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कांग्रेस अध्यक्ष कमरे में बंद थे और सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्ष बन गईं!

कांग्रेस में नए अध्यक्ष पद के लिए 17 अक्टूबर को चुनाव होगा.

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बाएं से दाहिने. सोनिया गांधी और सीताराम केसरी. (क्रेडिट- इंडिया टुडे/my nation)

तमाम आलोचनाओं और अटकलों के बीच कांग्रेस कार्य समिति (Congress) ने फैसला किया है कि 17 अक्टूबर को पार्टी के अध्यक्ष पद (Congress President Election) का चुनाव होगा. कहा गया है कि इस पद के लिए 'कोई भी' दावेदारी पेश कर सकता है. 

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इससे पहले साल 2001 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा गया था, जिसमें सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) को जीत मिली थी और जितेंद्र प्रसाद को हार का सामना करना पड़ा था. यानी कि पूरे 21 साल पहले इस तरह के चुनाव में दो उम्मीदवार आमने-सामने थे. कांग्रेस अध्यक्ष के लिए साल 2017 में भी चुनाव हुआ था, लेकिन इसमें राहुल गांधी निर्विरोध चुने गए थे.

बहरहाल, अपने 138 साल लंबे राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस ने कई तरह के संकटों का सामना किया है, लेकिन संभवत: यह पहला मौका है जब वह अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. इसलिए ऐसे समय में पार्टी के लिए एक ‘योग्य' अध्यक्ष चुनना और बड़ी चुनौती है. हालांकि बड़ा सवाल यह है कि ये ‘चुनाव होगा या चयन’. खैर, एक नजर डालते हैं पिछले चुनाव और उससे पहले हुए घटनाक्रमों पर.

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नरसिम्हा राव का चुनाव

कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए कश्मकश नई नहीं है. पार्टी में वर्चस्व की ये लड़ाई तब और खुलकर सामने आ गई थी, जब 1991 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी की हत्या हुई और पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने थे. इसके अगले साल ही राव कांग्रेस अध्यक्ष भी बनाए गए थे. 

ये दौर कई मामलों में महत्वपूर्ण था. जब 1990 के दशक के शुरुआत में आर्थिक बदलाव हो रहे थे और बाबरी मस्जिद गिराई गई थी तो उस समय गांधी परिवार का कोई व्यक्ति अध्यक्ष नहीं था. ऐसे में नरसिम्हा राव के सामने कई चुनौतियां थीं और वह गांधी परिवार की तरफ से भी निशाने पर थे.

हालांकि तब तक सोनिया गांधी पार्टी में शामिल नहीं हुई थीं. उन्होंने कांग्रेस के कई वफादार लोगों की मांग को दरकिनार करते हुए पार्टी में शामिल होने से मना कर दिया था. उस समय उनके बच्चे छोटे भी थे.

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लेकिन नरसिम्हा राव के साथ सोनिया गांधी की अनबन भी किसी से छिपी नहीं थी. बाबरी मस्जिद के विध्वंस को रोकने में राव की कथित अनिच्छा और अटल बिहारी वाजपेयी के लिए उनकी प्रशंसा को लेकर सोनिया गांधी ने नाराजगी जाहिर की थी.

हालांकि दोनों के बीच विवाद की बड़ी वजह राव का वो फैसला था, जिसमें उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा बोफोर्स घोटाले में राजीव गांधी के खिलाफ केस खारिज करने को चुनौती दी थी.

हालांकि, राव के निधन के कई सालों बाद साल 2020 में सोनिया गांधी ने नरसिम्हाराव की नेतृत्व योग्यता की बात की थी और कहा था कि पार्टी को उनकी भूमिका पर गर्व है.

Sonia Gandhi कैसे अध्यक्ष बनीं?

साल 1996 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था और बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता में आए थे. हालांकि वह कुछ दिनों के लिए ही पद पर रहे थे और बहुमत नहीं होने के कारण उनकी सरकार गिर गई थी.

