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सरकार जिस विकास के दावे करती रही उसके आंकड़े डराने वाले हैं

जानिए देश की तरक्की की रफ्तार को ब्रेक कौन लगा रहा है?

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हर तीन महीने पर सरकार जारी करती है जीडीपी के आंकड़े. सांकेतिक तस्वीर.
देश की जीडीपी में हुई गिरावट ने खलबली मचा दी है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी गिरकर 6.6 फीसदी रह गया है. ये तीसरी तिमाही यानी अक्टूबर से दिसंबर के बीच का आंकड़ा है. ये बीते डेढ़ साल में सबसे कम है. ये आंकड़े केंद्रीय सांख्यकीय संगठन यानी सीएसओ ने जारी किए हैं. पहली तिमाही में विकास दर 8 फीसदी और दूसरी में 7 फीसदी थी. इस गिरावट के बाद भी भारत के विकास की रफ्तार चीन समेत पूरी दुनिया से तेज है. तीसरी तिमाही में चीन की विकास दर 6.4 फीसदी थी. नए आंकड़ों में सीएसओ ने देश की विकास दर का अनुमान भी 7.2 फीसदी से कम करके 7 फीसदी कर दिया है. अनुमान सही रहा तो ये पिछले पांच साल में भारत की सबसे कम विकास दर होगी. पर ये जीडीपी विकास दर होती क्या है? इसे भी समझना जरूरी है.
भारत की विकास दर में गिरावट के लिए घरेलू और विदेशी मांग में आई कमी को जिम्मेदार बताया जा रहा है. दरअसल विकास दर का मांग से सीधा रिश्ता है. देश में कारोबार और उद्योग बेहतर ढंग से काम करते हैं और ज्यादा उत्पादन होता है तो विकास दर बेहतर रहती है. इसके अलावा सेवा क्षेत्र का असर भी जीडीपी में दिखता है.
देश भर में जितना उत्पादन होता है, उसे जीडीपी में जोड़ा जाता है. सांकेतिक तस्वीर.
देश भर में जितना खेती में उत्पादन होता है, उसे जीडीपी में जोड़ा जाता है. सांकेतिक तस्वीर.

जीडीपी होती क्या बला है?
जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट. हिंदी में इसे कहते हैं सकल घरेलू उत्पाद. इसके एक-एक शब्द पर ज़रा गौर करें. मतलब अपने आप साफ हो जाएगा. सकल का मतलब सभी. घरेलू माने घर संबंधी. यहां घर का आशय देश से है. उत्पाद का मतलब है उत्पादन. कुल मिलाकर अर्थ हुआ देश में हो रहा हर तरह का उत्पादन. ये उत्पादन कहां होता है? कारखानों और खेतों में. कुछ साल पहले इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और कंप्यूटर जैसी अलग-अलग सेवाओं यानी सर्विस सेक्टर को भी जोड़ दिया गया. इस तरह उत्पादन और सेवा क्षेत्र की तरक्की या गिरावट जीडीपी के आंकड़ों में दिखाई देती है. ये आंकड़े तीन महीने में और साल भर में जारी किए जाते हैं. आसान भाषा में कहें तो अगर जीडीपी आंकड़ा बढ़ा है, तो देश की माली हालत अच्छी है. और गिरा है तो हालत पतली है.तीन महीने में जारी किे जाने वाले आंकड़ों को तिमाही और साल में जारी होने वाले आंकड़ों को सालाना बोलते हैं. भारत में कारोबारी साल अप्रैल से मार्च तक होता है. इस दौरान कुल 4 तिमाही अप्रैल से जून, जुलाई से सितंबर, अक्टूबर से दिसंबर और दिसंबर से मार्च तक होती हैं. अभी जो आंकड़े आए हैं, वे अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही यानी तीसरी तिमाही के आए हैं.
कारखानों के उत्पादन को भी जीडीपी में जोड़ा जाता है. सांकेतिक तस्वीर.
कारखानों के उत्पादन को भी जीडीपी में जोड़ा जाता है. सांकेतिक तस्वीर.

जीडीपी का आकलन आधार वर्ष के जरिए किया जाता है
जीडीपी का आकलन एक आधार वर्ष के जरिए होता है. इसे दो तरह से पेश किया जाता है. पहला कांस्टेंट प्राइस और दूसरा करेंट प्राइस. कांस्टेंट प्राइस में एक आधार वर्ष को बेस बना लेते हैं. फिर उसके मुताबिक उत्पादन के मूल्य में बढ़त या गिरावट देखी जाती है. अगर आधार वर्ष 2011 माना गया. तो जीडीपी की दर और उत्पादन का मूल्य साल 2011 के उत्पादन की कीमत के आधार पर घटत या बढ़त देखी जाएगी. करेंट प्राइस के तहत उत्पादन मूल्य में महंगाई दर को भी शामिल किया जाता है. साल 2015 की जनवरी में सीएसओ ने जीडीपी का आधार वर्ष भी बदल दिया था. उसने जीडीपी आकलन का 2004-05 का पुराना आधार वर्ष खत्म करके साल 2011-12 को नया बेस ईयर बना दिया है. अब इसी के आधार पर विकास दर का अनुमान लगाया जाता है.
केंद्रीय साख्यिकी संगठन क्या होता है?
ये सारे आंकड़े जुटाना और जारी करना केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय का काम है. ये विभाग भारत सरकार के केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के तहत काम करता है. देश भर में आप जो तरह-तरह के डेटा देखते हैं, उनको यही विभाग जुटाता और जारी करता है. जीडीपी के आंकड़े भी यही ऑफिस रिलीज़ करता है.


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