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15 साल तक भाई को पीठ पर ले गया स्कूल, दोनों भाइयों ने क्रैक किया IIT

लेकिन रैंक अलग होने की वजह से अब दोनों को अलग-अलग IIT में एडमिशन मिल रहा है.

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फोटो - thelallantop
छुटपन में हम भाई-बहनों में खूब लड़ाई होती थी. कभी खाने को लेकर तो कभी पापा के साथ बाइक पर घूमने जाने के लिए. कभी मम्मी के गोद के लिए तो कभी नए कपड़ों के लिए. पर मेरा भइया बहुत क्यूट था. खूब मारा मारी कर लेते थे हम लोग. उसके बाद भाई बुन्नी-बुन्नी करते हुए आता था. थोड़ी देर में सब सेटल भी कर लेता था. मुझे हमेशा से पापा का पिट्ठू कंफर्टेबल लगता था. झगड़े के बाद भइया मुझे मनाने के लिए अपनी पिठ्ठू पर बिठाकर पूरे घर में घूमाता था. और फिर मैं भइया से दोबारा न लड़ने का वादा करती. लेकिन ऐसा होता नहीं. किसी बात को लेकर फिर मारा-मारी और उसके बाद रूठना-मनाना.
ऐसा ही एक वाकया है बिहार के समस्तीपुर का. वहां एक छोटा भाई अपने बड़े भाई को पिठ्ठू पर बीते 15 सालों से रोज बैठाता है. उसे मनाने के लिए नहीं बल्कि उसे स्कूल ले जाने और लाने के लिए. 15 साल भाई को पीठ पर बैठाना और बैठना, अब दोनों भाइयों के लिए खुशी की वजह बन गया है.
बसंत और कृष्णा दोनों भाई हैं. समस्तीपुर के परोरिया गांव में रहते हैं. पापा किसान हैं. दोनों को पढ़ने का बहुत शौक है.  तभी तो दोनों भाइयों ने जी तोड़ मेहनत से आईआईटी का एग्जाम JEE क्रैक कर लिया है. सोच रहे होंगे तो इसमें नया क्या है. ये तो सारे करते हैं. नया है बंधु. डेढ़ साल की उम्र से कृष्णा के हाथ पैर काम नहीं करते हैं. छोटे में ही कृष्णा पोलियो का शिकार हो गया था. दोनों पैर और एक हाथ ने काम करना बंद कर दिया था. पर उसे स्कूल जाने का बड़ा मन था. जाहिर है कि तमाम दिक्कतें थीं. छोटे भाई बसंत से देखा न गया और उसने कृष्णा की जिम्मेदारी ली. उसे स्कूल ले जाने लाने से लेकर सूसू-पॉटी तक में मदद की. वो कृष्णा को अपनी पीठ पर बिठाकर स्कूल ले जाता और लाता. आठवीं तक तो स्कूल गांव में ही था तो ज्यादा दिक्कत नहीं होती थी. पर उसके बाद स्कूल के लिए दोनों को पड़ोस के गांव में पैदल चलकर जाना होता था. स्कूल खत्म करने के बाद दोनों राजस्थान चले आए. कोटा से इंजीनियरिंग की तैयारी करने के लिए. वहां भी बसंत कृष्णा को अपनी पीठ पर बिठाकर कोचिंग ले जाता और लाता. पिछले 15 साल से बसंत अपने बड़े भाई को पीठ पर लादकर स्कूल और कोचिंग ले जा रहा है. दोनों ने इस बार आईआईटी क्रैक कर लिया. पर अब दोनों का साथ खतम होने को है. कृष्णा की ओबीसी कोटे में 38वीं और बसंत की 3769 रैंक है. जाहिर सी बात है रैंक में इतना डिफरेंस है तो कॉलेज भी अलग ही मिल पाएंगे. दोनों ने तय किया है कि जब एडमिशन शुरू होगें तो कोशिश करेंगे कि एक ही आईआईटी में एडमिशन हो जाए. बसंत को आईआईटी कानपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करना है. वो सिविल सर्विस में जाना चाहता है. तो वहीं कृष्णा को किसी भी आईआईटी से कंप्यूटर साइंस पढ़ना है.
कृष्णा कहता है कि मेरा भाई बसंत मुझे खाना खिलाता है. सूसू-पॉटी भी ले जाता है. उसके साथ-साथ रोजमर्रा के मेरे सारे काम करता है. वहीं बसंत कहता है कि मुझे भइया को अपने पीठ पर लेकर लाना-ले जाना अच्छा लगता है. मुझे कोई दिक्कत नहीं होती.

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