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"हिंदू धर्म महान, इसमें कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं", सुप्रीम कोर्ट ने ये क्यों कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा, “अगर किसी खास समुदाय पर उंगली उठाई जाती है, तो आप समाज के एक खास तबके को नीचा दिखाते हैं. भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है.”

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(फोटो- इंडिया टुडे)

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 27 फरवरी को भाजपा नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है. याचिका में उन ऐतिहासिक स्थानों और शहरों का नाम बदलने की मांग की गई थी, जो वर्तमान में "आक्रमणकारियों" के नाम पर हैं. याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट कहा कि एक देश अतीत की कैद में नहीं रह सकता.

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कोर्ट तबाही पैदा करने का साधन नहीं

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने ये कहा कि कोर्ट को तबाही पैदा करने का एक साधन नहीं होना चाहिए. याचिका पर सुनवाई की दो जजों की बेंच ने. इसमें जस्टिस केएम जोसेफ और बीवी नागरथना शामिल थे. सुनवाई करते हुए जजों ने कहा,

“कोई भी चुनिंदा रूप से इतिहास पर दोबारा गौर नहीं कर सकता है और हिंदू धर्म में कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं है.”

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सुनवाई करते हुए जजों ने आगे कहा,

“आप इस मुद्दे को जिंदा रखना चाहते हैं और देश को उबाल पर रखना चाहते हैं? अगर किसी खास समुदाय पर उंगली उठाई जाती है, तो आप समाज के एक खास तबके को नीचा दिखाते हैं. भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, यह एक धर्मनिरपेक्ष मंच है.”

हिंदू धर्म जीवन जीने का एक तरीका है

यही नहीं, जस्टिस जोसेफ और नागरथना की बेंच ने कहा कि हिंदू धर्म एक महान धर्म है और ये कट्टरता की अनुमति नहीं देता है. जस्टिस नाकरथना ने कहा कि देश पहले से ही कई समस्याओं का सामना कर रहा है जिनका पहले समाधान किया जाना चाहिए. उन्होंने ये बात रखने के लिए अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर भी प्रकाश डाला, जिसकी वजह से भारतीय लोग आपस में लड़ते रहे. उन्होंने कहा,

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“हमारे देश में कई सारी समस्याएं हैं. हिंदू धर्म जीवन जीने का एक तरीका है, जिसके कारण भारत ने सभी को आत्मसात कर लिया है. उसी के कारण हम एक साथ रहने में सक्षम हैं. अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति ने हमारे समाज में फूट ला दी. हमें इसमें किसी धर्म को नहीं घसीटना चाहिए.”

आक्रमणकारियों को संवैधानिक संरक्षण नहीं

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार सुनवाई के दौरान अपनी बात रखते हुए याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने कहा कि आक्रमणकारियों को संवैधानिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता है. उपाध्याय ने कहा,

“अफगानिस्तान से हिंदुओं का सफाया हो गया, नौ राज्यों में वो अल्पसंख्यक हैं. मेरी समझ यह है कि यह संविधान विदेशी बर्बर आक्रमणकारियों के लिए नहीं है.”

इस पर जवाब देते हुए कोर्ट ने कहा कि सब कुछ भाईचारे के सिद्धांत पर निर्भर होना चाहिए. बेंच ने कहा,

“किसी भी राष्ट्र का इतिहास किसी राष्ट्र के वर्तमान और भावी पीढ़ियों को इस हद तक परेशान नहीं कर सकता है कि आने वाली पीढ़ियां अतीत की बंदी बन जाएं. भाईचारे का सुनहरा सिद्धांत सबसे ज्यादा महत्व रखता है और संविधान की प्रस्तावना में उचित रूप से अपना स्थान पाता है. इसका मतलब है कि सद्भाव ही देश की एकजुटता का कारण बनेगा.”

बेंच की टिप्पणी के दौरान उपाध्याय ने कोर्ट से अपनी इस याचिका को वापस लेने की मांग की थी. लेकिन जजों ने इससे इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया. 

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