The Lallantop

दिल्ली पुलिस को मिली आफताब के नार्को टेस्ट की मंजूरी, कैसे काम करता है ये?

क्या नार्को टेस्ट में सामने आई बातें हमेशा सच होती हैं?

Advertisement
post-main-image
बाएं से दाएं. आफताब पूनावाला और श्रद्धा वालकर. (फाइल फोटो)

श्रद्धा वालकर मर्डर केस (Shraddha Murder Case) के आरोपी आफताब पूनावाला (Aftab Poonawala) का नार्को टेस्ट किया जाएगा. इसके लिए दिल्ली के एक कोर्ट ने पुलिस को मंजूरी दे दी है. दिल्ली पुलिस ने 15 नवंबर को आफ़ताब अमीन पूनावाला का नार्को टेस्ट कराने के लिए कोर्ट से मंजूरी मांगी थी. आखिर ये नार्को टेस्ट होता क्या है और इससे क्या रिजल्ट आते हैं, सब विस्तार से बताते हैं. 

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
क्या और क्यों होता है नार्को टेस्ट?

नार्को टेस्ट, एक ऐसा टेस्ट होता है जिससे किसी इंसान को नींद या बेहोशी की स्थिति में लाया जाता है. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक इस टेस्ट के लिए कुछ दवाएं इंजेक्ट की जाती हैं. जैसे, सोडियम पेंटोथल, स्कोपोलामाइन और सोडियम अमायटल. इससे इंसान की सोचने की क्षमता या कल्पना बेअसर हो सकती है और उससे सही जानकारी निकाली जा सकती है.

इन दवाओं को ट्रुथ ड्रग (Truth Drug) के नाम से भी जाना जाता है. ये दवाएं किसी भी इंसान को आधा बेहोश कर देती हैं. इसी अवस्था में ही वो बोलता चला जाता है. साइकोलॉजी कहती है कि ऐसी हालत में इंसान झूठ नहीं बोल पाते हैं. क्योंकि झूठ बोलने के लिए दिमाग का इस्तेमाल करना पड़ता है, या सोचना पड़ता है, या कुछ बातें छिपानी होती हैं या कुछ कहानियां बनानी होती हैं. ये सब करने के लिए इंसान को दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ता है. लेकिन इन ट्रुथ ड्रग्स की वजह से इंसान ऐसा नहीं कर पाता है.

Advertisement
कैसे किया जाता है नार्को टेस्ट?

रिपोर्ट्स के अनुसार, नार्को टेस्ट करने के लिए कुछ चीजों का ध्यान रखा जाता है. नार्को टेस्ट करने से पहले जो भी आरोपी व्यक्ति है उसका पूरा फिजिकल टेस्ट किया जाता है. ये टेस्ट इसलिए किया जाता है ताकि ये पता चल सके कि वो फिजिकली और मेंटली इस टेस्ट के लिए फिट है भी या नहीं. अगर वो फिट नहीं है, तो उसका नार्को टेस्ट नहीं हो सकता है. इसके अलावा बच्चों, बुजुर्गों और स्पेशली एबल्ड लोगों का नार्को टेस्ट नहीं किया जा सकता है.

नार्को टेस्ट शुरू करने से पहले हाथ की उंगलियों को पॉलीग्राफ मशीन से कनेक्ट किया जाता है. टेस्ट से पहले ब्लड प्रेशर, पल्स रेट, ब्रीथिंग स्पीड और हार्ट रेट की रीडिंग ली जाती है. फिर इन सब के आधार पर ये फैसला लिया जाता है कि उसे दवाओं का कितना डोज देना है. शुरुआत में आसान सवाल पूछे जाते हैं. जैसे उसका नाम क्या है, परिवार के लोगों का नाम क्या है, उसके घर का पता क्या है, वो कहां काम करता है? वगैरह, वगैरह.

फिर बारी आती है कुछ झूठे सवालों की. ऐसे सवाल जिनके जवाब वो 'ना' में दे. जैसे अगर उसकी शादी नहीं हुई है, तो उससे पूछा जाएगा कि क्या वो शादीशुदा है? ऐसे सवाल पूछ कर ये जानने की कोशिश की जाती है कि व्यक्ति का शरीर जब कोई झूठ सुनता है, तो कैसी प्रतिक्रिया देता है? अगर वो सही जवाब दे रहा है तो उस समय उसकी बॉडी लैंग्वेज कैसी थी, ये देखा जाता है.

Advertisement

इसके बाद सख्त सवाल पूछे जाते हैं और उसके फिजिकल और मेंटल रिएक्शन्स का पता लगाया जाता है. हालांकि, ऐसा जरूरी नहीं कि नार्को टेस्ट से सच जाना ही जा सके. अगर आरोपी को कोई भी मेंटल या फिजिकल दिक्कत है, उसकी बॉडी शिवर करती है यानी कांपती है या दिल तेज धड़कता है, तो मशीन गलत डेटा भी बता सकती है.

वीडियो- अपने सोशल मीडिया पर इस तरह के पोस्ट डालता था आरोपी आफताब

Advertisement