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एड्स है, क्लास में आओ लेकिन हॉस्टल में नहीं रहना

एड्स पर दुनिया में कित्ती भी अवेयरनेस बढ़ा दी गई हो, लेकिन अब भी कूड़मगज लोगों के लिए वो हौवा है. इतना बड़ा कि पेशेंट से भेदभाव कर लें.

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फोटो - thelallantop
20 साल की अक्षरा एस कुमार, वादी हुडा इंस्टिट्यूट ऑफ रिसर्च ऐंट एडवांस स्टडीज कन्नूर में पढ़ती है. बी.ए फर्स्ट इयर साइकॉलजी की स्टूडेंट है. एचआईवी पॉजीटिव भी. अक्षरा का एक छोटा भाई है, अनंतु. वह भी एड्स पेसेंट है. यह जानकारी 2003 में हुई जांच के बाद पता चली. अक्षरा के पापा एक पेंटर थे. संक्रमित खून के चढ़ने से उन्हें ये बीमारी हुई थी. 2004 में उनकी मौत हो गई थी. अक्षरा की पूरी कहानी  द इंडियन एक्सप्रेस में छपी है. आप भी पढ़ लीजिए. akshara लोगों को जब इसके बारे में पता चला तो हर जगह उनके साथ भेदभाव होने लगा. स्कूल में दूसरे बच्चों के पेरेंट्स के कंप्लेन पर दोनों को अलग कमरा और टीचर पढ़ाने को दिए गए. प्रशासन से हेल्प मांगी गई और हेल्प हुई भी. इसके बाद दोनों ने कोई भेदभाव नहीं झेला. आज अनंतु गांव के स्कूल में 12वीं का छात्र है. कॉलेज में आने के बाद अक्षरा के जख्म फिर उभर आए. टीचर्स और स्टूडेंट्स उससे कतराने लगे. जब उसने अपने एचआईवी पॉजीटिव होने की बात हॉस्टल में सबको बताई. उसके रूममेट्स और बगल के कमरे वाली लड़कियों ने हॉस्टल छोड़ दिया. कॉलेज प्रशासन ने इसके लिए अक्षरा को जिम्मेदार ठहराया. कहा कि लड़कियां उसके साथ रहने में डरती है. बहना इतना पढ़ने-लिखने का कोई फायदा नहीं हुआ. इतने अवेयरनेस के बाद भी एचआईवी को समझ नहीं पाए. एक ही बात कह सकती हूं, अकल या तो घास चरने गई है या फिर उसे बेच कर गोलगप्पे खा लिए हैं. सरकार ने इस मामले में कॉलेज प्रशासन पर सवाल दागे. प्रिंसपल पी.ए जुनैद का कहना है कि अक्षरा के साथ भेदभाव सिर्फ हॉस्टल में हो रहा है. दूसरे बच्चों के पेरेंट्स की शिकायतें आ रही हैं. हमने उन्हें समझाने की कोशिश की पर वो सुनने को तैयार ही नहीं हैं. लड़कियों को अक्षरा के साथ क्लास में बैठने से कोई दिक्कत नहीं है. पर वो उसके साथ हॉस्टल में नहीं रहना चाहती. इसलिए हमने अक्षरा को हॉस्टल छोड़ने कहा. हम कॉलेज में एचआईवी के ऊपर एक अवेयरनेस प्रोग्राम करेंगे और लोगों को इसके बारे में जानकारी देंगे. अक्षरा के दोस्त उससे पूछ तो रहे हैं कि वो कब से क्लास आना शुरू करेगी. पर उसके साथ रहना नहीं चाहते. अक्षरा के घर से कॉलेज की दूरी तय करने में 8 घंटे लगते हैं. एक्जाम सर पर होने की वजह से वो परेशान है और जल्द से जल्द कॉलेज लौटना चाहती है. कॉलेज का माहौल देखकर अक्षरा डरने लगी है. लेकिन उसने इससे लड़ने की कसम खाई है. उसे इस बात को भी कोई मलाल नहीं है कि उसने अपने एचआईवी पॉजूटिव होने की बाप सबको बताई. बड़े गर्व से कहती है कि साइकॉलजी की स्टूडेंट होने के कारण मैं अपने आप को छिपा नहीं सकती. कन्नूर जिले के कलेक्टर पी बालाकिरण ने कॉलेज प्रशासन, अक्षरा और उसकी मां से मुलाकात की है. उनका कहना है कि अक्षरा हॉस्टल में ही रहेगी. और अपनी पढ़ाई पूरी करेगी.
पांचवी क्लास में थी जब पहली बार एचआईवी एड्स का नाम सुना थी. दूरदर्शन पर आने वाले एक टीवी सीरियल "जासूस विजय" में. तब समझ नहीं आया था कि ये होता क्या है. क्यों प्रोग्राम के एंड में एक मैसेज आता था कि एड्स किसी के साथ उठने-बैठने, साथ खाने या हाथ मिलाने से नहीं होता. असुरक्षित संबंध बनाने, मच्छर के काटने और खून चढ़ाते वक्त किसी संक्रमित इंसान का खून चढ़ जाने से होता है. बचपन में जानने की इच्छा भी नहीं हुई. छठी क्लास में बायोलॉजी के टीचर ने एड्स के बारे में बताया. सबसे पहले उसका फुलफॉर्म. Human immunodeficiency virus. जनरल नॉलेज में पूछा जाने वाला टीचर्स का फेवरेट सवाल हुआ करता था. जैसे-जैसे फिर क्लास बढ़ते गई, एड्स के बारे में जानकारी भी बढ़ती गई. थैंक्स टू माइ बायोलॉजी टीचर. कभी मौका नहीं लगा किसी एचआईवी पॉजीटिव ग्रस्त इंसान से मिलने का. मिलने का मौका कभी हाथ लगा तो देखना चाहुंगी. ऐसा कौन सा कांटा लगा होता है एचआईवी पॉजीटिव इंसानों में जो लोग इतना कतराते है उनसे. पढ़े-लिखे होने के बाद भी ऐसे गवांरों वाली हरकतें करते है. (जागृतिक, छोटू दबंग टीम दी लल्लनटॉप)

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