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"आरोपी से जबरन कम्प्यूटर पासवर्ड नहीं ले सकते, क्योंकि...", कोर्ट ने CBI से कहा

कोर्ट ने कहा कि आरोपी पर इसके लिए दबाव नहीं डाला जा सकता है.

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CBI ऑफिस. (फाइल फोटो: PTI)

दिल्ली की एक अदालत ने जांच एजेंसियों द्वारा जब्त की गई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है. कोर्ट ने एक CBI मामले में कहा कि जांच अधिकारी को आरोपी की सहमति के बिना उसके कम्प्यूटर का पासवर्ड नहीं दिया जा सकता है. न्यायालय ने कहा कि इससे व्यक्ति के निजता के अधिकार का हनन होता है.

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अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, विशेष जज नरेश कुमार लाका ने CBI की इस मांग को खारिज कर दिया कि उसे आरोपी के कम्प्यूटर की यूजर आईडी और पासवर्ड मुहैया कराया जाए. कोर्ट ने कहा कि इसके लिए आरोपी पर दबाव नहीं बनाया जा सकता है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 20(3) और CrPC की धारा 161(2) के तहत उसे सुरक्षा मिली हुई है.

संविधान के अनुच्छेद 20(3) में ये प्रावधान किया गया है कि किसी भी अपराध के आरोपी को खुद के ही खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है. वहीं CrPC की धारा 161(2) के तहत किसी भी व्यक्ति को ऐसे सवालों का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है 'जो उस व्यक्ति को ही किसी आपराध या दंड का भागीदार बना दे'.

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‘निजी डेटा हो सकता है’

कोर्ट ने कहा कि उस कम्प्यूटर में निजी डेटा भी हो सकता है और अगर उसका खुलासा होता है, तो इससे उसकी निजता का हनन हो सकता है. हालांकि कोर्ट ने ये भी कहा, 

'लेकिन विशेष एजेंसी या व्यक्ति की मदद से उस कंप्यूटर सिस्टम के डेटा को खोलने/डिक्रिप्ट/एक्सेस करने के लिए आईओ (जांच अधिकारी) की शक्तियों पर रोक नहीं है.'

दिल्ली कोर्ट ने इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया है. विशेष तौर पर शीर्ष अदालत के नार्को/लाई डिटेक्टर टेस्ट फैसले का जिक्र है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि 'इस तरह के टेस्ट में आरोपी की निजी जानकारी शामिल होती है, इसलिए ये सब उसकी मंजूरी के बिना नहीं किया जा सकता है.'

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कोर्ट ने कहा, 'यही लॉजिक पासवर्ड पर भी लागू होता है क्योंकि इसमें व्यक्ति की निजी जानकारी होती है.'

कोर्ट ने कहा कि अमेरिका में अगर गैरकानूनी तरीके से सबूत हासिल किए जाते हैं, तो उन्हें न्यायालय में स्वीकार नहीं किया जाता है. वहीं अगर भारत में इस तरीके से सबूत इकट्ठा किए जाते हैं, तो तब भी कुछ परिस्थितियों में उनका इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए संविधान के अनुच्छेद 20(3) के उल्लंघन होने का खतरा बना रहता है, ऐसे में सावधानी बरतने की जरूरत है.

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