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उम्र चार साल, जेल से निकलने को तैयार नहीं

एक हिन्दुस्तानी ने ली पाकिस्तान में बन्दूक चलाने की ट्रेनिंग. वहां से वापस आकर कर दिया सरेंडर. अब उसका बच्चा भी जेल में कैद है. लेकिन बाहर निकलना ही नहीं चाहता.

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फोटो - thelallantop
कश्मीरी यूथ के लिए एक स्कीम निकली थी. उसमें ये था कि 1 जनवरी 1989 से 31 दिसम्बर 2009 के बीच जिन लड़कों ने बॉर्डर पार करके पाकिस्तान में एंट्री मार ली थी और आतंकवादी बन गए, वो इंडिया आकर सरेंडर कर दें तो सरकार उनके पुनर्वास का इंतजाम कर देगी. ऐसा सुनके 43 साल का गुलज़ार अहमद अपना बोरिया बिस्तरा समेट कर इंडिया की ओर चल पड़ा. गुलज़ार जब ग्यारहवीं क्लास में पढ़ता था तो पी.ओ.के. क्रॉस करके पाकिस्तान चला गया. वहां इसने बन्दूक चलाने की शिक्षा ली और फुल आतंकवादी मटेरियल बन गया. लेकिन कश्मीर की वादियों में लोगों को मारने की बजाय वो मुज़फ्फ़राबाद में सेटल हो गया. वहां उसने शादी भी कर ली. बीवी को बच्चा नहीं हुआ तो दूसरी शादी कर ली. दूसरी शादी से एक बच्चा हुआ. बच्चे का नाम पड़ा इफ़्तेख़ार अहमद. दूसरी बीवी मर गयी. अब वो अपनी पहली बीवी और बच्चे के साथ रह रहा था. पुनर्वास स्कीम के बारे में मालूम चलने पर इंडिया वापस आते वक़्त गुलज़ार अपने साथ बच्चे को भी लेकर चला आया. गुरुवार को इंडिया आने के बाद गुलज़ार ने एक दिन अपने घर पर बिताया और शुक्रवार को पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. उस वक़्त भी इफ़्तेख़ार उसके साथ ही था. अब हालत ये है कि गुलज़ार को जेल हो जाने पर उसका चार साल का बेटा इफ़्तेख़ार भी उसके साथ ही जेल में रह रहा है. पुलिस ने कहा है कि वो बच्चा बाहर जाने को फ़्री है लेकिन इफ़्तेख़ार अपने बाप को छोड़ने को तैयार ही नहीं है. वो यहां किसी को जानता ही नहीं है. अपने रिश्तेदारों से पूरी तरह से अनजान है. Ansar Burney पाकिस्तान के ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट अंसार बर्ने ने मिनिस्ट्री ऑफ़ एक्सटर्नल अफेयर्स को ट्वीट करते हुए कहा कि पाकिस्तानी नागरिकता वाले इफ़्तेख़ार को छोड़ दिया जाए. इस पर गंदेरबल के एस.पी. इम्तियाज़ इस्माइल ने ये बताया कि बच्चा जाने को फ़्री है. उसका बाप पाकिस्तान से वापस आया है और कानून के हिसाब से उसे अरेस्ट किया गया है. चार साल के बच्चे को कोई क्यूं अरेस्ट करेगा. वो जाना चाहे तो जा सकता है लेकिन वो अपने बाप को छोड़ना ही नहीं चाहता. कश्मीर के गुमराह यूथ को वापस इंडिया बुलाकर उनके पुनर्वास की ये स्कीम उमर अब्दुल्ला ने शुरू की थी. और इसकी शुरुआत के बाद से 1250 लोग जिसमें बच्चे और औरतें भी शामिल थीं.

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