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बछड़ा मरने पर औरत से भीख मंगवाई, शुक्र है उसकी 'लिंचिंग' नहीं हुई

गाय के नाम पर चल रहीं वो 'अदालतें', जिनकी बेहूदगी पर न बोलना उनका समर्थन करना है

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मध्य प्रदेश में एक पंचायत ने बछड़ा मरने पर कमलेश नाम की महिला को सज़ा सुनाई है.
आस्था का एहतराम होना चाहिए, लेकिन जब आस्था की दोशाला ओढ़कर फैसले सुनाये जाने लगें तो वो एक लोकतंत्र का दम घोंटने लगती है. ह्यूमन राइट्स का अतिक्रमण करती है. अगर आपने सवाल किया तो भावना आहत हो सकती है. इस वजह से आस्था में तर्क वितर्क की गुंजाइश ही ख़त्म कर दी जाती है. जब धर्म को आधार बनाकर फैसले किए जाएंगे तो लोकतंत्र का ढांचा कब तक मज़बूत बना रहेगा. धर्म को आधार बनाकर मध्यप्रदेश के भिंड जिले में एक पंचायत ने लोकतंत्र का दमघोंटू फैसला सुनाया है. जिसमें इंसानियत को भी शर्मसार किया गया. गनीमत ये रही कि महिला की लिंचिग नहीं हुई.
हुआ ये कि एक 55 साल की औरत से गाय का बछड़ा मर गया. वो भी तब जब वो गाय का दूध पी रहे बछड़े को पीछे खींच रही थी तो रस्सी से बछड़े का गला घुट गया. पंचायत ने फैसला सुनाया कि इस जुर्म के लिए औरत को गांव से बाहर सात दिन भीख मांगनी पड़ेगी. सात दिन तक गांव में नहीं रहेगी. भीख में मांगे गए पैसों से इलाहाबाद जाकर गंगा स्नान करना होगा. शुद्ध होने के बाद ही वो घर वापस आएगी. पंचायत का ये फैसला जानकर ये तसल्ली होती है कि सिर्फ भीख मंगवाई. औरत की भीड़ ने जान नहीं ले ली. शुक्र है कि औरत जिंदा है.
गाय
गाय के बछड़े की मौत पर मध्य प्रदेश में महिला को पंचायत ने सज़ा सुनाई है, सज़ा सुनाने का ये पहला मामला नहीं है.

अब आप खुद ही विचार करें ये फैसला क्या है? कौन सी शुद्धता की बात कर रहे हैं. और ये कैसी शुद्धता है जो भीख मांगकर स्नान करने से आ जाती है. आप सवाल करेंगे. वो धर्म पर हमला कहलाएगा. इससे भावनाएं आहत होंगी. और फिर आप दोषी होंगे. ये महज़ एक धर्म की कहानी नहीं है. इस महिला के साथ क्या सलूक किया गया वो बताएंगे. लेकिन उससे पहले पंचायत के कुछ फरमान हैं, जो गाय को लेकर सुनाए गए. उनको पढ़ लीजिए, ताकि आपको पता लगे कि किस तरह की बेहूदगी जारी है. और लोगों की ख़ामोशी उन पंचायतों की हौंसलाअफज़ाई करती है. पंचायत के कांडों पर न बोलना उनको समर्थन करने जैसा ही है.

1. श्राप से मुक्त कराने के लिए 5 साल की बच्ची की शादी का फरमान

ये फैसला इसी साल मध्य प्रदेश के गुना ज़िले के तारापुर गांव में सुनाया गया था. हुआ ये था कि तीन साल पहले एक आदमी पर बछड़े को जान से मारने का इल्ज़ाम लगा था. तब उसकी फैमिली का पंचायत ने सामाजिक बहिष्कार कर दिया था.
तथाकथित 'श्राप से मुक्त' कराने को 5 साल की बच्ची की शादी कराने फैसला सुना दिया था पंचायत ने.
तथाकथित 'श्राप से मुक्त' कराने को 5 साल की बच्ची की शादी कराने फैसला सुना दिया था पंचायत ने.

अप्रैल में फिर पंचायत बैठी. फैसला सुनाया कि यदि आरोपी को समाज में शामिल होना है तो उसे अपनी पांच साल की बेटी की शादी आठ साल के बच्चे से करानी होगी. गांव में शादी के लायक कई लड़के-लड़कियां हैं, लेकिन बछड़े को मारने की वजह से गांव पर श्राप लगा है. इस वजह से गांव में शादियां नहीं हो पा रही हैं. इसलिए आरोपी की लड़की की शादी करानी पड़ेगी. इतना ही नहीं इस फैसले से पहले आरोपी से गांव में भंडारा कराकर गंगा स्नान भी कराया गया था.
इस मामले का खुलासा तब हुआ जब पांच साल की बेटी की मां ने इसकी शिकायत पुलिस में की. महिला ने जो शिकायत जिला प्रशासन से की थी, उसमें बताया था कि तीन साल पहले उसके पति ने खेत पर गेहूं की फसल चर रहे बछड़े को पत्थर मार दिया था. इस वजह से बछड़े की मौत हो गई थी. इसके बाद पंचायत ने उसकी फैमिली का सामाजिक बहिष्कार कर दिया था.

