जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) में पिछले तीस साल से तैनात सेना को हटाए जाने की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है. राज्य का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के तीन साल बाद सरकार कश्मीर के अंदरूनी इलाक़ों में सेना की मौजूदगी (Jammu Kashmir Army) कम करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है. अगर ये प्रस्ताव मंज़ूर हो गया तो सेना सिर्फ़ लाइन ऑफ़ कंट्रोल की ही निगरानी करेगी.
मोदी सरकार क्या सच में कश्मीर से सेना हटा देगी?
कुछ बात चल रही है.


मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, कश्मीर के भीतरी इलाक़ों से सेना को हटाने की चर्चा लगभग दो साल से चल रही है. इसमें रक्षा मंत्रालय और गृह मंत्रालय के साथ जम्मू-कश्मीर पुलिस भी शामिल है. अधिकारियों का कहना है कि ये बातचीत ऐडवांस स्टेज तक पहुंच गई है. प्रस्ताव में ये भी कहा गया है कि सेना के हटाए जाने के बाद क़ानून-व्यवस्था और आतंकवाद विरोधी अभियानों की ज़िम्मेदारी CRPF की ही होगी. एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया,
“ये बातचीत अलग अलग मंत्रालयों के बीच चल रही है. एक तरह से फ़ैसला कर लिया गया है और ये देखने वाली बात है कि इस पर अमल कब होगा. अंतत: ये एक राजनीतिक फैसला ही होगा.”
अफ़सरों के मुताबिक़, पूरे जम्मू-कश्मीर में सेना के लगभग 1.3 लाख जवान हैं. इनमें से क़रीब 80,000 जवान सीमा पर तैनात हैं. CRPF के साठ हज़ार 60,000 जवान हैं, जिनमें से 45,000 से ज़्यादा कश्मीर घाटी में तैनात हैं. कश्मीर के भीतरी इलाक़ों में आतंकवाद-रोधी अभियान का ज़िम्मा राष्ट्रीय राइफल्स के चालीस हज़ार 40 हज़ार 40,000-45,000 जवानों के हिस्से है. जम्मू-कश्मीर पुलिस में कुल 83,000 सिपाही हैं. इसके अलावा कुछ और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की कंपनियां भी घाटी में तैनात रहती हैं. क़ानून-व्यवस्था की हालत के हिसाब से इस संख्या को घटाया या बढ़ाया जाता है.
हालांकि, एक और वरिष्ठ अधिकारी ने ये भी कहा है कि फिलहाल कश्मीर को पूरी तरह से पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. सेना को सिलसिलेवार तरीक़े से हटाना होगा. जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक दलों के साथ-साथ सरकार के कुछ हिस्सों ने भी सेना की पूर्ण वापसी पर ज़ोर दिया है. कश्मीर में विपक्ष का कहना है कि अगर सरकार हालात सामान्य होने का दावा कर रही है, तो सेना को हटा दिया जाना चाहिए.
सेना को वापस बुलाए जाने पर बातचीत की ख़बरें आईं और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आना शुरू हो गईं. सरकार का दावा है कि अनुच्छेद 370 निरस्त किए जाने के बाद से ही जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी हिंसा कम हुई है और सुरक्षाकर्मियों की हत्याओं में भी पहले के मुक़ाबले 50 फीसदी की कमी आई है.
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