अगर आज बुद्ध होते तो सताए जा रहे रोहिंग्या मुसलमानों की मदद जरूर करते. म्यांमार को बुद्ध को याद करना चाहिए.तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने ये बात म्यांमार को नसीहत देते हुए कही है. उस म्यांमार को जहां 90% से भी ज्यादा बौद्ध रहते हैं. उस म्यांमार को जहां पीढ़ियों से रहने के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों को वहां का नागरिक नहीं माना जा रहा. आलम ये है कि बीते दो हफ्तों में तीन लाख से भी ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों को पलायन करना पड़ा है. कोई और देश भी इनको आसरा देने को तैयार नहीं है. म्यांमार भले दलाई लामा की नसीहत माने या ना माने, पर कुछ हाथ इन लोगों की मदद को आगे आए हैं, जानते हैं उनके बारे में-

बांग्लादेश में रोहिंग्या मुसलमानों की मदद को पहुंचा भारत का सिख संगठन.(सोर्स- खालसा एड फेसबुक पेज)
भारत का सिख संगठन पहुंचा बांग्लादेश
रोहिंग्या मुसलमानों की मदद के लिए आगे आकर भारत के एक सिख संगठन खालसा एड ने मिसाल पेश की है. इसके वॉलंटियर्स बांग्लादेश और म्यांमार बॉर्डर पर टेकनाफ कस्बे में पहुंचे हुए हैं. यहां कैंप लगाकर वो ना सिर्फ लोगों को रहने को जगह मुहैया करवा रहे हैं बल्कि लंगर लगाकर लोगों का पेट भी भर रहे हैं.संगठन के मैनेजिंग डायरेक्टर अमरप्रीत सिंह के मुताबिक वो लोग वहां 50 हजार लोगों की मदद की तैयारी से गए थे, मगर विस्थापितों की तादात एक लाख से ज्यादा है और बढ़ती ही जा रही है. हालांकि उनकी कोशिश रहेगी कि कोई भूखा ना सोए. वो तब तक यहां से नहीं जाएंगे जब तक स्थितियां सामान्य नहीं हो जाती हैं. मदद के लिए उनके संगठन के और लोग भी यहां आने की तैयारी में हैं.
कैनेडा में पढ़ रही बांग्लादेशी लड़की कर रही मदद
कैनेडा कै हैलिफैक्स के कॉलेज से पढ़ाई कर रहीं फरजाना इस्लाम रोहिंग्या विस्थापतों की मदद को फंड्स जुटा रही हैं. 26 साल की फरजाना रहने वाली तो बांग्लादेश की हैं और अभी वहां कॉलेज में आईटी वेब डिवेलपमेंट का कोर्स कर रही हैं. इस्लाम ने इसी महीने पैसे जुटाने शुरू किए हैं और अब तक वो 400 डॉलर इकट्ठा कर चुकी हैं. उनका कहना है कि जो भी पैसा इकट्ठा होगा वो उसे बांग्लादेश के चैरिटी ग्रुप एस-सादिक फाउंडेशन को दे देंगी. ये ग्रुप भी रोहिंग्या मुसलमानों की मदद कर रहा है.
फरजाना इस्लाम जुटा रहीं हैं विस्थापितों के लिए फंड.
कतर का संगठन बनवा रहा टेंपररी टॉयलेट्स
कतर से भी एक रिलीफ टीम 5 सितंबर को बांग्लादेश पहुंची हुई है. कतर रेड क्रीसेंट सोसाइटी नाम के इस संगठन के वॉलंटियर्स वहां लोगों को साफ पानी मुहैया कराने में जुटे हैं. संगठन विस्थापितों के लिए टेंपररी टॉयलेट्स भी बनवा रहा है. संगठन की एक टीम बांग्लादेश में कतर के राजदूत से भी मिली और सरकार से और मदद भेजने की अपील की है.यूनाइटेड नेशन ने दो कार्गो जहाज से मदद भेजी

यूनाइटेड नेशंस ने सभी देशों से रोहिंग्या मुस्लिमों की मदद को आगे आने को कहा है.
सबसे पहले तो यूनाइटेड नेशन्स यानी यूएन का ही नाम आता है. ना सिर्फ वो और देशों से रोहिंग्या मुसलमानों की मदद करने की अपील कर रहा है, बल्कि खुद भी हर मुमकिन मदद कर रहा है. यूएन अब तक दो कार्गो जहाजों में इमरजेंसी एड, रहने-खाने का सामान आदि चीजें भेज चुका है. एक प्लेन में करीब 2000 फैमिली टेंट भी भेजे गए हैं, जिन्हें यूएई ने दिया है. बांग्लादेश भेजे गए इस सामान से करीब 25000 विस्थापितों को मदद मिलेगी. इसके अलावा करीब 1,20,000 और लोगों की मदद का सामान जुटाया जा चुका है, जिसे भेजे जाने की तैयारी है. मगर ये सब इतना आसान नहीं है, क्योंकि म्यांमार से बांग्लादेश आने वाले विस्थापितों की तादात बढ़ती जा रही है.
मलेशिया-तुर्की आए मदद को आगे

मलेशिया से बांग्लादेश भेजी गई मदद.
मलेशिया भी रोहिंग्या मुसलमानों की मदद के लिए आगे आया है. 9 सितंबर को ही पीएम नजीब रजाक ने बांग्लादेश के लिए मेडिकल हेल्थ रवाना की है. भेजी गई टीम वहां एक फील्ड हॉस्पिटल बनाएगी, जिसमें 100 से ज्यादा बेड होंगे. इस मेडिकल टीम में 12 से ज्यादा आर्मी से जुड़े अधिकारी हैं जो वहां लोगों की मदद करेंगे. मलेशिया फॉर यूथ के सदस्य भी वहां मदद के लिए भेजे गए हैं. इसके अलावा मलेशिया ने वहां करीब 12 टन खाने-पीने का सामान भी भेजा है.
तुर्की के राष्ट्रपति रिकप तैयिप एर्डोगन ने भी 10 सितंबर को रोहिंग्या मुसलमानों के लिए हर मुमकिन मदद करने की बात कही है. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना तो खुद 12 सितंबर को रिफ्यूजी कैंप गईं और लोगों को मदद का भरोसा दिलाया. उन्होंने म्यांमार से अपने नागरिकों को वापस लेने की अपील भी की है.
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