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कौन हैं अकबर अली जिन्हें अखबार बेचकर फ्रांस का बड़ा नागरिक सम्मान मिल गया?

फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने देश के आखिरी अखबार विक्रेता माने जाने वाले पाकिस्तानी मूल के अली अकबर को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक 'National Order of Merit' से सम्मानित किया है. पिछले साल 5 अगस्त को अली अकबर को यह अवार्ड देने की घोषणा की गई थी.

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फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने अली अकबर का सम्मान किया. (एक्स)

कोई भी शहर केवल ईंट-पत्थर या फिर संगमरमर का ढांचा भर नहीं होता. शहर यहां रहने वाले लोगों के सामूहिक अनुभव, इतिहास और स्मृतियों से बनता है. अनुभव, इतिहास और स्मृतियां सिर्फ विशिष्ट लोगों की नहीं. इसमें पैबस्त हो सकती है किसी रेहरी पटरी या खोमचा लगाने वाले की आवाज या फिर अखबार बांट रहे किसी हॉकर का अनोखा अंदाज. फ्रांस में ऐसी ही एक शख्सियत का सम्मान हुआ है जो पांच दशकों से ज्यादा समय से पेरिस की सड़कों पर घूम-घूमकर अखबार बांट रहे हैं और शहर को खबरों की दुनिया से वाबस्ता कर रहे हैं.

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73 साल के अली अकबर पिछले पांच दशकों से पेरिस की सड़कों पर लोगों का अभिवादन करते और समाचार की सुर्खियों की पैरोडी सुनाते-सुनाते शहर के सांस्कृतिक ताने बाने का अहम हिस्सा बन गए हैं. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने देश के आखिरी अखबार विक्रेता माने जाने वाले पाकिस्तानी मूल के अली अकबर को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक 'नेशनल ऑर्डर ऑफ मेरिट' (National Order of Merit) से सम्मानित किया है.    

द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, एलिसी पैलेस में आयोजित एक समारोह में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने उनको सम्मानित करते हुए उन्हें 'फ्रांसीसियों में सबसे ज्यादा फ्रांसीसी' बताया. उनके लिए इमैनुअल मैक्रों ने कहा, 

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आप '6th arrondissement' (पेरिस का सबसे वीआईपी एरिया) की पहचान हैं. गर्मजोशी से भरी एक आवाज जो 50 साल से हर दिन सेंट जर्मेन के स्टेडियमों में गूंजती रही है. रेस्तरां की मेजों के बीच से अपना रास्ता बनाती हुई.

पिछले साल 5 अगस्त को ही अली अकबर को यह अवॉर्ड देने की घोषणा की गई थी. तब रॉयटर्स से बात करते हुए उन्होंने पेरिस में हर दिन घूमने से मिलने वाली खुशी को बयां किया था. सेंट जर्मेन डेस प्रेज (पेरिस का एक इलाका) की पथरीली सड़कों पर चलते हुए अकबर ने कहा, 

यह लोगों का प्यार है. अगर पैसे की बात होती तो मैं कुछ और कर सकता था. लेकिन इन लोगों के साथ मेरा समय बहुत बढ़िया बीतता है.

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पाकिस्तान के रावलपिंडी में जन्मे अली अकबर साल 1973 में पेरिस पहुंचे थे. यहां आकर उन्होंने ऐसी नौकरी की तलाश की जिससे वह पाकिस्तान में रह रहे अपने माता-पिता और सात भाई-बहनों की देखभाल कर सकें. व्यंग्य पत्रिकाएं बेचने वाले अर्जेंटीना मूल के एक छात्र की मदद से अकबर को हॉकर की नौकरी मिल गई और वो शहर के गिने चुने अखबार बेचने वालों में शामिल हो गए. उनकी मुस्कान, सेंस ऑफ ह्यूमर और दिन में कई मील पैदल चलने की धुन ने लोगों को काफी प्रभावित किया. और उनकी गाड़ी चल निकली.

अली अकबर दिन में फ्रांस के प्रतिष्ठित संस्थान साइंसेज पो के छात्रों को अखबार बेचते थे और रात में वह पुलों के नीचे और गंदी झोपड़ियों में सोते थे. क्योंकि किसी तरह से पैसे जोड़कर पाकिस्तान भेजने होते थे. उनके ग्राहकों में इमैनुअल मैक्रों और एडवर्ड फिलिप भी शामिल रहे, जो आगे चलकर फ्रांस के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बने. 

जैसे जैसे समय बीतता गया अकबर लेफ्ट बैंक के रेस्तरां और बार में एक जाना पहचाना नाम बन गए. धीरे-धीरे पेरिस में उन्होंने अपनी गृहस्थी बसाई. शादी की और पांच बच्चों के पिता बने. अकबर बताते हैं,

 अब अखबार उद्योग ढलान पर है. एक समय मैं दिन में 200 अखबार आसानी से बेच लेता थे. लेकिन अब आठ घंटे में 'ले मोंडे' की लगभग 20 प्रतियां बेचता हूं. सब कुछ डिजिटल हो गया. लोग अब अखबार नहीं खरीदते.

सम्मान लेने से पहले अली अकबर ने बताया कि यह सम्मान मिलना उनके लिए गर्व की बात है. यह उनके जीवन भर के कई घावों पर मरहम का काम करेगा. अखबार की बिक्री में लगातार आ रही गिरावट के बावजूद अली अकबर का इरादा इस धंधे को छोड़ना नहीं है. उन्होंने बताया कि जब तक उनमें ताकत है वो शहर की सड़कों और कैफे में अखबार बेचते रहेंगे. उन्होंने मजाक में कहा, 'रिटायरमेंट तो कब्रिस्तान तक टालनी पड़ेगी.'

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