भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव वाले हालात हैं. दोनों देशों की जनता में एक बड़ा तबका ऐसा है जो युद्ध को ही हल मान रहा है. उनके मुताबिक़ जंग होनी ही चाहिए. लेकिन.. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस वॉर हिस्टेरिया के शिकार नहीं हुए हैं. जो समझते हैं कि जंग से कुछ हासिल नहीं होता. जंग तो खुद ही एक मसला है. ये सुकून की बात है कि दोनों ही मुल्कों में कुछ सेंसिबल आवाज़ें सुनाई दे रही हैं. 'से नो टू वॉर' जैसे हैशटैग ट्रेंड हो रहे हैं. जंग को समाधान नहीं समस्या मानने वाले ऐसे ही कुछ लोगों में शुमार होता है हमारे पाठक आलोक रंजन का. नीचे हम उनका लिखा एक आर्टिकल पढ़ा रहे हैं. इसे तवज्जो से पढ़िएगा और इत्मीनान से इस संजीदा लेकिन बेहद ज़रूरी बात पर गौर कीजिएगा.
1991 का साल था. सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर कब्ज़ा करके वहां के तेल के कुएं जलाने शुरू कर दिए थे. बदले में अमेरिका की सेना ने इराक़ पर धावा बोल दिया था. उस समय सिर्फ दूरदर्शन चैनल हुआ करता था. समाचार के वक़्त इराक पर धावे की खबरें आती थीं. साथ ही वीडियो फुटेज भी दिखाई जाती थी कि कैसे अमेरिका के लड़ाकू जहाज़ बगदाद पर बमबारी कर रहे हैं और इमारतें रेत के मलबों में तब्दील हो रही हैं.
उस समय की याद अभी भी ताज़ा है. टीवी पर समाचार आते समय पड़ोस पूरी तरह खाली हो जाता था. जैसे दो-तीन साल पहले रविवार को रामायण और महाभारत के समय हुआ करता था. युद्ध की वीडियो देखना और उस पर गर्मजोशी से बहस करना लोगों के लिए मनोरंजन का प्रमुख सोर्स बन गया था.
उसके कुछ सालों बाद मेरा दाखिला एक ऐसे स्कूल में हुआ जहां की लाइब्रेरी में कम से कम तीस हजार किताबें थीं. इतिहास पर भी एक से एक बेहतरीन किताबें मौजूद थीं. मेरा इतिहास के प्रति थोड़ा राग जागा और मैं खाली समय में इतिहास की किताबों के पन्ने पलट लिया करता था. खासकर जब चर्चा किसी युद्ध की हो. युद्ध के दौरान कैसे लोग मारे जाते हैं, इसके बारे में थोड़ा विस्तार से जाना. यह पता चला कि बख्तियार खिलजी ने कैसे नालंदा विश्वविद्यालय के हजारों भिक्षुओं के सिर कटवा दिए थे. नादिरशाह ने दिल्ली में छह घंटे में हजारों लोगों की हत्या करवा दी थी. और जापान में घंटे भर में कैसे लाखों लोग एटम बम से मार दिए गए थे.

दूसरे विश्व युद्ध से हुई बर्बादी. फोटो: getty images
लेकिन युद्ध क्या होता है और कितना विनाश करता है, इसका सही अंदाज़ तब लगा जब मुझे नेशनल जियोग्राफिक और डिस्कवरी चैनल पर युद्ध से संबंधित डॉक्यूमेंट्री फिल्में देखने को मिलीं. खासकर जब वो डॉक्यूमेंट्री दूसरे विश्व युद्ध से संबंधित होती थी. किसी शहर पर जब बमबारी होती है तो वो शहर कैसे मलबे और श्मशान में बदल जाता है, यह मैंने पढ़ा तो काफी था, लेकिन उसका वीडियो देखने पर कुछ अलग ही अनुभव हुआ. वर्ल्ड वॉर-2 शुरू करने का श्रेय जर्मनी को दिया जाता है, और शुरू में वो जीत भी रहा था. लेकिन जब पासा पलटा और मित्र राष्ट्र की सेनाएं बर्लिन में घुसीं, तो मंजर ही अलग था. एक तरफ तो अमेरिका के विमान शहर पर बम बरसा रहे थे, दूसरी तरफ रूस की सेना अंदर घुसकर हत्या और रेप को अंजाम दे रही थी. तब जर्मनी में एक कहावत प्रचलित हुई, "It's better to have a Russian on your belly than to have an American on your head." युद्ध के समय हिटलर का साथ देने वाली जनता ने नहीं सोचा होगा कि ऐसे दिन आएंगे.
