इस थीम पर शायद पहली फिल्म बनी है ये चेहरे पर तेज़ाब फेंक दे कोई, तो क्या होता है? क्या बस चेहरा झुलसता है? क्या बस चेहरे की खूबसूरती खत्म हो जाती है? या सर्वाइवर की पूरी ज़िंदगी बदल जाती है? क्या इसके बाद उसकी ज़िंदगी कभी नॉर्मल नहीं हो पाती? क्या डिस्फिगर हो चुके चेहरे से हौसला इतना टूट जाता है कि जीना भारी लगने लगता है? अब तक किसी फिल्म ने हमें ऐसी कोई कहानी, ऐसा कोई करेक्टर नहीं दिखाया शायद. मगर ये जो छपाक आ रही है, वो इसी थीम पर बनी है. इसमें दीपिका पादुकोण एसिड अटैक सर्वाइवर बनी हैं. नाम है- मालती. इस फिल्म का पहला लुक आया है. मालती का किरदार असल ज़िंदगी में एसिड अटैक का शिकार हुई लक्ष्मी अग्रवाल की कहानी सुनाएगा.
लक्ष्मी 16 साल की थीं, जब उनके तेज़ाब फेंककर उनका चेहरा झुलसा दिया गया. बस इसलिए कि उन्होंने किसी के शादी के प्रपोजल को ठुकरा दिया था.

ये 2018 के विमिन्स डे की फोटो है. ठाणे में हुए एक फैशन-शो की. इसमें एसिड अटैक सर्वाइवर्स ने शिरकत की थी. हरी साड़ी में जो दिख रही हैं, वो हैं लक्ष्मी (फोटो: रॉयटर्स)
अधिकतर मामलों में शिकार महिलाएं/लड़कियां होती हैं 2017 में छपी USA Today की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल 250 से 300 एसिड अटैक होते हैं. ज्यादातर में शिकार लड़कियां और महिलाएं होती हैं. 2016 में 300 ऐसी घटनाएं रिपोर्ट हुई थीं. आशंका है कि कई ऐसे मामले भी होंगे जो कभी रिपोर्ट नहीं हुए. एसिड सर्वाइवर्स ट्रस्ट इंटरनैशनल के मुताबिक, भारत में ऐसी घटनाओं की सालाना संख्या 1,000 से ज्यादा हो सकती है. 2016 में राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसैबिलिटिज़ ऐक्ट में संशोधन करके एसिड अटैक सर्वाइवर्स को भी विकलांगों की श्रेणी में रखने का नियम बनाया गया. ताकि उन्हें मुआवजा मिल सके. उनके लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का भी सिस्टम बना.
बस टॉइलेट नहीं साफ करता है तेज़ाब, ज़िस्म का मांस भी गला देता है 2013 से पहले सीधे-सीधे इस अपराध की कोई सज़ा नहीं थी. उसके बाद इस पर काम हुआ. अब इस क्राइम की सज़ा 10 साल कैद तक हो सकती है. मगर इसमें अभी और सुधार होने हैं. जितना काम हुआ है, वो नाकाफ़ी है. इस तरह के अपराध रेगुलर हो रहे हैं. तेज़ाब खुले में बिकना जारी है. तेज़ाब खरीदने वाला अपना टॉइलेट साफ करेगा कि किसी के चेहरे पर फेंकेगा, आप कैसे बता सकते हैं.
आखिर में- दीपिका को बहुत सारा प्यार. इस लुक को कैरी करना. ये किरदार करना. इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए थी. हमारे यहां सुंदरता की परिभाषा बहुत छिछली और स्वार्थी है. खासकर फिल्मों में. उससे आगे बढ़कर ये करेक्टर निभाना, ऐसे सर्वाइवर्स की कहानी सुनाना, ये वाकई बहुत खूबसूरत है. तस्वीर में उनके आंखों की जो चमक है, वो काश हर सर्वाइवर की आंखों में उतरे. सब उठें, लड़ें, जीयें. खुश रहें. कोई विक्टिम न बने.
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