थोड़ा फैक्ट्स की बात कर ली जाए. इस ट्रोल वीडियो में किस हद तक झूठ भरा है, ये समझ में आ जाएगा. बता रहे हैं कि छिटपुट हिंसा की घटनाएं हुई हैं लेकिन इन सेलेक्टिव घटनाओं पर कुम्भकर्ण की नींद सोए बुद्धिजीवी अचानक जाग गए हैं. इन रिसर्चर महोदय की मानें तो अगर पहले कोई कुछ नहीं बोला या नहीं जागा तो कभी नहीं जागना चाहिए. हालांकि ये पूरी तरह झूठ है. रिसर्चर जी को सिर्फ गौरक्षकों द्वारा की गई मोब लिंचिंग के विरोध में हुए प्रदर्शनों का विरोध करना है, उसके चक्कर में सारी किलिंग्स को लपेट लिया. जबकि विरोध करने वालों ने हर तरह की हिंसा का विरोध किया है. केरल में चाहे आरएसएस के लोगों की हत्या हो या कांग्रेस नेताओं द्वारा बछड़े को काटना, सबकी पुरजोर मुखालफत की गई. कश्मीर में पुलिस अफसर अयूब पंडित की भीड़ द्वारा हत्या के बाद बीजेपी ने क्या किया, ये तो नहीं पता लेकिन हिंसा के खिलाफ लोगों ने इसका भी विरोध किया था. लेकिन रिसर्चर बता रहा है कि इसका कहीं जिक्र तक नहीं हुआ. पश्चिम बंगाल के बशीरहाट में दंगे हुए तो उसका भी पुरजोर विरोध किया गया. ममता बनर्जी के उस बयान की भर्त्सना हुई जो उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया था. कि राज्यपाल की उनसे बात करने की टोन सही नहीं थी. अगर गौरक्षकों द्वारा हत्या के विरोध में #NotInMyName कैंपेन हुआ तो अमरनाथ यात्रियों पर हुए अटैक के विरोध में भी जंतर मंतर पर यही प्रदर्शन हुआ था. रिसर्चर आगे 2012-13 में हुए अपराधों के आंकड़े देता हुआ पूछता है कि "तब कहां थे?" हालांकि वो ये नहीं बताता कि वो खुद कहां था? जैसे आज 'बुद्धिजीवी लोग' जाग रहे हैं, वो तो पहले से ही जागृत आत्मा था, उसने क्यों नहीं कुछ किया?ज़रा सोचिए - क्यों कुछ बुद्धिजीवियों को आज ये देश 'लिंचिस्तान' लगने लगा है? pic.twitter.com/4frS3IY97q
— BJP (@BJP4India) July 15, 2017
अब इसके पीछे ट्रोल टाइप की मानसिकता पर विचार कर लिया जाए. बीजेपी की सरकार केंद्र में है. बीजेपी के समर्थन वाली सरकार कश्मीर में है. जिनके ऊपर इन घटनाओं पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी है वो विक्टिम का ही कान उमेठने में लगे हुए हैं. देश में गौ-आतंकवाद कितना बढ़ा हुआ है उस पर प्रधानमंत्री खुद दो बार गौरक्षकों को आड़े हाथों ले चुके हैं. जिनको ये रिसर्चर 'चंद घटनाएं' बता रहा है उसने पीएम तक को विचलित कर दिया लेकिन इसके हिसाब से और किसी को विचलित नहीं होना चाहिए.इससे पहले ये 'चंद घटनाएं' ऊना में, दादरी में, अलवर में, बल्लभगढ़ में और पता नहीं कहां-कहां हो चुकी हैं. अभी तक घटनाओं को अंजाम देने वालों का क्या हुआ कुछ पता नहीं, लेकिन जिस पार्टी की सरकार है उसका ट्विटर हैंडल इन घटनाओं पर सवाल उठाने वालों को ही सवालों के घेरे में ले रहा है. यानी जबरा मारे और रोने भी न दे. ये रिसर्चर बार-बार अपने वीडियो में नरेंद्र मोदी का नाम लेता है लेकिन उनकी ही बात से इत्तेफाक नहीं रखता, है न कमाल की बात.
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