इसके बाद 1996 से 1998 के बीच जनता दल के दो नेता- एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने थे. कांग्रेस ने उन्हें बाहर से समर्थन दिया था. इन दो सालों में सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे, जो कि नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के व्यक्ति थे. केसरी करीब दो दशकों से पार्टी के कोषाध्यक्ष थे. राव ने उनके लिए रास्ता तैयार किया था.

लेकिन इन सब के बीच एक और बड़ी चीज हो रही थी. सोनिया गांधी साल 1997 में कांग्रेस में शामिल हो गई थीं और ऐलान किया था कि 1998 में वह लोकसभा चुनाव लड़ेंगी. इस बीच केसरी के खिलाफ भी माहौल बनने लगा था. शरद पवार और राजेश पायलट ने कांग्रेस को चुनौती दी थी.

हालांकि सोनिया गांधी ने बाजी मारी और वह अचानक कांग्रेस अध्यक्ष बना दी गई थीं. कहा जाता है कि केसरी के साथ जो हुआ वह एक 'रक्तहीन तख्तापलट' था और लोकसभा चुनाव के बाद मार्च 1998 में सीताराम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था.

दरअसल सरकार गठन को लेकर कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक हुई थी. लेकिन मीटिंग में ही कुछ लोगों ने केसरी पर निशाना साधा और उनसे कहा कि वे सोनिया गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की एक बैठक बुलाएं.

हालांकि सीताराम केसरी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और मीटिंग से बाहर चले गए. इसी बीच सदस्यों से मौका पाकर एक प्रस्ताव पारित किया और सोनिया गांधी को पार्टी अध्यक्ष बना दिया गया. इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक यह भी कहा जाता है कि केसरी एक रूम में बंद थे और सोनिया गांधी को 'आसानी से' पद पर काबिज कर दिया गया था.

सोनिया के खिलाफ किसने लड़ा चुनाव?

साल 1998 में नाटकीय घटनाक्रमों के तहत अध्यक्ष बनाए जाने के बाद सोनिया गांधी को साल 2001 में चुनाव लड़ना पड़ा था. कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में उस समय उनके सामने जितेंद्र प्रसाद थे, जिन्होंने गांधी को चुनौती दी थी. हालांकि इस चुनाव में भी सोनिया गांधी को एकतरफा जीत मिली थी.

इस चुनाव में सोनिया गांधी को पार्टी कार्यकर्ताओं के 98.7 फीसदी वोट (7448 मत) मिले थे, जबकि प्रसाद को 1.2 फीसदी वोटों (94 मत) से संतोष करना पड़ा था.

ये जितेंद्र प्रसाद वही हैं जिनके बेटे जितिन प्रसाद ने पिछले साल कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया था. शाहजहांपुर के रहने वाले जितेंद्र प्रसाद तीन बार अपने गृह जिले से ही सांसद चुने गए. इसके अलावा कांग्रेस ने उन्हें दो बार राज्य सभा भी भेजा.

सोनिया गांधी की अगुवाई में कांग्रेस दो बार सत्ता में आई और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. हालांकि उनके कार्यकाल में ही कांग्रेस को अपने इतिहास की सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा और 2014 के लोकसभा चुनाव में वह 44 सीटों पर सिमट गई थी. इसके बाद कई राज्यों में भी पार्टी की हार हुई और कई बड़े नेता पार्टी छोड़ कर चले गए.

जाहिर है ऐसे माहौल में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठने लगा और अध्यक्ष को बदलने की मांग की गई. कांग्रेस ने राहुल गांधी का कार्ड खेला और सोनिया गांधी ने लगातार करीब 19 सालों के बाद अपने बेटे के लिए अध्यक्ष पद छोड़ा था.

हालांकि दो साल बाद हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा. राहुल गांधी ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया और मांग की कि गांधी-नेहरु परिवार के अलावा किसी को अध्यक्ष बनाया जाए. इस बीच सोनिया गांधी को कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष बना दिया गया. अब लगभग तीन सालों की देरी के बाद अध्यक्ष पद के लिए चुनाव की घोषणा की गई है.

वीडियो: गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने पर मनीष तिवारी ने राहुल गांधी पर क्या बोला दिया?

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