वाशिंगटन से लेकर न्यूयॉर्क के सियासी गलियारों में इस समय एक बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के 4 सांसदों ने उन्हें एक ऐसा झटका दिया है जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है.
ट्रंप के 4 सांसदों का वोटिंग में धोखा, क्या भारत की तरह अमेरिका में नहीं है व्हिप और दल-बदल कानून?
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के ही चार सांसदों ने यूएस कांग्रेस में सरकार विरोधी प्रस्ताव का समर्थन करके सबको चौंका दिया. भारत में जहां ऐसा करने पर दलबदल कानून के तहत सांसदी चली जाती है, वहीं अमेरिका में बिना किसी कानूनी डर के यह 'क्रॉस-वोटिंग' धड़ल्ले से होती है. फिर भी वहां भारत की तरह रिसॉर्ट और सूटकेस वाली 'हॉर्स ट्रेडिंग' क्यों पूरी तरह फेल हो जाती है?


न्यूयॉर्क टाइम्स की एक ताजा खबर के मुताबिक इन चार बागी सांसदों ने अपनी पार्टी की लाइन से अलग जाकर विपक्ष यानी डेमोक्रेट्स के उस प्रस्ताव का खुलकर समर्थन कर दिया जो ईरान के खिलाफ जंग को रोकने के लिए लाया गया था. नतीजा यह हुआ कि बिल झट से पास हो गया. और प्रेसीडेंट ट्रंप की अकड़ एक झटके में निकल गई.
गजब है भाई! हमारे भारत में अगर कोई सांसद अपनी पार्टी के खिलाफ जाकर ऐसा कदम उठाने की सोच भी ले तो उसकी सांसें अटक जाती हैं. लेकिन अमेरिका में अपनी ही सरकार और पार्टी के खिलाफ जाकर दूसरी पार्टी के बिल को पास कराने के इस खेल को बहुत ही सम्मान के साथ क्रॉस-वोटिंग या बायपार्टिसन सपोर्ट कहा जाता है.
अब असली सवाल यह उठता है कि क्या भारत की तरह अमेरिका में भी सियासी दल अपने सांसदों को बांधने के लिए कोई व्हिप जारी नहीं करते? अगर वहां भी यह चाबुक चलता है तो फिर हमारे और उनके सिस्टम में इतना जमीन-आसमान का अंतर क्यों है? आज हम अमेरिका की इसी अतरंगी संसदीय प्रणाली का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलेंगे और देखेंगे कि बिना किसी दलबदल विरोधी कानून के भी वहां की राजनीति हमारे रिसॉर्ट वाले ड्रामे से कितनी अलग है.
अमेरिकी व्हिप का सच और क्रॉस-वोटिंग की पूरी कहानी
सबसे पहले इस व्हिप वाले फंडे को ठीक से समझ लेते हैं. भारत में व्हिप का मतलब होता है पार्टी का वो अंतिम आदेश जिसका उल्लंघन करते ही सांसद या विधायक की सदस्यता सीधे हवा हो जाती है. लेकिन अमेरिका में कहानी बिल्कुल उलट है. वहां भी पार्टियों के पास व्हिप नाम का एक पद और व्यवस्था होती है, लेकिन उनका काम सांसदों को डराना या उनकी नौकरी खाना नहीं होता.
अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस में व्हिप का काम सिर्फ इतना होता है कि वो अपनी पार्टी के सांसदों के पास जाएं, उनसे बातचीत करें और यह जानने की कोशिश करें कि किसी खास बिल पर उनका मूड क्या है. वो सांसदों को मनाने और समझाने की कोशिश जरूर करते हैं, लेकिन किसी को मजबूर नहीं कर सकते.
वहां पार्टी की लाइन से अलग वोट करने पर किसी भी सांसद की सदस्यता नहीं छीनी जा सकती. अमेरिका का संविधान अपने सांसदों को वोट देने की पूरी आजादी देता है. वहां का हर सांसद अपनी पार्टी का गुलाम होने के बजाय अपने विवेक और अपने इलाके की जनता के प्रति जवाबदेह होता है. यही वजह है कि ट्रंप के चार सांसदों ने बिना किसी डर के अपनी ही पार्टी के खिलाफ जाकर बटन दबा दिया और उनका बाल भी बांका नहीं हुआ.
