रूस-यूक्रेन युद्ध में गोले बरस रहे हैं और आसमान में धमाके गूंज रहे हैं. कुछ नहीं पता कब किसकी जान चली जाए. इस बीच यूक्रेन सेना की गर्भवती महिला सैनिक नई जिंदगियों की आस के साथ मोर्चा संभाले हैं. कोई खंदक में बैठी है तो कोई घायल सैनिकों की जान बचा रही है. हालात कितने भी कठिन हों, लेकिन ये महिलाएं कहती हैं, "युद्ध तो युद्ध है, लेकिन जिंदगी चलती रहती है.”
ना वर्दी फिट होती, ना मेडिकल सुविधा, फिर भी रूस के खिलाफ डटी हैं यूक्रेन की गर्भवती महिला सैनिक
Russia-Ukraine War के बीच पुरुषों की भर्ती मुश्किल हो रही है, वहीं महिलाएं बड़ी संख्या में सेना का सहारा बनी हैं. 2022 में रूसी हमले के बाद से यूक्रेन में महिला सैनिकों की संख्या 70 हजार तक पहुंच चुकी है.


दी न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेनी सेना की कॉम्बैट मेडिकल टीम की सदस्य ओलेना बताती हैं कि उन्हें गर्भवती होने की खबर खंदक में मिली. ओलेना कहती हैं,
"लोग सोचेंगे कि प्रेग्नेंसी में जंग लड़ना पागलपन है, लेकिन मैं इसे अलग तरह से देखती हूं.”
ओलेना आम लोगों की तरह परिवार बसाना चाहती थीं, लेकिन देश सेवा का जज्बा भी उतना ही गहरा था.
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच पुरुषों की भर्ती मुश्किल हो रही है, वहीं महिलाएं बड़ी संख्या में सेना का सहारा बनी हैं. 2022 में रूसी हमले के बाद से महिला सैनिकों की संख्या 70 हजार तक पहुंच चुकी है. यह 2020 में रूस के आक्रमण के बाद से 20 फीसदी से भी ज्यादा है. इनमें से कई महिलाएं गर्भवती होने के दौरान भी डटी हैं.
25 साल की नादिया आठ महीने तक फ्रंटलाइन पर रेडियो ऑपरेटर रहीं. वे बताती हैं,
"हर सुबह डर लगता था कि सब जिंदा हैं या नहीं."
नादिया ने बताया कि धमाकों की वजह से छत से प्लास्टर बेड पर गिरता था, जिसे वो साफ करती थीं. जहां वे अल्ट्रासाउंड कराने जाती थीं, वे सब बंद हो गए. आसपास के अस्पतालों का भी यही हाल था. फरवरी में बेटे यारोस्लाव को जन्म देने वाली नादिया कहती हैं कि फिजिकल एक्टिविटी के साथ वे बहुत तनाव वाले दिन थे.

यूक्रेनी सेना में गर्भवती महिलाएं सातवें महीने तक ड्यूटी कर सकती हैं. लेकिन उन्हें सेना की यूनिफॉर्म भी फिट नहीं आती है. उनके लिए ना तो सही नर्सरी हैं और ना ही अच्छी मेडिकल सुविधाएं. फिर भी महिलाएं मानती हैं कि देश और बच्चों के भविष्य के लिए बलिदान जरूरी है. 39 साल की ओल्या कहती हैं,
"हमारे बच्चे ही इस देश का भविष्य हैं... हमें अपने बच्चों की हिफाजत करनी है. हमें उनके भविष्य के लिए देश को आजाद कराना है."
हालांकि, मां बनने के बाद महिला सैनिकों के लिए हालात आसान नहीं होते हैं. नादिया के सामने दो ऑप्शन थे- या तो वे 126 दिन की पेड छुट्टी लें या फिर तीन साल तक बिना सैलरी की छुट्टी लें. नादिया अपने बेबी को ऐसे ही नहीं छोड़ सकती थीं, इसलिए उन्होंने तीन साल की छुट्टी ले ली.
वेलेंटाइना जैसे कुछ सैनिकों ने जल्दी ड्यूटी जॉइन कर ली. कई बार महिला सैनिकों को वापस लेने से कमांडर भी हिचकिचाते हैं. पूर्वी यूक्रेन में गर्भवती सैनिकों का इलाज करने वाली डॉक्टर वीटा मारचेंको कहती हैं कि उनके पास स्टाफ और एक्विपमेंट्स की कमी है, लेकिन वे बच्चों की डिलीवरी करा सकती हैं. उन्होंने आगे कहा,
"मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतनी महिलाएं जंग लड़ेंगी. लेकिन गर्भवती महिला सैनिक के लिए यह जंग और भी मायने रखती है, क्योंकि वे जानती हैं कि किसके लिए लड़ रही हैं."
यूक्रेन में कई प्राइवेट संस्थाएं गर्भवती महिला सैनिकों के लिए काम कर रही हैं. जेमलियाचकी नाम का ग्रुप सेवा दे रहीं सैनिकों के लिए मेटरनिटी यूनिफॉर्म बनाता और भेजता है. क्विट्ना नाम की नॉन-प्रॉफिट संस्था एक मोबाइल क्लिनिक के जरिए महिलाओं को मुफ्त हेल्थ सर्विस देती है.
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