काफी था यूनिवर्सिटी खोलने के लिए. यूनिवर्सिटी ऐसे ही थोड़े न खुल जाती है. उसके लिए रुपया-पैसा, जमीन सब चाहिए होता है. और हां सबसे जरूरी तो एक बढ़िया सा झक्कास नाम. यूनिवर्सिटी के नाम को लेकर शर्मा जी के दिमाग में बहुत तरह का आइडिया गोते लगाने लगा. पहले तो जवाहरलाल नेहरू के नाम पर रखने का सोचा. पर फिर उनको फीलिंग आया कि इस नाम से तो बहुत यूनिवर्सिटी है. हम कुछ अलग और तूफानी सा नाम रखेंगे. फिर इनको ख्याल आया सुभाष चंद्र बोस और उनके लिए अपनी मुहब्बत का. भक्क से इंप्रेस हो गए और यूनिवर्सिटी का नाम उनके नाम पर ही रख दिया. सबकुछ होने के बाद जब बारी जमीन की आई तो इलाके के कलेक्टर बाबू ने जमीन देने से इंकार कर दिया. बिन बुलाए मुसीबत शर्मा जी के गले लटकने की कोशिश कर ही रही थी कि उन्होंने उसे खींच कर दूर फेंक दिया. सोचने लगे जमीन नहीं दिया मजिस्ट्रेट ने तो क्या, एक ही कमरे में यूनिवर्सिटी चला लेंगे. और साल 1990 में एक कमरे से यूनिवर्सिटी शुरू कर भी दी. शुरुआत में केवल पाचवीं तक के बच्चों को पढ़ाया जाता था. कुल 90 स्टूडेंट थे और कुछ गिने-चुने मास्टर. अच्छा भला चल रहा था सबकुछ कि अचानक एक दिन पुलिस शर्मा जी पर फर्जीवाड़ा करने का इल्जाम लगाकर उनको उठा ले गई. जमानत पर तो छूट गए बेचारे पर आजतक केस चल रहा है. और साथ में उनका कोर्ट-कचहरी का चक्कर भी. 26 साल हो चुके हैं इस मसले को. अब तो जज भी परेशान हो गया है और उसने शर्मा जी के केस को जल्दी समेटने का ऑर्डर दे डाला है.
शर्मा जी का कहना है कि जिस दिन कोर्ट-कचहरी से वो बरी हो जाएंगे अपने सपने को दोबारा से जीना शुरू करेंगे. और हां जो लोग सालों से उनके मजे ले रहे हैं उनके मुंह को भी बंद कर देंगे. अच्छे दिन आने वाले हैं....
2010 में यूजीसी का एक नियम आया था. जिसके मुताबिक, जिन लोगों के पास 10 साल से कम का टीचिंग इक्सपीरियंस है वो यूनिवर्सिटी का मुखिया नहीं बन सकता. इसपर शर्मा का कहना है कि ठीक है. मैं नहीं तो कोई और इस यूनिवर्सिटी का सरपंच बनेगा. यूनिवर्सिटी में ताला लगने के बाद शर्मा जी वेल्ले नहीं हैं. मस्त चूरन की दुकान खोल रखी है. और चूरन बेचने में लगे हैं. जिसका नाम भी उन्होंने ही रखा है. वो उन्हें
रोमांचक चूरन कहते है. चर्म रोग हो या हो गैस की दिक्कत, सब इनके रोमांचक चूरन से छू हो जाएगा. शर्मा जी के खोखे के पास ही और भी कई मेडिकल खोखे हैं. इनके बाजू वाले स्टोर का मालिक कहता है कि यूनिवर्सिटी तो फर्जी है. पर आप वीसी साहब से कभी भी मिल सकते हैं. आजकल उधर का धंधा मंदा पड़ा है तो इधर चूरन बेच कर काम चला रहे हैं. साल 2008 में यूपी सरकार ने इस संस्थान को मान्यता देने से मना कर दिया था. और बच्चों को यूनिवर्सिटी की ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की फर्जी डिग्री के आरोप में 10 लोगों की गिरफ्तारी भी की थी. लेकिन 2011 में ये यूनिवर्सिटी फिर खुल गई. श्याम सुदंर शर्मा कहते हैं कि उनकी यूनिवर्सिटी 1901 से है जब यूजीसी पैदा भी नहीं हुआ था.