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एक एयरपोर्ट के चक्कर में बर्खास्त हुई थी अरुणाचल सरकार?

अरुणाचल की लड़ाई की असली कहानी. मोदी को लिखी गई थी एक चिट्ठी. वहीं से शुरू हुआ था बवाल.

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CM नबाम तुकी बनाम गवर्नर ज्योति राजखोवा.
'बहाल' एक अच्छा शब्द है. लेकिन यह सरकार के बारे में हो तो इसके साथ एक विडंबना नत्थी हो जाती है.  एक तरफ खिली हुई बांछें. दूसरी तरफ लटके हुए चेहरे. अरुणाचल में कांग्रेस की पुरानी नबाम तुकी सरकार बहाल हो गई. कांग्रेस के 21 विधायकों के बागी हो चलने के बाद गवर्नर ने सरकार बर्खास्त कर दी थी. जिसके बाद बागियों को सपोर्ट करके बीजेपी ने कलिखो पुल को मुख्यमंत्री बनवा दिया था. लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नर के फैसले को असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया. लेकिन अरुणाचल के अस्थिर होने की असल वजह कुछ और थी. ये दरअसल मुख्यमंत्री नबाम तुकी और गवर्नर ज्योति प्रसाद राजखोवा की लड़ाई थी. जो शुरू हुई एक एयरपोर्ट के चक्कर में. ज्योति प्रसाद राजखोवा असम के चीफ सेक्रेटरी रहे. केंद्र सरकार ने उन्हें पिछले साल अरुणाचल का राज्यपाल बनाया. तारीख थी 1 जून 2015. और इसी दिन से उनकी कांग्रेसी मुख्यमंत्री नबाम तुकी से ठन गई. मुद्दा था एक प्रपोज्ड एयरपोर्ट.

CM से खुन्नस निकाली गवर्नर ने?

नबाम तुकी सरकार राजधानी ईटानगर से 70 किलोमीटर दूर होलोंगी में एक एयरपोर्ट बनाना चाहती थी. इसके लिए केंद्र को प्रपोजल भेजा गया था, लेकिन राज्यपाल राजखोवा इसके खिलाफ थे. उन्होंने अक्टूबर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर सुझाया कि अगर इस प्रस्तावित एयरपोर्ट को रोक दिया जाए तो 1150 करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं. इसमें 500 करोड़ रुपया जमीन मुआवजे का शामिल था. राजखोवा ने परोक्ष रूप से नबाम तुकी पर ये आरोप भी लगाया कि वो जमीन मुआवजे में फायदा लेना चाहते हैं. उन्होंने लिखा कि जिस जगह एयरपोर्ट बनना है, वहां CM नबाम तुकी और उनके चचेरे भाई, पूर्व असेंबली स्पीकर नबाम रेबिया और उनके परिवार के लोगों की जमीनें हैं. इसी की वजह से प्रस्तावित एयरपोर्ट की जगह भी बदली गई.
ये एयरपोर्ट पहले ईटानगर के पास करसिंग्सा इलाके में बनना था. इसकी नींव 2008 में उस वक्त के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने रखी थी. लेकिन 2012 में तुकी सरकार ने उस जगह को एयरपोर्ट के लिए मुफीद न बताते हुए जगह बदल दी. प्रस्तावित एयरपोर्ट को होलोंगी में शिफ्ट कर दिया गया था.
गवर्नर ने इसकी जगह असम के नॉर्थ लखीमपुर में लीलाबाड़ी एयरपोर्ट को अपग्रेड करने की सलाह दी. चिट्ठी में ये भी लिखा कि अरुणाचल के विपक्षी नेता, स्टूडेंट संगठन और सोशल एक्टिविस्ट भी ऐसा ही चाहते हैं.
राजखोवा की इस चाल से तुकी भौंचक रह गए. लेकिन राजखोवा का कहना था कि उन्होंने एयरपोर्ट मसले पर मुख्यमंत्री से दो बार ऑफिशियल जवाब मांगा था. उन्होंने लगे हाथ ये भी कह दिया कि मैंने अलग-अलग मुद्दों पर उन्हें 19 चिट्ठियां लिखीं, लेकिन उन्होंने सिर्फ तीन का जवाब दिया.
यहीं से राजखोवा और तुकी का कोल्ड वॉर खुल्लमखुल्ला लड़ाई में बदल गया. बताते हैं कि जब कांग्रेस के 21 विधायक बागी हुए तो राज्यपाल ने इसी की खुन्नस निकाल ली. संविधान को ताक पर रखकर.

'राजभवन BJP या RSS का हेडक्वॉर्टर नहीं है'

सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से तीन दिन पहले से गवर्नर राजखोवा छुट्टी पर हैं. तब तक त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत रॉय को अरुणाचल का एडिशनल चार्ज दिया गया है.
राजखोवा 1968 बैच के आईएएस अफसर हैं. दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पोस्ट ग्रेजुएट हैं. 2004 में असम के चीफ सेक्रेटरी पोस्ट से रिटायर हुए. उनके पुरानी कलीग उन्हें कागज पक्के करके चलने वाले एक नियमपरस्त अफसर के तौर पर याद करते हैं. अरुणाचल के राज्यपाल के तौर पर उनकी नियुक्ति थोड़ी चौंकाने वाली थी. लेकिन उनके आने के बाद से कांग्रेस परेशान ही रही है. 26 जनवरी को तुकी सरकार को बर्खास्त करने के बाद उन्होंने कहा था, 'मैं किसी का एजेंट नहीं हूं और राजभवन बीजेपी या आरएसएस का हेडक्वॉर्टर नहीं है.'

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