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पटियाला हाउस मारपीट केस: वीडियो होने के बावजूद BJP- कांग्रेस के नेता बरी कैसे हो गए?

कोर्ट ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष की क्या-क्या कमियां बताई हैं?

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(बाएं) अमीक जामेई पर हुए हमले के समय की एक तस्वीर, साभार- यूट्यूब. (दाएं) बीजेपी नेता ओपी शर्मा, तस्वीर उनकी ट्विटर अकाउंट से है.
फरवरी 2016 की घटना है. CPI के पूर्व सदस्य अमीक जामेई दिल्ली की पटियाला कोर्ट के बाहर खड़े थे. वे JNU राजद्रोह मामले में आरोपी बनाए गए JNU छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी का इंतजार कर रहे थे. उसी दौरान कुछ लोगों ने अमीक जामेई पर धावा बोल दिया. इस घटना का वीडियो भी मीडिया-सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था. अमीक जामेई ने आरोप लगाया था कि उन पर हमला करने वालों में BJP विधायक ओम प्रकाश शर्मा और पूर्व कांग्रेसी विधायक तरविंदर सिंह मार्वाह शामिल थे. लेकिन 26 अक्टूबर 2021 को इन दोनों नेताओं को अदालत ने सभी आरोपों से मुक्त कर बरी कर दिया.

इस फैसले की वजह क्या है? 

ओपी शर्मा और तरविंदर सिंह मार्वाह को बरी करने का फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की कमियों का जिक्र किया. अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रैट रवींद्र कुमार पांडेय ने कहा,
"इस मामले से जुड़े वीडियो को रिकॉर्ड करने वाले जर्नलिस्ट से गवाह के तौर पर कोई पूछताछ नहीं की गई और ना ही उसे इस जांच का हिस्सा बनाया गया. किसी भी गवाह से पूछताछ नहीं की गई और ना ही कोर्ट में पेश किया गया. ना ही ऐसा करने के पीछे जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष की तरफ से कोई सही स्पष्टीकरण कोर्ट को दिया गया."
अदालत ने अपने फैसले में ये भी कहा,
"आरोपी ओपी शर्मा और शिकायतकर्ता अमीक जामेई दोनों ही अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों से आते हैं. दोनों एक दूसरे को 2013 से जानते हैं. जामेई ने FIR में ओपी शर्मा का नाम नहीं बताया था और उस हमले में शर्मा का क्या रोल है इसके बारे में कुछ नहीं लिखा था. 27 अक्टूबर 2020 और 3 फरवरी 2021 को एक गवाह के तौर पर उन्होंने अपना बयान दिया. उस समय उन्होंने कुछ और बातें बताईं जो उन्होंने अपनी शिकायत में नहीं लिखी थीं."
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमीक जामेई ने तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन में दर्ज अपनी FIR में दावा किया था कि घटना के समय प्रोफेसर आयशा किदवई के साथ भी हाथापाई की गई थी. वे और अन्य लोग अमीक के साथ मौजूद थे. उनके मुताबिक बीजेपी नेता ने उन्हें धमकी देते हुए ये भी कहा था, "अगर बंदूक होती तो गोली मार देता." लेकिन जांच के दौरान अमीक ने पुलिस को ना तो ये बताया कि घटना के समय आयशा किदवई और अन्य लोग भी उनके साथ मौजूद थे और ना ही वो तरविंदर सिंह मार्वाह को पहचान पाए जो कथित रूप से हमलावर भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे. कोर्ट ने अपने फैसले में इन बातों का भी जिक्र किया है. उसने ये भी कहा कि अमीक ने केवल इस आधार पर एफआईआर में मार्वाह पर आरोप लगाया था कि उन्हें पीटने वाली भीड़ में किसी ने कांग्रेस नेता का नाम लिया था. बता दें कि इस मामले में ओपी शर्मा और तरविंदर सिंह मार्वाह पर आईपीसी की धारा 323 (किसी को चोट पहुंचाना), 314 (गलत मंशा से किसी को रोकना), 34 (आपराधिक मंशा) और 506 (धमकी देना) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था. इन सभी धाराओं से अब इन्हें मुक्त कर बरी कर दिया गया है.

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