
इजरायल की इराकी कुर्दिस्तान से काफी दोस्ती है. इजरायल आजाद कुर्दिस्तान की मांग का समर्थन भी करता है.
14 मई, 1948. मिडिल ईस्ट के इतिहास में एक मील का पत्थर. इस दिन इजरायल बना था. मिडिल ईस्ट आज तक उस तारीख को नहीं भूल पाया है. अरब और खाड़ी देश तो आज तक इजरायल को स्वीकार भी नहीं कर पाए. अब इराक में फिर से एक आजाद देश बनाने की मांग उठी है. कुर्दिस्तान देश. एक रेफरेंडम भी हुआ. जनमत सर्वेक्षण. जिसे कुर्दिस्तान का शासन चलाने वाली कुर्दिश रीजनल गर्वनमेंट (KRG) ने कराया है. 25 सितंबर, 2017. चुनाव में कुर्द वोटर्स को एक सवाल का जवाब देना था. दो विकल्प थे- हां या नहीं. इस एक सवाल से मिडिल ईस्ट सुलग गया है. अमेरिका बेचैन हो गया है. अंदेशा है कि एक बार फिर इस क्षेत्र में हिंसा और खून-खराबा शुरू हो सकता है. ये सवाल है:
क्या आप चाहते हैं कि कुर्दिस्तान क्षेत्र और इसके बाहर का कुर्दिस्तानी इलाका एक अलग और स्वतंत्र देश बने?

इराकी कुर्दिस्तान में लोगों ने जमकर वोटिंग की. 72 फीसद से ज्यादा मतदान हुआ है.
कौन हैं कुर्द दुनिया में करीब तीन करोड़ कुर्द हैं. उनके पास अपना कोई देश नहीं. तुर्की, ईरान, इराक, सीरिया और आर्मेनिया में बिखरे हुए हैं. कुर्दों पर जुल्म का लंबा इतिहास रहा है. बहुत सहा है उन्होंने. ज्यादातर कुर्द सुन्नी मुसलमान हैं. लेकिन और भी धर्मों को मानने वाले लोग हैं इस समुदाय में. कई तो अपना रिश्ता पारसियों के साथ बताते हैं. माना जाता है कि कुर्दों के पूर्वज भी आर्य थे. इनके तौर-तरीके, बोली-संस्कृति थोड़ी अलग है. कट्टर मुसलमान इन्हें पसंद नहीं करते. 24 जुलाई, 1923. ओटोमन साम्राज्य के खात्मे की तारीख. इसके बाद ही कुर्द अलग-अलग देशों में बिखर गए. बाकी जगहों पर रहने वाले कुर्दों के मुकाबले इराकी कुर्दों की मौजूदा स्थिति ज्यादा सही है. सद्दाम हुसैन के जाने के बाद इराक के अंदर उनकी हालत में काफी सुधार आया. कुर्द काफी प्रगतिशील माने जाते हैं. आपको कुर्द औरतों को देखना चाहिए. उन पर वैसी बंदिशें नहीं, जैसी आमतौर पर बाकी इस्लामिक देशों में हैं. कुर्दों की पेशमरगा फौज में बड़ी तादाद लड़कियों की है. ये कौम बेहद शांतिप्रिय और उसूलों की पक्की मानी जाती है.

कुर्दिश पेशमरगा फौज की बहादुर महिला सैनिकों और अधिकारियों पर काफी कुछ लिखा गया है. ISIS के खिलाफ जंग में इनका योगदान किसी से कम नहीं है.
बहरीन. साइप्रस. मिस्र. ईरान. इराक. इजरायल. जॉर्डन. कुवैत. लेबनान. ओमान. फिलिस्तीन. कतर. सऊदी अरब. सीरिया. तुर्की. संयुक्त अरब अमीरात. यमन. इन सबसे मिलकर बनता है मिडिल ईस्ट. मिडिल ईस्ट और अफ्रीका दुनिया की सबसे अशांत जगहें हैं. भयंकर मार-काट. खूब-खराबा. जंग. गृहयुद्ध.

रेफरेंडम को लेकर इराकी कुर्दिस्तान में काफी उत्साह है. केवल चुनाव ही हुआ है, फिर भी लोग काफी खुश हैं.
क्या है इराकी कुर्दिस्तान इराक में एक इलाका है- कुर्दिस्तान. उत्तरी हिस्से में. इराक का इकलौता स्वायत्त क्षेत्र. तीन स्टेट आते हैं इसमें. राजधानी है इरबिल. कच्चे तेल के मामले में काफी संपन्न है ये इलाका. फिलहाल इस तेल का प्रॉफिट शेयरिंग होता है. प्रांतीय सरकार और इराक सरकार के बीच. यहां का शासन कुर्दिश रीजनल गर्वनमेंट (KRG) चलाती है. ये कुर्द आबादी अपने लिए आजाद देश चाहती है. संप्रभु. 'अंडर द अम्ब्रेला ऑफ इराक' नहीं. कुर्द मुख्य रूप से पांच देशों में बसे हैं. उत्तरी इराक, दक्षिणी तुर्की, पूर्वोत्तर सीरिया, उत्तर-पश्चिमी ईरान और दक्षिण-पश्चिमी आर्मेनिया. कुर्द ग्रेटर कुर्दिस्तान की मांग करते हैं. इसमें तुर्की का दक्षिण-पूर्वी इलाका, उत्तरी सीरिया और उत्तर-पश्चिमी ईरान शामिल है. इराक की सरकार इसे मान्यता नहीं देती. जाहिर है, ईरान और तुर्की भी इसे नहीं मानते. इराकी कुर्दिस्तान कच्चे तेल के मामले में काफी संपन्न है. लेकिन कुर्द अड़े हुए हैं. वो अपनी शर्तों पर बात करना चाहते हैं.