बिना दलबदल कानून के कैसे रुकी है नोटों की नुमाइश
अब आपके दिमाग की बत्ती जलेगी कि बाबू! जहां दलबदल का कोई कानून ही नहीं है, जहां सांसद जब चाहे अपनी पार्टी की लंका लगा दे, वहां हमारे देश की तरह करोड़ों रुपये के सूटकेस, चार्टर्ड प्लेन और रिसॉर्ट वाली हॉर्स ट्रेडिंग क्यों नहीं दिखाई देती? अमेरिका ने इस बीमारी का इलाज बहुत ही शातिर तरीके से अपने सिस्टम के भीतर ही छुपा रखा है.
इस खेल के पीछे का सबसे बड़ा कारण यह है कि अमेरिका में राष्ट्रपति शासन प्रणाली यानी प्रेसिडेंशियल सिस्टम काम करता है. भारत में अगर कुछ सांसद पाला बदल लें तो सरकार अल्पमत में आकर गिर जाती है.
लेकिन अमेरिका में राष्ट्रपति को देश की जनता सीधे चुनती है, वहां की संसद नहीं. अगर ट्रंप की पार्टी के 50 सांसद भी बगावत कर दें, तब भी ट्रंप की कुर्सी को कोई छू तक नहीं सकता. जब सरकार गिरने का कोई चांस ही नहीं है, तो विपक्ष किसी सांसद को खरीदने के लिए नोटों की गड्डियां क्यों लुटाएगा?
इसके अलावा वहां शक्तियों के पृथक्करण या बंटवारे (Separation of Powers) का बहुत ही कड़ा नियम लागू है. भारत में पाला बदलने वाले बागी नेता को तुरंत अगली सरकार में मलाईदार मंत्री पद का लॉलीपॉप थमा दिया जाता है. लेकिन अमेरिका में कोई भी सांसद अपनी सीट पर रहते हुए सरकार में मंत्री बन ही नहीं सकता. अगर राष्ट्रपति किसी सांसद को मंत्री बनाना भी चाहें, तो उस नेता को पहले अपनी सांसदी से इस्तीफा देना पड़ेगा.
एक और मजेदार बात यह है कि जो खेल हमारे यहां पर्दे के पीछे और अंधेरे में होता है, अमेरिका ने उसे लॉबिंग और कैंपेन फाइनेंस का नाम देकर पूरी तरह से लीगल बना दिया है. वहां बड़ी-बड़ी कंपनियां या ग्रुप किसी सांसद को सीधे रिश्वत देने के बजाय उनके अगले चुनाव प्रचार के लिए कानूनी तौर पर चंदा देते हैं. चूंकि इस पूरे फंड का एक-एक पैसा फेडरल इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर पब्लिक रहता है, इसलिए वहां अंडरग्राउंड ब्लैक मनी का बिजनेस मॉडल पूरी तरह से फेल हो चुका है.
जनता की अदालत में सीधा 'फास्ट ट्रैक' इंसाफ
अमेरिका में टिकट बंटे या पार्टी का व्हिप काम करे न करे, लेकिन जनता की नजर बहुत टेढ़ी होती है. वहां के सांसदों को अपनी पार्टी से ज्यादा अपने इलाके (Constituency) के वोटरों की फिक्र होती है.
वहां हर 2 साल में निचले सदन (House of Representatives) के चुनाव होते हैं. अगर कोई सांसद बिना किसी ठोस और जायज वजह के अचानक अपनी पार्टी बदलता है या किसी बिल पर अजीबोगरीब यू-टर्न लेता है, तो वहां की मीडिया और जनता उसे अगले ही चुनाव में बुरी तरह हरा देती है. वहां नेताओं को पता है कि पार्टी बदलने की सियासी कीमत बहुत भारी पड़ती है.
वीडियो: ट्रंप-नेतन्याहू फ़ोन कॉल की एक-एक बात पता चली



















