अभी कुछ दिन पहले मैं अपनी बुआ के घर गई थी. शादी थी. बहुते हैप्पी-हैप्पी थी. क्योंकि गांव बहुत दिनों बाद जाने का मौका लगा था. बारात वाले दिन हम बहनों को कुछ सामान लेना था. सारे शादी की तैयारियों में बिजी में थे. कोई बाजार तक ले जाने वाला नहीं था. हमने खुद ही पैदल जाने की सोची. मेरी फुफेरी बहन ने कहा, दीदी चलो शॉर्टकट से चले चलेगें और जल्दी वापस आ जाएगें. मुझे नहीं पता था कि वो शॉर्टकट खेत होगा. खेत के रास्ते बाजार के लिए हो लिए. मेरी बहन ने खेत में घुसने से पहले ही कहा था, ध्यान से चलना दीदी. यहां लोग खेत में ही टट्टी करते हैं. मैंने कहा कौन सा हम टट्टी को धांग देगें. चार आंखें भगवान ने काहे लिए दे रखा है. वो हंसने लगी और हम निकल पड़े. बतियाते जा रहे थे कि अचानक मेरी बहन का पैर पच से टट्टी पर पड़ा. और हम लोग लगे जोर-जोर से हंसने.
66 बच्चे, जंगल में टट्टी करने गए थे, पर कभी वापस नहीं आए
दिल्ली के शाहबाद डेयरी की बात है, जहां बच्चों की मम्मियां शाम के बाद उन्हें खाना नहीं देती ताकि टट्टी न आ जाए.
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Reuters
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मैंने टिश्यु पेपर दिया पर उसने मना कर दिया. और पास की झाड़ियों में पैर पोछने लगी. साफ किया और फिर आगे बढ़े. पूरा रास्ता रंग-बिरंगे टट्टियों से भरा पड़ा था. जमीन कम टट्टी ज्यादा दिख रही थी. मैंने पूछा तो कहने लगी यहां का यही सीन है. कुछ के घर में संडास तो है पर जाते नहीं और कुछ को संडास रास नहीं आता. कहते हैं खेत में टट्टी करने में फील आता है. हमको समझ नहीं आया कि खुले में टट्टी करने में कौन सा फील, कैसा फील आता है. खैर हम बाजार गए और उसी रास्ते वापस भी आए. विश्वास करेगें दिल्ली में आज भी लोग टट्टी करने जंगल और खेतों में जाते हैं. इसको पढ़ के आंखें बड़ी न करो और न ही भौंहें चढ़ाओ. काहे की ये सच है. दिल्ली का शाहबाद डेयरी एक स्लम इलाका है. स्लम बोले तो झुग्गी-झोपड़ी. 500 परिवार वहां रहता है. जरूरत की सभी चीजें वहां हैं सिवाय संडास के. वहां के लोग टट्टी करने पास के जंगल में जाते हैं. हिंदुस्तान टाइम्स अखबार में पूरी खबर है. खबर ये है कि उस इलाके के 66 बच्चे गुम हैं. जंगल में टट्टी करने गए थे. पर कभी वापस नहीं आए. बच्चों के पेरेंट्स इतने डरे हुए हैं कि वो अपने बच्चों को सूरज डूबने के बाद खाना नहीं देते. ऐसा नहीं है कि उनके पास खाने को नहीं है या फिर पैसे नहीं है. ऐसा इसलिए कि रात में उन्हें टट्टी न आए. वहां की औरतें भी रात का खाना नहीं खाती. इमरजेंसी में रात में अगर जाना पड़ जाता है तो झाड़ियों में मर्द उनके साथ जाते हैं सक्षम एनजीओ की रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2013 से मार्च 2015 तक कुल 171 बच्चे गुम हुए हैं. 4 बच्चे तो 10 साल की कम उम्र के थे. 28 लड़कियों का रेप हुआ है और 17 के साथ छेड़छाड़. क्राईबच्चों के वेलफेयर के लिए काम करने वाला एनजीओ है. उसने वहां के लोगों को वार्न किया है. उसका कहना है कि प्रॉपर खाना न मिलने से बच्चों के हेल्थ को नुकसान हो रहा है. साथ ही उसने सरकार से इस मसले पर कदम उठाने को भी कहा है. आउटर दिल्ली के डीसीपी विक्रमजीत सिंह के मुताबिक पुलिस पब्लिक टॉयलेट के पास सुरक्षा देने की कोशिश कर रही है. पर वैसी जगहों का क्या जहां पब्लिक टॉयलेट है ही नहीं. झुग्गियों में परमानेंट पहरेदार देना मुमकिन नहीं है. शाहबाद डेयरी का स्लम इलाका आम आदमी पार्टी के विधायक वेद प्रकाश के अंडर आता है. उन्होंने माना है कि संडास की समस्या उस इलाके में हैं. बच्चें मिसिंग है. पिछले 25 साल से वहां कोई संडास नहीं है. प्रकाश ने उस इलाके में 27 संडास बनवाने का आदेश दिया है. 60 से ज्यादा परिवार आज भी अपने बच्चों के आने का वेट कर रहा है. कुछ तो इस मामले में लकी रहे. इलाके में रहने वाली पिंकी कहती है कि मुझे अपना बच्चा 3 महीने बाद एक बस स्टॉप पर मिला. अब मैं उसे अकेले घर से बाहर जाने नहीं देती. लेकिन हर वक्त बच्चों पर निगाह रखना मुशिकल है. दिल्ली अर्बन शेल्टर इंप्रूवमेंट बोर्ड के सीईओ ने शाहबाद इलाके में संडास बनवाने का वादा किया है. मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान को दो साल होने को है. पर फिर भी स्वच्छता को लेकर हालात खस्ता ही है. देश की राजधानी का ये हाल है तो सोचो गांवो का क्या हाल होगा. जहां आज भी लोग संडास के बजाए खेतों-जंगलों मे टट्टी करने जाते हैं.
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