
माता सुंदरी मंदिर जाकर अमित शाह ने किए दर्शन
यहां हम अमित शाह के त्रिपुरा चुनाव प्रचार की रिपोर्ट नहीं देने वाले हैं. अमित शाह कहते हैं कि वो पूर्वोत्तर के छोटे से राज्य त्रिपुरा में इस बार परिवर्तन लाएंगे. वो कहते हैं कि 25 साल से त्रिपुरा का विकास रुक गया है. कहते हैं कि मोदी के नेतृत्व में जब त्रिपुरा में भी बीजेपी सरकार बनेगी, तभी विकास होगा. तभी त्रिपुरा के दिन बहुरेंगे.
चुनावी मंचों पर और पोस्टरों में अभी सिर्फ अमित शाह और नरेंद्र मोदी की ही बड़ी-बड़ी तस्वीरें दिख रही हैं. एक नेता की तस्वीर जो इन पोस्टरों में नहीं है, वो बीजेपी के लिए बेहद अहम हो सकती है. वो हैं योगी आदित्यनाथ. यूपी के मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ का त्रिपुरा कनेक्शन
अब जरा त्रिपुरा के बारे में समझिए. त्रिपुरा में ज्यादातर आबादी बंगाली बोलने वालों की है. हिंदुओं की बड़ी तादाद है. धार्मिक पहचानों का इस्तेमाल करना बीजेपी खूब जानती है. यहीं पर काम आएंगे योगी आदित्यनाथ. त्रिपुरा की आबादी करीब 35 लाख है. इस आबादी का करीब एक तिहाई यानी 12 से 13 लाख लोग नाथ संप्रदाय को मानते हैं. नाथ संप्रदाय यानी वो संप्रदाय जिसके मुखिया इस वक्त यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हैं. बीजेपी को उम्मीद है कि योगी जी इस बार उनके काम आएंगे.बीजेपी को जिताने के लिए महीनों से त्रिपुरा में डेरा जमाए बीजेपी के राज्य प्रभारी सुनील देवधर से दी लल्लनटॉप ने बात की. तो उन्होंने कहा कि योगी आदित्यनाथ जरूर चुनाव प्रचार करने आएंगे. वो पहले भी त्रिपुरा में आ चुके हैं. देवधर कहते हैं त्रिपुरा में नाथ संप्रदाय से जुड़े 18 मंदिर हैं. सुनील देवधर को भरोसा है कि योगी की छवि सिर्फ नाथ संप्रदाय तक सीमित नहीं है. उनको चाहने वाले नाथ संप्रदाय से बाहर भी हैं.

अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ के साथ योगी आदित्यनाथ
तो बीजेपी किस दम पर जीत का दावा कर रही है
भारत की राजनीति के इतिहास की अहम घटना होने जा रही है. पहली बार त्रिपुरा में वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच सीधी लड़ाई होने वाली है. ये बात खुद 25 साल से सरकार चला रहे सीपीएम नेता माणिक सरकार भी मानते हैं. वैसे माणिक सरकार राज्य में खासे लोकप्रिय हैं. उनकी सादगी के चर्चे पूरे देश में होते हैं. माणिक सरकार के बारे में कहा जाता है कि वो मुख्यमंत्री के तौर पर मिलने वाली अपनी तनख्वाह पार्टी को दे देते हैं. पार्टी उनको खर्च चलाने के लिए 5 हजार रुपये महीने देती है. बाकी का खर्च सरकारी सेवा से रिटायर हुईं उनकी पत्नी की पेंशन से चलता है. उनकी पत्नी भी रिक्शे पर सब्जी खरीदने खुद जाती हैं. ऐसे में बीजेपी को माणिक सरकार से लड़ने के लिए एक बड़ा चेहरा चाहिए.पिछली बार BJP के 50 में से 49 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी
बीजेपी लाख दावे कर ले, त्रिपुरा जीतने की लेकिन राह आसान नहीं होगी. राजनीति में आंकड़े नेताओं और पार्टियों के दावों पर कई बार भारी पड़ जाते हैं. त्रिपुरा के आंकड़े भी बेहद रोचक हैं. इससे पहले 2013 में विधानसभा चुनाव हुए थे. त्रिपुरा में कुल 60 सीटें हैं. बीजेपी ने 60 में से 50 सीटों पर चुनाव लड़ा. एक भी नहीं जीत पाई. बीजेपी के 49 उम्मीदवार तो ऐसे थे, जिनकी जमानत जब्त हो गई. जमानत जब्त होने का मतलब है किसी सीट पर कुल पड़े वोटों का कम से कम छठा हिस्सा भी न मिल पाना. मान लीजिए किसी सीट पर कुल 60 वोट पड़े तो कम से कम 10 वोट मिलेंगे, तब जमानत बचेगी, वरना नहीं.2013 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में सीपीएम को 60 में से 50 सीटें मिली थीं. 10 सीटें कांग्रेस को मिली थीं. तब त्रिपुरा में बीजेपी को सिर्फ 1.54 फीसद वोट मिले थे. राज्य में करीब 22 लाख लोगों ने वोट दिए तो बीजेपी को वोट देने वाले सिर्फ 33 हजार थे.

