नेता हैं. चुनाव हैं. जिसे लड़ने के लिए चहिए चिह्न. लड़ने से याद आया यूपी का सत्तारूढ़ समाजवादी परिवार. अखिलेश ने पापा को पार्टी प्रमुख के पद से हटा दिया. आडवाणी कोष्ठक में डाल दिया. पापा कह रहे हैं कि ये संविधान के खिलाफ है. संविधान की चुनावी व्याख्या करता है इलेक्शन कमीशन. जिसे तय करना है कि साइकिल की सवारी कौन करेगा. अखिलेश या मुलायम. या फिर कोई नहीं. कमीशन के फैसले की सबसे ज्यादा चिंता अखिलेश एंड फ्रेंड्स को है, क्योंकि चुनाव से उनका भविष्य ज्यादा तय होना है. मुलायम तो पहले ही भविष्य चौपट कर चुके हैं परिवार की कलह को सड़कों पर लाकर.
साइकिल से चलने के अलावा अखिलेश के पास एक पुराना सहारा भी है
बाप मुलायम ने जिस पार्टी से बगावत की थी, बेटे अखिलेश को उसी से सहारा मिल सकता है

अखिलेश को साइकिल का सिंबल नहीं मिला, तो क्या करेंगे. पेड़ के सिंबल पर लड़ेंगे. ये सिंबल है समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) का. ये पार्टी बनाई थी 1990 में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने. जनता दल से टूट कर. 60 सांसदों के साथ. पूर्व डिप्टी पीएम हरियाणा के चौधरी देवीलाल संग. पार्टी बनाई. फिर राजीव गांधी की कांग्रेस के सपोर्ट से सरकार बनाई, जो कुछ ही महीनों में गिर गई.

चंद्रशेखर के साथ मुलायम
यूपी में चंद्रशेखर के साथ आए यूपी के उस वक्त के सीएम मुलायम सिंह यादव, जो जनता दल के दौर में उसके प्रदेश अध्यक्ष भी थे. यहां भी सरकार कुछ महीनों तक कांग्रेस के सपोर्ट से चलती रही. फिर आया 1991 का चुनाव. राममंदिर की लहर में समाजवादी जनता पार्टी (सजपा) और उसके स्टेट सुप्रीमो मुलायम सिंह चित्त हो गए. विधानसभा में बचे दो दर्जन के आसपास विधायक. इनके दम पर 1992 में राज्यसभा में एक सांसद भेजा जा सकता था. चंद्रशेखर अपने चेले को भेजना चाहते थे. मुलायम ने उन्हें दांव दे दिया. भेज दिया अपने चचेरे भाई रामगोपाल यादव को. फिर कुछ महीनों के बाद नवंबर में अपनी पार्टी बना ली. समाजवादी पार्टी.

सुनहरा अतीत
उधर चंद्रशेखर अकेले सजपा चलाते रहे. मुलायम सिंह पुराने रिश्तों का लिहाज करते रहे. बलिया में चंद्रशेखर के खिलाफ कभी साइकल सिंबल से कोई नहीं उतरा. 2007 में चंद्रशेखर मर गए. उनका बेटा नीरज शेखर बलिया से चुनाव लड़ा. साइकल के सिंबल पर. सजपा फिर भी चलती रही. उसे कमल मोरारका चलाते रहे. चंद्रशेखर के पुराने साथी. उनकी सरकार में काबीना मंत्री भी रहे. बिना दम की पार्टी लगातार सपा के संपर्क में रही. सल्ली मुल्ली से. बीते बरस जब जनता दल परिवार की एका का नारा उठा, तो उन्होंने भी मुट्ठी तान ली. विलय को राजी हो गए, पर ऐन मौके पर पहलवान पीछे हट गए.
अब कहा जा रहा है कि अगर सपा पर अखिलेश का दावा कमजोर छूटा, तो सजपा के बैनर तले पेड़ के सिंबल से अखिलेश के प्रत्याशी चुनाव में उतरेंगे. ये दिलचस्प है. जिस चंद्रशेखर से बगावत कर मुलायम ने पार्टी बनाई, वहीं बेटे को सहारा मिल रहा है. हालांकि, सजपा वाले कह रहे हैं कि आधिकारिक तौर पर ऐसी कोई बात नहीं हुई. ये अखिलेश कैंप की उड़ाई हुई हवा है. साथ ही ये भी जोड़ा कि ऐसा हो जाए, तो क्या बुरा है. पर क्या पापा के जले अखिलेश अब पुराने बुजुर्ग मित्र की पार्टी के बैनर तले सरकार बनाने की दम करेंगे.
एक कयास ये भी है कि अखिलेश जनता पार्टी के चुनाव चिह्न पहिए के लिए भी कोशिश कर सकते हैं. इमरजेंसी के गर्भ से पैदा हुई इस पार्टी का चुनाव चिह्न पहिए के साथ हल लिए हुए किसान था. पार्टी अलग-अलग विचारधारा और महत्वकांक्षाओं वाले नेताओं से मिलकर बनी थी, जो 1980 में अलग हो गए. पार्टी टूट गई और चुनाव चिह्न फ्रीज कर दिया गया. हालांकि, अगर अखिलेश इस सिंबल पर दावा ठोंकते हैं, तो भी उन्हें काफी वक्त लगेगा.

पुराने दिन: मुलायम और अखिलेश
एक थ्योरी और आ रही है. साल 2016 है. साइकिल में क्यों न मोटर जोड़ दी जाए. सिंबल मांग लिया जाए मोटर साइकल. साइकल की याद दिलाता. युवा जोश की भुर्र-भुर्र करता. ये सुरगा कहां से आया. यूपी के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी की फेसबुक पोस्ट से, जो उन्होंने पापा-पुत्र की लड़ाई के दूसरे चरण के दौरान की थी. कहा गया कि अखिलेश राष्ट्रीय समाजवादी पार्टी बनाएंगे औऱ चुनाव चिह्न मोटर साइकल मांग लेंगे. मगर इसमें एक पेच है, जो रामगोपाल यादव को पता है. इसीलिए उन्होंने इस तरफ नजर नहीं घुमाई. दरअसल किसी भी नई पार्टी को बनाने और उसका सिंबल लेने का प्रॉसेस लंबा है. चार-छह महीने लग सकते हैं. मगर उसके पहले ही चुनाव हैं, इसलिए प्रोफेसर साहब ने पार्टी का संविधान, जो उनका ही लिखा है, उठाया. अनुबंध-उपबंध उठाए और बुला ली कनवेंशन.

समाजवादी जनता पार्टी के एक इवेंट की तस्वीर, साथ में चुनाव चिह्न: पेड़
कनवेंशन जायज थी या नहीं, ये कमीशन तय करेगा. इलेक्शन वाला. इलेक्शन, जिसे लड़ने औऱ जीतने के लिए इत्ती लड़ाई हो रही है.
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