डायनी 34 साल की थीं जब पहली बार मां बनीं. सब औरतों की तरह वो भी खुश थीं. सपने संजो रही थीं. बच्चे के आने के दिन गिन रही थीं. कपड़े, स्वेटर, जूते बना रही थीं. खिलौनों से घर भर रही थीं. बिल्कुल मेरी बुआ की तरह. वो भी जब प्रेग्नेंट थीं तो ऐसा ही करती थीं. ठंड के दिनों में धूप सेंकतीं और आने वाले बाबू के लिए स्वेटर बुनतीं. उन्होंने तो आने वाले बच्चे का नाम भी सोच लिया था.
बुआ का बेबी भी गर्भ में ही मर गया था. तब मैं बित्ते भर की थी. पता नहीं था कि ये होता क्या है. न ये कि बच्चे आते कहां से हैं. बुआ इस हादसे के बाद कई दिनों तक उदास रही थीं. खाना भी दादी के जबरदस्ती करने पर खाती थीं. और जब देखो रोते ही रहती थी. हम पूछते थे पर मम्मी कहतीं, बुआ को परेशान मत करो. और भगा देतीं.
मेरी बुआ ने तो खैर एक बार मिसकेरिज का दर्द झेला. पर डायनी 11 बार इस तकलीफ से दो-चार हुईं. 1993 से लेकर साल 2005 के बीच लगातार डायनी के मिसकेरिज होते रहे. इसके बाद वो कभी मां नहीं बन पाईं. लेकिन प्रेग्नेंसी के टाइम वो बच्चे के लिए कुछ न कुछ रचती-बुनती रहीं.
पर नन्हे बच्चे पर इन कपड़ों को सजते देखना उनका सपना ही रह गया. 2005 के बाद करीब 10 साल तक डायनी उन्हीं यादों के साथ रही. साल 2015 में तय किया कि वो अपनी कहानी सबको बताएंगी. डायनी का कहना है कि ऐसा कई मम्मियों के साथ हुआ होगा. बस फर्क इतना है कि मेरे साथ 11 बार हुआ. मिसकेरिज 1 बार हो या 11 बार तकलीफ उतनी ही होती है.
फिर क्या था. डायनी ने उन औरतों से बात करने का फैसला किया, जिन्होंने अपना बच्चा गर्भ में ही खोया. उन्होंने अपने अल्ट्रासाउंड्स की इमेज सोशल साइट्स पर शेयर कीं. और कहा कि उनके जैसी औरतों को अपना दर्द जरूर शेयर करना चाहिए. इससे उन्हें थोड़ी राहत मिलेगी. और वो खुलकर जी पाएंगी.
अल्ट्रासाउंड की तस्वीरें लोगों के साथ शेयर करने के बाद मुझे थोड़ा हल्का महसूस हुआ: डायनी













'लॉस्ट' फोटो सीरrज मेरी तरफ से उन सभी बच्चों के लिए सम्मान है जो इस दुनिया में आ नहीं सके. इस सीरीज के जरिए वो हमेशा मेरे करीब रहेंगे.
.webp?width=275)
.webp?width=275)

.webp?width=275)
.webp?width=120)

.webp?width=120)