बीजेपी की रैली की भीड़ में शामिल कुछ मुस्लिम चेहरे
ओबीसी आरक्षण भी है त्रिपुरा का बड़ा मुद्दा
त्रिपुरा में नाथ संप्रदाय को मानने वाले ज्यादातर लोग यूं तो ओबीसी में आते हैं लेकिन उनको आरक्षण का फायदा नहीं मिलता. त्रिपुरा में एससी, एसटी को मिलाकर 48 फीसद आरक्षण मिल रहा है. नाथ संप्रदाय को मानने वाले ज्यादातर लोग केंद्र की ओबीसी श्रेणी में आते हैं, लेकिन त्रिपुरा में ये सामान्य श्रेणी का ही हिस्सा हैं. राज्य सरकार इससे ज्यादा आरक्षण न दे पाने की संवैधानिक मजबूरी बताती है. ऐसे में नाथ संप्रदाय से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर बीजेपी आरक्षण का भरोसा देती है तो इस संप्रदाय से जुड़े ज्यादातर लोग उसके पक्ष में वोट कर सकते हैं.बीजेपी आरक्षण का वादा नहीं कर रही है
त्रिपुरा बीजेपी प्रभारी सुनील देवधर से जब लल्लनटॉप ने सवाल पूछा तो उन्होंने ये तो खूब बताया कि किस तरह माणिक सरकार के राज में नाथ संप्रदाय के लोगों का प्रतिनिधित्व बिल्कुल नहीं है. वो आरोप लगाते हैं कि माणिक सरकार ने नाथ संप्रदाय ही नहीं, पूरे ओबीसी समाज का ख्याल नहीं रखा. लेकिन वो आरक्षण का कोई वादा नहीं करते. सुनील देवधर ने कहा, 'संविधान और राज्य के कार्यक्षेत्र को देखकर जितना संभव है, ओबीसी समाज के लिए काम करेंगे.'
हाथ जोड़कर बीच में खड़े बीजेपी के त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर हैं
आरक्षण का मुद्दा जितना राजनीतिक है, उतना ही कानूनी भी. ऐसे में आरक्षण को लेकर नाथ संप्रदाय की मांग को पार्टियां छोड़ना भी नहीं चाहतीं और सीधे भरोसा भी नहीं दिलाना चाहती हैं.
लेकिन अगर 12 से 13 लाख की आबादी के बीच बीजेपी अपने पक्ष में माहौल बनाने में कामयाब हो जाती है तो पिछली बार जो सिर्फ 33 हजार वोट पड़े, वो रिकॉर्ड तो बेहद शानदार तरीके से टूट सकता है. बीजेपी को ये बात पता है कि योगी आदित्यनाथ का सीएम के साथ ही संप्रदाय का मुखिया होना नाथ लोग बेहद गर्व का विषय मानते हैं.
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