“ऐसा लगता है पाकिस्तान के खिलाफ़ हुए मैच में विराट कोहली और युवराज सिंह जैसे खिलाड़ी हारने के लिए ही खेल रहे थे. विराट ऐसा खिलाड़ी है जो अक्सर शतक मारता है और युवराज सिंह ने पीछे बहुत सारे रन बनाए हैं. क्या ये मैच फिक्स था, इस बात की जांच होनी चाहिए. अनिल कुंबले उस वक़्त कोच थे. विराट ने इससे पहले बहुत रन बनाए हैं. उस दिन उसे क्या हो गया था? इसीलिए मुझे लगता है कि ये मैच फिक्स था.”आगे मंत्री जी की ज़ुबान और भटक गई. उन्होंने कहा,
“खिलाड़ियों ने हमें धोखा दिया. उन्होंने हमारे दुश्मन पाकिस्तान के आगे घुटने टेक दिए. इस बुरी तरह से अपने दुश्मन के सामने घुटनों पर आ जाना देश का बहुत बड़ा अपमान है.”इसके आगे वो और भी ट्रैक से उतर गए. स्पोर्ट्स में आरक्षण की मांग कर डाली. कहने लगे, “दलितों को टीम में शामिल किया जाना चाहिए. क्रिकेट में भी और बाकी खेलों में भी. दलितों के लिए 25 परसेंट कोटा रिजर्व होना चाहिए.” कुछ लोग सिर्फ बोलने के लिए बोलते हैं. उन्हें भी पता होता है कि जो कुछ वो कह रहे हैं, उसमें कोई सेंस नहीं है. लेकिन वो फिर भी बोलते हैं. ये तक नहीं सोचते कि उनकी वाहियात बकवास से अपना काम डेडिकेशन से करने वाले लोगों का कितना अपमान होता है. आठवले जी का कहना है कि कोहली बहुत शतक मारता है तो उस दिन क्यों नहीं? इस लॉजिक से चला जाए तो अब तक विराट के वन डे में कम से कम 18,700 रन होने चाहिए थे. आखिर उसने 187 मैच खेले हैं अब तक. हर मैच में सेंचुरी के हिसाब से इतने तो पक्के हुए. ऊपर के चिल्लर रन अलग.
यही बात युवराज पर भी लागू होती है. कोई भी खिलाड़ी हर मैच में रन नहीं बना सकता. सचिन, लारा, डॉन ब्रैडमन भी नहीं. इतनी सी बात एक साधारण दर्शक तक समझता है. लेकिन मंत्री जी साधारण कहां! वो तो असाधारण हैं. उठा ली ज़ुबान और दे दिया फतवा. उस दिन इंडिया बुरा खेली नो डाउट. नहीं था दिन टीम का. हार गए. अच्छे खेलप्रेमी वो ही होते हैं, जो गरिमा के साथ हार स्वीकारना जानते हैं. ना कि एक हार से तिलमिलाकर उन खिलाड़ियों की निष्ठा पर ही सवाल खड़े कर कर देते हैं. रही बात स्पोर्ट्स में दलित आरक्षण की, तो इससे ज़्यादा बेतुकी बात आज के दिन मैंने नहीं सुनी. इसपर तो कुछ ना ही बोला जाए तो बेहतर. ऐसी बेतुकी बातें कर के दलितों के ये स्वघोषित रहनुमा दलितों का ही नुकसान करते हैं. रामदास आठवले के इन आरोपों को उतना ही सीरियसली लिया जाना चाहिए, जितना उन्हें उनके होम स्टेट की जनता लेती है. यानी बिल्कुल नहीं. ये भी पढ़ें:
























