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पाकिस्तान: 'इस SC हिंदू रिपोर्टर के बर्तन अलग कर दो'

वहां की न्यूज एजेंसी वालों की हरकत है ये. पानी पीने का रखवाया अलग गिलास.

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साहिब ओड . facebook
हद है. बेशर्मी की भी और जहालत की भी. एक तरफ चिल्लाते हैं इस्लाम में बराबरी का दर्जा दिया गया है दूसरी तरफ इतना भेदभाव कि भेदभाव भी चुल्लू भर पानी में डूब मरे. पाकिस्तान में एक रिपोर्टर का पानी का गिलास इसलिए अलग कर दिया क्योंकि वो अनुसूचित जाति का हिंदू था. भाईचारे का कसीदा पढ़ा जाता है. शांति का मैसेज दिया जाता है. और हां भाईचारे वाला त्योहार तो जुलाई में आने वाला ही है. वही त्योहार जिसमें गले लगाया जाता है. त्योहार है ईद-उल-फितर. उससे ठीक पहले अल्लाह वाले महीने रमजान में पत्रकार को अपने बर्तन अलग करने को बोल दिया गया. वो भी उस जगह, जहां वो काम करता है. सीनियर रिपोर्टर हैं साहिब खान ओड. पाकिस्तान की सरकारी न्यूज़ एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस में हैं. जब सहयोगियों को पता चला कि वो हिंदू हैं तो फरमान जरी कर दिया कि वो पानी पीने के लिए अलग गिलास का इस्तेमाल करे. सहयोगियों को साहिब खान के हिंदू होने का तब पता चला, जब एक बार उसका छोटा बेटा राज कुमार उसके साथ ऑफिस आया.
खान का कहना है कि सब उसे पहले मुसलमान समझते थे. जैसे ही उन्हें पता चला में अनुसूचित जाति का हिंदू हूं तो ब्यूरो चीफ ने मुझ से अलग गिलास का इस्तेमाल करने को बोला. रमजान शुरू होने से ऑफिस का माहौल चेंज हो गया. सब इफ्तार के टाइम एक ही मेज पर बैठकर खाना खाते थे. मुझे सुझाव दिया गया कि अगर वो ऑफिस में साथ खाना चाहता है तो प्लेट और गिलास अलग लाए, तब मुझे प्लेट और गिलास खरीदना पड़ा.
एपीपी कराची ब्यूरो चीफ परवेज असलम ने इस बात से इनकार किया. उसने कहा कि साहिब खान को फ्लू था इसलिए उसे ऐसा बोला गया. वो भेदभाव का गलत दुष्प्रचार कर रहा है. आप खुद आकर देख सकते हैं कैसे लोग एक साथ इफ्तार करते हैं. वहीं एपीपी के मैनेजर डायरेक्टर मसूद मालिक ने कहा कि मामले की जांच शुरू कर दी गई है. पाकिस्तान इंस्टिट्यूट ऑफ लेबर एजुकेशन एंड रिसर्च ने फेडरल इनफार्मेशन मिनिस्टर परवेज राशिद को लेटर लिखा है. इंस्टिट्यूट के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर करामत अली ने लेटर में लिखा कि ये बेहद दुःख की बात है. एक पत्रकार को सिर्फ इसलिए एक गिलास में पानी नहीं पीने दिया क्योंकि वो हिंदू था. मामले की जांच हो और एक्शन लिया जाए.
ऐसे जाहिल लोगों को साहिब खान ओड से सीख लेनी चाहिए जिसका नाम ही भेदभाव को कुचल देने के लिए काफी है. हैरानी की बात तो ये है ये भेदभाव पत्रकार बिरादरी ने किया. जब बेहतर रास्ता दिखाने वाले ही भटके हुए रस्ते पर होंगे तो उनका मुस्तकबिल कैसा होगा ?
लगता है जब अल्लाह मियां अक्ल बांट रहा था तो ये जाहिल सो रहे थे. या फिर ये सोचकर नहीं ली कि ये खाने की चीज तो है नहीं. क्या करेंगे ? तभी तो ऐसी हरकत कर बैठते हैं, जिससे यकीन नहीं होता क्या ये भी इंसान हैं.

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