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आ गए वो आंकड़े, जो मोदी सरकार चुनाव से पहले आपसे छिपा रही थी

जानिए, क्या-क्या पता चला इस नए डेटा से...

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भारत में बेरोजगारों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन उनके लिए बेरोजगारी भत्ते का सिस्टम बहुत लचर है. सांकेतिक तस्वीर. इंडिया टुडे.
देश में कितने बेरोजगार? या यूं कहें कि पिछले कुछ सालों में कितनों की रोटी-रोजी छिन गई? या फिर जैसा पीएम कहते हैं, रोजगार की तो बहार है, उनके दौर में. पीएफ के खाते चेक कर लो. मुद्रा लोन लेने वालों की तादाद गिन लो. हर डेटा में तरक्की ही तरक्की, खुशहाली ही खुशहाली दिखाई देगी. पर सच क्या है? क्या हकीकत में ऐसा है, जैसा मोदी सरकार दावा करती है? विपक्षी दल और आर्थिक मामलों के तमाम जानकार मोदी सरकार पर डेटा छुपाने के आरोप लगाते हैं. ऐसा ही एक डेटा था - नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस यानी NSSO का पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे यानी PLFS. इल्जाम थे कि डेटा तैयार होने के बाद भी NSSO, PLFS के आंकड़े जारी नहीं कर रहा है. आखिर 20 मार्च, 2019 के दिन ये आंकड़े सामने आ गए.
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने इन आंकड़ों को उजागर कर दिया. पत्रकार जय मजूमदार ने आंकड़ों के साथ ये रिपोर्ट लिखी है.
तो क्या है इन आंकड़ों में, जिसकी वजह से सरकार इनको छिपा रही थी? असल में इन आंकड़ों ने सरकार की पोल खोलकर रख दी है. क्या पोल खोली इन आंकड़ों ने? वो ये कि साल 2011-12 से 2017-18 के बीच 4 करोड़ 70 लाख लोगों की रोटी-रोजी छिन चुकी है.
इस वक्त देश में 28 करोड़ 60 लाख पुरुष कोई न कोई काम कर रहे हैं. सांकेतिक तस्वीर.
इस वक्त देश में 28 करोड़ 60 लाख पुरुष कोई न कोई काम कर रहे हैं. सांकेतिक तस्वीर.

कितने लोगों के हाथ में काम था पहले? इंडियन एक्सप्रेस में छपे NSSO के डेटा के मुताबिक साल 2011-12 में देश में कोई 42 करोड़ लोगों के पास काम था. माने ये वो लोग थे, जिनके पास कोई न कोई रोजगार था. मगर अब ये तादाद घटकर 37 करोड़ 30 लाख ही रह गई है. मतलब ये कि साल 2012 से 2018 तक 4 करोड़ 70 लाख लोगों के हाथ से काम छिन चुका है. खास बात ये है कि गांवों में मर्दों के मुकाबले महिलाओं के हाथ से काम ज्यादा छिना. इसकी एक वजह मनरेगा जैसी योजनाओं का काम ठीक ढंग से न चलना हो सकता है. गांवों कुल बेरोजगारों में 68 फीसदी कामकाजी महिलाएं थीं. इसके मुकाबले शहरों में पुरुषों ने ज्यादा (96%) नौकरियां गंवाईं.
कितने मर्द अब कमा रहे हैं इस वक्त? सर्वे के मुताबिक इस वक्त देश में 28 करोड़ 60 लाख पुरुष कोई न कोई काम कर रहे हैं. साल 2011-12 में 30 करोड़ 40 लाख पुरुष रोजगार में लगे हुए थे. मतलब ये कि साल 2011-12 से 2018 तक 1 करोड़ 80 लाख पुरुष कर्मचारी अपनी नौकरी खो चुके हैं. साल 1993-94 के बाद ये पहला मौका है, जब कामकाजी पुरुषों की तादाद कम हुई है.
क्या जाहिर होता है इस सर्वे से? देश के 4 करोड़ 70 लाख लोगों की नौकरियां छिन चुकी हैं. ये तादाद अफगानिस्तान, सउदी अरब और नेपाल जैसे देशों की कुल आबादी से भी ज्यादा है. इसे और विस्तार से समझें तो दुनिया के कोई 170 देशों की अबादी इससे कम है, जितने लोग भारत में साल 2012 से 2018 के बीच बेरोजगार हो गए. और यही सरकार के लिए मुसीबत का सबब है. और शायद इसी वजह से सरकार इन आंकड़ों को बाहर नहीं आने दे रही थी.
क्या आंकड़े छिपा रही है मोदी सरकार? जनवरी, 2019 में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग यानी NSC के कार्यवाहक अध्यक्ष पीसी मोहनन और आयोग की सदस्य जेवी मीनाक्षी ने अपने पद से इस्ताफा दे दिया था. दोनों ने आरोप लगाए थे कि मोदी सरकार रोजगार के आंकड़े छिपाने की कोशिश कर रही है. पीसी मोहनन वरिष्ठ सांख्यिकीविद और जेवी मीनाक्षी दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स में प्रोफेसर हैं. दोनों को जून, 2017 में तीन साल के लिए NSC का सदस्य नियुक्त किया गया था. इनका कार्यकाल जून, 2020 तक था. मगर इससे पहले ही दोनों सदस्यों ने सरकार को इस्तीफे सौंप दिए.+
कितने अहम हैं NSSO और NSC? NSSO केंद्र सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय MOSPI के मातहत काम करता है. इसका काम देश भर में घर-घर से अलग-अलग डेटा इकट्ठा करना है. ये डेटा सामाजिक-आर्थिक दशा, खेती और उद्योगों के प्रदर्शन आदि से संबंधित होते हैं. NSSO उपभोक्ताओं के खर्च, रोजगार, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवाओं का भी सर्वे करता है. ये कुछ वैसा ही होता है, जैसे चुनाव के दौर में अलग-अलग एजेंसियां ओपिनियन पोल या एग्जिट पोल करती हैं. फिर टीवी पर आप उनको देखते हैं. NSC का काम गणना के लिए नीतियां बनाना, उसकी प्राथमिकताएं और मानक तय करना है. पूरे कामकाज की समीक्षा करना भी इसका काम है.


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