बालाघाट से नागपुर का सफर कोई छोटा नहीं. डॉ. प्रज्ञा के घरवालों ने इस पर आपत्ति जताई. कहा कि इतना लंबा सफर अकेले कैसे तय करोगी. लेकिन बेटी की इच्छाशक्ति देखकर घरवालों को भी अपनी सहमति देनी ही पड़ी. 19 अप्रैल की सुबह निकलीं डॉ. प्रज्ञा उसी दोपहर नागपुर पहुंच गईं. यहां तक कि पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही उन्होंने ड्यूटी भी जॉइन कर ली.

कोरोना के बढ़ते मामलों की वजह से छुट्टी के बीच से ही डॉ. प्रज्ञा को वापस बुला लिया गया. फोटो - इंडिया टूडे फाइल (रिप्रेज़ेन्टेशन के लिए )
आजतक से बात करते हुए डॉ. प्रज्ञा ने बताया कि वो नागपुर में डेली 6 घंटे एक कोविड हॉस्पिटल में ड्यूटी करती हैं. वहां वो आरएमओ के पद पर कार्यरत हैं. इसके साथ ही वो शाम की शिफ्ट में एक और हॉस्पिटल में अपनी सेवाएं देती हैं. इसकी वजह से उन्हें रोज लगभग 12 घंटे पीपीई किट पहनकर काम करना पड़ता है.
प्रज्ञा ने आगे बताया कि वो अपने घर आईं थीं. इस दौरान लॉकडाउन लग जाने की वजह से नागपुर लौटने का कोई साधन नहीं मिला. लेकिन जब उन्हें मालूम हुआ कि कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है, तो वो अपनी स्कूटी लेकर ही नागपुर के लिए रवाना हो गईं.
180 किलोमीटर. लगभग इतना ही फासला है बालाघाट और नागपुर के बीच. 7 घंटे लगे डॉ. प्रज्ञा को ये रास्ता कवर करने में. उन्होंने बताया कि धूप और गर्मी की वजह से दिक्कत भी हुई. उनके पास सामान भी ज़्यादा था. ऊपर से रास्ते में कुछ खाने-पीने को भी नहीं मिला. लेकिन उन्हें इस बात की संतुष्टि है कि वो दोबारा अपने काम पर लौट आईं.


















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