1862 की बात है. त्रिपुरा के एक राजा हुआ करते थे. नाम था ईशानचन्द्र देव बर्मन. उनकी मृत्यु के बाद गद्दी मिली उनके सबसे बड़े बेटे ब्रजेन्द्रचन्द्र बर्मन को. फिर कुछ समय में ब्रजेन्द्रचन्द्र की भी हैजे से मृत्यु हो गई. अब नियम के अनुसार ब्रजेन्द्र के बेटे नवद्वीपचन्द्र को अगला राजा बनना था. लेकिन इसी बीच समय ने कुछ ऐसे करवट ली कि गद्दी मिल गई ईशानचन्द्र के भाई बीरचन्द्र को. राजा बीरचन्द्र को ‘अकबर ऑफ़ द ईस्ट’ के नाम से जाना जाता है. काहे कि अकबर की ही तरह वे भी अपने दरबार में कला और संस्कृति को काफी महत्त्व दिया करते थे. राजा बीरचन्द्र के बारे में कुछ बातें जान लीजिए. वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के टैलेंट को पहचाना, बाद में दोनों के लम्बे वक्त तक रिश्ते रहे. गुरुदेव ने कई बार अपने लिखे हैं महाराजा बीरचन्द्र का जिक्र किया है. महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस को अपना इंस्टीट्यूट बनाने में सहायता महाराजा ने दी थी. एक और फैक्ट ये है कि भारत में जब पहली बार दो फोटो कैमरा लाए गए, उनमें से एक राजा बीरचन्द्र ने मंगाया था. देखिए वीडियो.
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महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस को अपना इंस्टीट्यूट बनाने में सहायता महाराजा ने दी थी.
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