“भारत में कोई भी व्यक्ति अपने कर्म से सफाईकर्मी नहीं बनता. वो अपने जन्म से सफाईकर्मी माना जाता है. चाहे वो सफाई का काम करे या न करे.” ये शब्द हैं बाबासाहेब भीमराव अम्बेडर के. ये बात उन्होंने उन लोगों लिए कही थी, जो हाथों से समाज की विष्ठा उठाते हैं, जो सिर पर मैला ढोते हैं. अपने वजूद को धूमिल कर हमारे-आपके लिए स्वच्छ भारत बनाते हैं. हिन्दी में इन्हें कहते हैं महतर और अंग्रेजी में मैनुअल स्कैवेंजर. लेकिन ये कुप्रथा कहां से शुरू हुई? कब ये काम किसी एक वर्ग विशेष के माथे मढ़ दिया गया? कैसे हम पीढ़ी दर पीढ़ी इस बुराई को मिटाने में नाकाम रहे? और कैसे सफाई ने इन्हें समाज के लिए अछूत बना दिया? जानने के लिए देखें तारीख का ये एपिसोड.
तारीख: मुगल काल से अब तक, मैला ढोने का काम एक जाति के मत्थे क्यों मढ़ दिया गया?
पारंपरिक तौर पर कथित 'नीची मानी जाने वाली जातियां', जिन्हें ऐतिहासिक रूप से मानव मल की सफाई और जानवरों के शवों को उठाने से जोड़ दिया गया था, वो आज भी मैला ढोने के काम में लगी हैं.
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