एक लोकतांत्रिक देश में जहां मैंने सबसे पहली बार 'लोकतंत्र' का मतलब समझा वो दोनों ही संस्थान घोर अलोकतांत्रिक थे. पहला स्कूल और दूसरा घर. दोनों ही जगह विचारों के पैकेट में अनुशासन की हवा ज्यादा थी और अभिव्यक्ति बस चिप्स भर. वो ऐसा अनुशासन था जिसने हमें उद्दंड बनाया. सत्ता विरोधी कुछ लेखकों ने स्कूल के शौचालयों में ऐसी सूक्तियां लिखीं जो उस व्यवस्था को स्वीकार नहीं थीं. उस शासन में वो ‘लिट्रेचर’ बैन था और उसी ने हमें पहली बार भाषा की परिभाषा दी.
Gen Z की भाषा बोलने को क्यों मजबूर हुए अंकल जी?
सरल या जटिल से परे, याद करिए आखिरी बार आपने किस भाषण में कोई नया शब्द सुना था. हर संपादकीय, हर संबोधन, हर भाषण की गुझिया में एक जैसा खोया है. अगर किसी में किसी दिन कोई किशमिश निकल आई तो वो आपकी किस्मत. ऐसे भाषा विपन्न समाज को 'वास्तेगुने हुईया' जैसे निर्थक शब्दों को अपनाने में कोई देर नहीं लगी.

'भाषा संवाद का माध्यम है. विचारों के आदान-प्रदान के लिए पहली शर्त.' हमें सिखाया गया कि अगर भाषा की जटिलता या अत्यधिक सरलता की वजह से संवाद अधूरा रह जा रहा है तो वो ग्राही, दर्शक, पाठक और श्रोता के लिए प्रतिकूल भाषा है. व्याकरणाचार्य उसे वैलिडेशन दे सकते हैं, लेकिन सुनने वाला उसके आनंद से वंचित रह जाएगा. तभी वैदिक संस्कृत को प्राकृत, अपभ्रंश से होते हुए खड़ी बोली और फिर आधुनिक हिंदी तक का सफर करना पड़ा.
समय के साथ हिंदी, हिंदुस्तानी के रूप में समद्ध हुई जब उसमें उर्दू, स्थानीय बोलियों, विदेशी भाषाओं और डिजिटल डिक्शनरी के शब्द शामिल हो गए. इन दिनों एक बार फिर भाषा बदल रही है. हिंदी या किसी अन्य भाषा की बाध्यता भी अब खत्म होती जा रही है. कई बार सिर्फ ध्वनियां ही संवाद को पूरा कर दे रही हैं. इस नई भाषा का विक्रेता है जेन ज़ी और ग्राहक है समाज का एक बड़ा वर्ग. वो वर्ग जो लंबे समय से सुलभ भाषा का भूखा था, जिसके सभी वाक्यों में एक नियत क्रिया है- 'काम किया गया'- खाना खाने का काम किया गया. भाषण देने का काम किया गया. काम करने का काम किया गया.
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सरल या जटिल से परे, याद करिए आखिरी बार आपने किस भाषण में कोई नया शब्द सुना था. हर संपादकीय, हर संबोधन, हर भाषण की गुझिया में एक जैसा खोया है. अगर किसी में किसी दिन कोई किशमिश निकल आई तो वो आपकी किस्मत. ऐसे भाषा विपन्न समाज को 'वास्तेगुने हुईया' जैसे निरर्थक शब्दों को अपनाने में कोई देर नहीं लगी.
जेन ज़ी की इस भाषा का करिश्मा ये है कि ये सड़क से लेकर संसद तक में इस्तेमाल की जा सकती है. बिना किसी को आहत किए, जटिलता-सरलता के फेर में फंसे बिना संवाद को पूरा कर सकती है, क्योंकि इसके गर्भ में कोई परिभाषा या पर्यायवाची नहीं है. यह सिर्फ एक अभिव्यक्ति है.
कहने दीजिए कि नई पीढ़ी ने अभिव्यक्तियों को बदलना शुरू कर दिया है. प्रेम के प्रकार, काम की प्रशंसा और असहमतियां अब उंगलियों के इशारों पर बयां की जा सकती हैं. हालांकि पहले भी ये काम होता था. राजश्री गोल्ड खाकर कचहरी जाते वकील साहब सिर्फ 'हूं' बोलकर और गर्दन के एक इशारे से सटीक 70 का पेट्रोल भरवा लेते थे. फर्क कहां आया है? उनके कोष में प्रेम या प्रशंसा की जगह थी ही नहीं. कई मौकों पर उन्होंने हिंसा को प्रेम का नाम दे दिया. असहमतियां व्यक्त करने के लिए गालियां काफी थीं. उनकी ज़रूरत सिर्फ पेट्रोल थी, जिसके लिए उन्हें 'हूं' का आविष्कार करना पड़ा.
जिस पीढ़ी ने लंबे समय तक नए गानों को नहीं अपनाया. नए परिधानों को नकार दिया. प्रेम विवाहों के विरोध में खड़े हो गए. नई कविताओं को नहीं सुना. मुस्कुराना भूल गए. कभी फूलों को नहीं सूंघा. ज़िद करने पर भी नहीं बदला पुराना फोन. जिनके पास आज भी है 94 से शुरू होने वाला बीएसएनएल का नंबर. जिनके टिन के डिब्बे से कभी नहीं हटी फिटकरी. जिन्होंने बाज़ुओं को मोड़ना असभ्य समझा. जिन्हें रोज़ याद आता रहा गांव. जिनकी चाबियों में कोई गुच्छा नहीं है. जो 50 का गुलाबी नोट रखने वाले अंतिम भारतीय होने के क्रम में हैं, उन्होंने भी अब अपना ली है जेन ज़ी की भाषा. इस उम्मीद में कि कम से कम अब उनका बेटा उनसे संवाद करेगा क्योंकि बेटे ने स्कूल में सीखा था कि ‘भाषा संवाद का माध्यम हैं’.
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