परंतु दूसरों का दुख देखना और उसे महसूस करना, दोनों अलग बातें हैं. एक पुरानी कहावत है, 'किसी अकाल में हज़ारों लोगों के मरने से ज़्यादा दुख तब होता है, जब अपने पैर में कांटा गड़ जाए.' मेरा युद्ध से संबंधित तो कोई निजी अनुभव नहीं हुआ पर एक छोटी से घटना घटी. उस समय मैं दिल्ली के मालवीय नगर के पास रहता था. अचानक आधी रात में मेरी नींद टूटी. मेरे चेहरे पर पानी की बूंदें गिर रही थीं. बंद कमरे में अकेले सोते समय चेहरे पर पानी का गिरना भूत-प्रेत की घटना भी हो सकती है. लेकिन यहां मामला अलग था. काफी बारिश हो रही थी, और मकान की छत से धीमे-धीमे पानी रिस रहा था. उस पानी से मेरा फर्श और बिस्तर भीगता जा रहा था.
थोड़ी देर बार बारिश बंद हो गयी, पर मन परेशान हो गया. तुरंत तो घर बदल नहीं सकता था. आफिस जाते समय बिस्तर पर पॉलिथीन बिछा दी ताकि बारिश में वो नहीं भीगे. उसके बाद हफ्तों तक बारिश का मौसम रहा. ऑफिस में हर पल मुझे चिंता सताती थी कि कहीं बारिश में मेरा बिस्तर भीग न जाए. एक मिनट भी मुझे चैन नहीं रहता था.
अब सोचता हूं कि जब बिस्तर के भींगने भर से मुझे इतनी चिंता हो सकती है तो उनका क्या हाल होता होगा जिनके घर बमबारी में तबाह हो जाते होंगे? या फिर जिनके भाई-बेटे युद्ध में सीमा पर लड़ने जाते होंगे? कैसे उनका एक-एक पल कटता होगा? रोटी का एक कौर भी कैसे उनके मुंह में जाता होगा?

सरहद पर तैनात जवान. फोटो- PTI
फिर आस-पास देखता हूं कि वीडियो गेम पर युद्ध करके बड़ी हुई जनता, असली युद्ध के लिए कैसे पगलाई हुई है, तो मन स्तब्ध रह जाता है. अपने बच्चे को हल्का बुखार हो जाता है तो इनकी नींद हराम हो जाती है. लेकिन दूसरों के बच्चों को युद्ध में भेजने के लिए ये ऐसे उत्साहित हैं जैसे चीज़ से लबालब पिज़्ज़ा ऑर्डर कर रहे हों.
हम जिस दुनिया में रहते हैं, वहां युद्ध से बचा नहीं जा सकता जब बात आत्मरक्षा की हो. खासकर जब हम ऐसे देश में रह रहे हों जिसका इतिहास सिकंदर, गजनी, बाबर, नादिरशाह, लार्ड क्लाइव, माओत्से तुंग और अब मसूद अज़हर जैसे लोगों द्वारा कराए खूनखराबे से भरा हो.
लेकिन युद्ध किया जाए या न किया जाए, और अगर किया जाए तो कब, कैसे और कितना किया जाए, ये निर्णय कौन लेगा? ये निर्णय गला फाड़कर चिल्लाने वाले न्यूज़ एंकरों द्वारा दी गयी अफीम के नशे में धुत्त लोग तो नहीं लेंगे. वो, जिन्हें सीमा पर युद्ध नहीं लड़ना, पॉपकॉर्न खाकर टीवी पर युद्ध की फुटेज देखना है. ये निर्णय वो लोग नहीं ले सकते जिनके परिवार के सदस्य आर्मी में नहीं, बल्कि किसी मालदार कंपनी में मोटी सैलरी पर काउच को गर्म कर रहे हैं.
ये निर्णय वो लोग लेंगे, जिन्हें युद्ध में ट्रेनिंग मिली है और जिनकी जान को युद्ध में खतरा है. सड़क के किनारे चाय बनाने वाला तो हमारे एक्सपर्ट सजेशन लेता नहीं, लेकिन हम आर्मी वालों को बताने चले हैं कि उन्हें कब जंग के मैदान पर जाना चाहिए.
ज़रूरत है कि हम अपने आत्मविश्वास पर थोड़ा नियंत्रण रखें और युद्ध का मनोवैज्ञानिक दवाब उन सैनिकों पर न डालें, जिनका दबाव हमारी समझ के बाहर है. उन्हें बेहतर पता है कि क्या करना है और कब करना है.
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