नीति आयोग के CEO से सवाल किया गया था-
क्या प्रकृति ने हमें कोविड और चीन के साथ तनाव के रूप में एक मौका दिया है, ताकि हमें खुद को खड़ा करने का दूसरा बड़ा चांस मिले?
वायरल हो रहे विडियो के मुताबिक, इस पर अमिताभ कांत ने कथित तौर पर कहा -
सख्त सुधार भारत में बहुत कठिन हैं. हम बहुत ज्यादा ही लोकतांत्रिक हैं (We are too much of democracy). पहली बार भारत में कोई सरकार है, जो बहुत सख्त सुधार की तरफ बढ़ रही है.
हर सेक्टर में सुधार कर रही है. माइनिंग, कोल लेबर, एग्रिकल्चर सब पर काम हो रहा. आसान सुधार पहले हो चुके हैं. लेकिन इस तरह के सख्त सुधारों के लिए बहुत ज्यादा राजनैतिक और प्रशासनिक दृढ़ निश्चय की जरूरत होती है. हमें ऐसे और भी सुधारों की जरूरत है.

अमिताभ कांत एक वेबिनार में अपने विचार रख रहे थे.
ट्विटर पर बयान से मुकरे
नीति आयोग के CEO के इस बयान को लेकर ट्विटर पर बवाल शुरू हो गया. जिस अखबार ने इस खबर को ट्वीट किया था, उसे रीट्ववीट करके लोग सवाल पूछने लगे. कुछ ही देर में अमिताभ कांत ने उस खबर को कोट करते हुए ट्वीट किया
मैंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है. मैंने MEIS स्कीम और संसाधनों के असमान बंटवारे और दुनिया भर के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर से प्रतिस्पर्धा को लेकर अपने विचार रखे थे.

अमिताभ कांत ट्विटर पर अपने बयान से बदल गए.
किसानों के मुद्दे पर भी बोले
वेबिनार में नीति आयोग के CEO ने कई सवालों के जवाब दिए. इसमें कृषि सुधार का मसला भी था. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा पंजाब और हरियाणा के किसान ही मुख्य रूप से सरकार के नए किसान कानूनों का विरोध कर रहे हैं. उन्होंने कहा,
यह समझना बहुत जरूरी है कि MSP यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस इस कानून के आने से कहीं जाने वाला नहीं है. मंडियां भी रहेंगी. किसानों के पास अब अपने सामान को बेचने के लिए ज्यादा विकल्प मौजूद होंगे. इससे उन्हें फायदा होगा.इस पूरी बातचीत में अमिताभ कांत ने ये भी कहा कि सुधारों की अगली लहर केंद्र के बजाय राज्य सरकारों की तरफ से आनी चाहिए. अगर 10-12 राज्य अपने हिसाब से तेजी से आगे बढ़ेंगे तो कोई कारण नहीं है कि भारत तेजी से आगे नहीं बढ़ पाएगा.
हालांकि अमिताभ कांत की इन सब बातों पर उनका लोकतंत्र पर दिया बयान भारी पड़ रहा है. उनकी लाख सफाई के बावजूद ट्विटर पर लोग वह वीडियो शेयर हो रहा है, जिसमें वह we are too much of democracy बोलते साफ दिखाई दे रहे हैं.

















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