कद्दू बेच ये आदिवासी औरतें कमाती हैं 40 लाख
दो साल पहले तंगी में जीने वाली ये आज देती हैं 300 औरतों को रोजगार.
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राजस्थान के एक गांव में वोट डालने का इन्तजार करती औरतें. वोट तो हर चुनाव में डलते हैं. पर इन गांवों तक न कोई स्कीम आती है न अच्छे दिन. Source: Reuters
राजस्थान के भीमाणा गांव की पांच महिलाओं ने न सिर्फ खुद को तंगहाली से निकला है बल्कि इनकी मेहनत से पांच गांवों की औरतों के घर चूल्हा जलता है. आज से दो साल पहले सिर्फ भीमणा गांव की सुमी, सगी, नानरी, चंपा और करनी बाई ही गरीबी में नहीं जी रही थीं. और भी कई औरतें थीं, जो दिन-रात मेहनत करने के बाद भी तंगी में जीती थीं. पर इन पांच महिलाओं ने तय किया कि घर बैठ, या मर्दों पर निर्भर रह कर किस्मत बदलने का इंतजार नहीं करेंगीं. और इसी हिम्मत का नतीजा है आज उनकी कंपनी, 'घूमर'. दैनिक भास्कर अखबार की इस खबर के मुताबिक कंपनी का टर्नओवर है 40 लाख रुपये. अरावली की पहाड़ियों पर बसे इस गांव के बाहर न रिक्शे चलते हैं न गाड़ी. छोटी छोटी चीजें लाने के लिए मीलों चलना पड़ता है. न सरकार की स्कीमें यहां पहुंचती हैं, न अच्छे दिन. लेकिन सीताफल यानी कद्दू बड़ी आसानी से मिल जाया करते थे. तो इन औरतों ने दिन रात एक कर के 'घूमर महिला प्रोड्यूसर' नाम की कंपनी खोली. जो कद्दू से प्रोडक्ट्स बनाती थी. पहले ही साल 18 लाख का टर्नओवर हुआ. बस फिर क्या, निकल पड़ी. आज 'घूमर' 300 से ज्यादा औरतों को रोजगार देती है. आस पास के गांवों में 10 कलेक्शन सेंटर खोले हैं. जहां औरतें कद्दू लाती हैं, और बदले में पाती हैं पैसे. और पैसे मिलने में बस 2 दिन का समय लगता है. ये कद्दू फैक्ट्री में पहुंचते हैं. जहां इनसे बनती हैं आइस क्रीम और रबड़ी जैसी चीजें. घूमर के प्रोडक्ट्स सिर्फ राजस्थान ही नहीं, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक जाते हैं.
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