2. दलित का किया गया बहिष्कार, तो कर लिया था सुसाइड

ये फरमान उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में सुनाया गया था. ये मामला भी इसी साल अप्रैल का है. गोपालपुर बारांडी गांव के रहने वाले 18 साल के रामू ने ट्रेन के आगे कूदकर खुद को ख़त्म कर लिया था, क्योंकि बछड़े को मारने के इल्ज़ाम में पंचायत ने उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया था.
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हुआ ये था कि रामू अपने पालतू बछड़े को घास चराने खेतों में ले जा रहा था, वहां उसने अपने ही बछड़े को हथौड़े से मार दिया था. इसके बाद वह उसे वहीं बांधकर घर लौट आया. 2 घंटे बाद रामू को गांववालों ने बताया कि उसके बछड़े की मौत हो गई है.
गांव के प्रधान बलराम तिवारी का कहना था, ‘आमतौर पर जिस पर गाय या बछड़े को मारने का इल्ज़ाम होता है, उसे गांव के बाहर एक साल तक अकेला रहना पड़ता है और खुद ही अपना खाना पकाना पड़ता है. शनिवार की सुबह 8 बजे चेरिया देवी (लड़के की मां) मेरे घर आई थीं. उन्होंने बताया कि 11 बजे इस मामले को लेकर पंचायत बैठेगी. उन्होंने मुझसे इसमें शामिल होने को कहा था. एक घंटे बाद वह चली गई और इसके बाद गांव वालों से पता चला कि रामू ने तो ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी है.’

अब बात महिला से भीख मंगवाने की

भिंड में मातादीनपुरा गांव की रहने वाली कमलेश 3 दिन भीख मांगकर घर वापस इसलिए आईं, क्योंकि उनकी तबीयत ख़राब हो गई थी. वो सड़क पर ही गिर पड़ी थीं. उनके बेटे अनिल श्रीवास ने बताया कि उनकी मां का समाज से बहिष्कार कर दिया गया. पंचायत ने कहा था कि सात दिन तक सात जगह भीख मांगे. इस पंचायत में 20-25 लोग इकठ्ठा हुए थे.
कमलेश (Source : NDTV)
भीख मांगने के दौरान कमलेश की तबीयत ख़राब हो गई. (Source : NDTV)

कमलेश का कहना है कि उन्होंने दूध निकालने से पहले दूध पीने के लिए बछड़े को छोड़ दिया था, जब बाद में उसे हटाने के लिए गले की रस्सी खींची तो रस्सी गले में फंस गई और बछड़े की मौत हो गई. बछड़े की मौत की ख़बर का पता चलते ही श्रीवास समाज की पंचायत बैठी. कमलेश को गौहत्या का दोषी ठहराया गया.
पंचायत ने सुना दिया बेतुका फैसला. सात दिन भीख और इलाहाबाद में गंगा स्नान. मामला मीडिया में आया तो श्रीवास समाज सफाई देने लगा कि गंगा स्नान का फैसला महिला को खुद का अपना था. वो खुद दोषमुक्त होना चाहती थी. श्रीवास समाज के ज़िला अध्यक्ष शम्भू श्रीवास का कहना है कि उन्होंने सबके सामने बात रखी कि वह गंगाजी जाएगी, क्योंकि उनसे बछड़े की हत्या हो गई है. पंचायत ने उन पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं डाला. फिलहाल परिवार खुलकर पंचायत के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहा है, क्योंकि उन्हें समाजिक बहिष्कार का डर है.
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गाय की रक्षा के नाम पर लोग हिंसक हुए जा रहे हैं.

इन मामलों को सुनकर पंचायत की बदअक्ली पर हैरानी होती है. तरस इसलिए आता है कि देश को डिजिटल इंडिया बनाने की कवायद चल रही है. मगर अभी तक लोग लकीर के फ़कीर बने बैठे हैं. जिनके लिए इंसान शुद्ध और अशुद्ध है.
ये पंचायतें वही हैं जो गाय के नाम पर भीड़तंत्र की हत्याओं पर कोई फरमान नहीं सुनाती. तब नहीं कहतीं कि इंसान को मारा है, जाओ शुद्ध होने के लिए गंगा स्नान करके आओ. गाय को मारने का ही नहीं अगर कोई भी जुर्म करता है तो उसके लिए पुलिस है. देश का कानून है. संविधान है. फिर क्यों इन अदालतों पर पुलिस छापेमारी नहीं करती. क्यों न कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर इन पंचायतों की रीढ़ तोड़ देनी चाहिए. जो फैसले नहीं बल्कि सज़ाएं सुनाती हैं. झगड़े का निपटारा अच्छी बात है लेकिन सज़ा देने का हक इन पंचायतों को किसने दिया?


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