तीन महीने में उस लड़की के साथ तीन बार रेप हुआ. मां-बाप जूनागढ़ में खेतों में मजदूरी करते थे. रेप के बाद नाबालिग लड़की प्रेग्नेंट हो गई. अभी और बुरा होना बाकी था उसने एसिड पी लिया. जिसके कारण लीवर, आंत और गैस्ट्रिक सिस्टम खराब हो गए. पांच महीने का गर्भ पेट में लिए लड़की के मां-बाप कोर्ट जा पहुंचे. दलील दी है कि बच्ची कि फिजिकल और मेडिकल हालत ऐसी नहीं है कि वो मां बन सके. हाईकोर्ट ने सोला सिविल हॉस्पिटल से बच्ची की मेडिकल कंडीशन के बारे में पूछा है.
क्या कहते हैं लीगल अबॉर्शन से जुड़े नियम-कायदे
अबॉर्शन से जुड़े कानून, गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 के अंतर्गत आते हैं. 2002 तक आते-आते इसमें कुछ बदलाव हुए. क़ानून में साफ़ लिखा है. अबॉर्शन करा सकती हैं. बशर्ते कोई वाजिब वजह हो. डॉक्टर रजिस्टर्ड हो. वयस्क हों. अगर वयस्क हैं तो घर के किसी भी मेंबर की लिखित अनुमति नही चाहिए होगी. खुद का लिखा चलेगा. लेकिन जो पागल हो या नाबालिग हो उसके मां या बाप की रजामंदी जरूरी है,कम उम्र में ब्याह दी गई हो तो पति का लिखा भी माना जाएगा.
अबॉर्शन की वाजिब वजहें
1. प्रेग्नेंसी की वजह से फिजिकल या मेंटल ट्रॉमा झेलना पड़ सकता हो या जान का ख़तरा हो. मेन्टल ट्रॉमा में ये बात भी जोड़ी गई कि प्रेग्नेंसी रेप या कॉन्ट्रोसेप्टिव्स के फेल्योर की वजह से हुई हो.
2. बच्चा ऐसा पैदा होने वाला हो जो फिजिकली या मेंटली फिट न होगा.
अबॉर्शन करने वाले डॉक्टर में ये योग्यताएं हों
1. गायनोकॉलजिस्ट के पास मास्टर्स डिग्री हो.
2. गायनोकॉलॉजी के क्षेत्र में तीन साल का एक्सपीरियंस हो.
3. डॉक्टर ने इस फील्ड में छह महीने हाउस जॉब किया हो.
ध्यान रखें
दो बातें गांठ बांध लीजिए , सामान्य अबॉर्शन प्रेग्नेंसी के बारह हफ्ते के अंदर किया जा सकता है. भ्रूण अगर बारह हफ्ते से ज्यादा और बीस हफ्ते से काम का हो तो उसे दो डॉक्टरों की सलाह के बाद ही अबॉर्ट किया जा सकता है.अबॉर्शन के लिए महिला की अनुमति जरूरी होती है. जबरिया अबॉर्शन पर आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा दी जा सकती है.