इराक, तुर्की और ईरान आग-बबूला हैं. लेकिन कुर्द आवाम खुश है. न केवल इराक के कुर्द, बल्कि आस-पास के देशों में रहने वाले कुर्दों ने भी रेफरेंडम के प्रति बहुत उम्मीद जताई है.
क्या कहते हैं कुर्द कुर्द खुश हैं. पूरे मिडिल ईस्ट में सिवा इजरायल के कोई उसे समर्थन नहीं दे रहा. सब खिलाफ हैं. लेकिन कुर्दों को उम्मीद है. उन्हें लगता है कि अब उनका मौका आया है. अब उन्हें खुद के लिए फैसला लेने का हक मिला है. वो अपनी बुरी यादों से निकलना चाहते हैं. बहुत अत्याचार हुआ है उन पर. लंबे समय से कुर्द अपने लिए अलग देश की मांग कर रहे हैं. उन्होंने जब भी सिर उठाया, उनका सिर कुचला गया. इतिहास की सबसे सताई हुई कौमों में शामिल हैं कुर्द. सद्दाम हुसैन के जाने के बाद उन्हें इराक में कुछ अधिकार मिले. हालांकि इसे काफी नहीं कहा जा सकता है. अब वे अपने लिए आजाद कुर्दिस्तान की मांग कर रहे हैं. पहले भी कई बार रेफरेंडम की बात हो चुकी थी. लेकिन इस बार रेफरेंडम हो गया. चारों ओर से हो रहे विरोध के बावजूद हुआ. पश्चिमी देश लोकतंत्र की वकालत करते हैं. लोकतंत्र का रोना रोते हैं. ऐसा नहीं हो सकता कि ISIS जैसे दुश्मन से लड़ने के लिए कुर्दों को साथ लिया जाए. फिर काम पूरा होने पर उन्हें किनारे कर दिया जाए. उनकी बात तक न सुनी जाए. वैसे भी, रेफरेंडम एक लोकतांत्रिक तरीका है. इतनी बड़ी तादाद में जब एक आबादी कुछ कहे, वो भी शांति से, तो उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता.

वोटिंग के आधिकारिक नतीजे आने से पहले ही KRG ने जीत का ऐलान कर दिया.
टाइमिंग का खेल है: अभी ही क्यों कराया गया रेफरेंडम इराक के लिए ये समय बहुत मायने रखता है. ISIS से चल रही लड़ाई खत्म होने के बाद उसे अपने पैरों पर खड़े होने का मौका मिलेगा. एक मजबूत और स्थिर इराक पश्चिमी देशों के भी हित में है. सत्ता की दिशा तय करने के लिहाज से भी ये अहम मौका है. ISIS के खिलाफ जंग में कुर्दिश आवाम की भूमिका काफी मजबूत रही है. उनकी पेशमरगा फौज का खौफ था ISIS में. उनके इलाके में घुसने की हिम्मत ISIS भी नहीं कर पाई. शायद इसीलिए कुर्द नेतृत्व मोल-भाव की सोच रहा है. उनकी नजर ज्यादा से ज्यादा पावर शेयरिंग पर है. कुर्द नेतृत्व को लग रहा होगा कि अगर अभी जोर लगाया, तो शायद बात बन जाए. आजाद मुल्क तो शायद न मिले, लेकिन अधिकार बढ़ जाएंगे. वो कहते हैं न कि ज्यादा मांगो, तो कम से कम कुछ हासिल होने की राह निकल जाती है. कुर्दों की जरूरत केवल इराक को नहीं है. अमेरिका और ब्रिटेन जैसी ताकतों को भी उनकी जरूरत है. कुर्दों को नजरंदाज करने का जोखिम फिलहाल कोई नहीं ले सकता.

KRG का कहना है कि बहुसंख्यक कुर्दों ने आजाद कुर्दिस्तान के गठन को समर्थन दिया है. ये नतीजा तो स्वाभाविक ही है.
रेफरेंडम के खिलाफ तर्क ऐसे भी तर्क दिए जा रहे हैं कि KRG अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए रेफरेंडम की आड़ ले रही है. भ्रष्टाचार को दबाने के लिए आजाद कुर्दिस्तान की मांग कर रही है. इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा होगी. लड़ाई का नया दौर शुरू हो सकता है. कुर्दों की पेशमेगरा फौज और इराकी सेना मिलकर ISIS से लड़ रही है. इस नए घटनाक्रम से ISIS के खिलाफ चल रही लड़ाई कमजोर होगी.

लोग सोशल मीडिया पर फोटो शेयर कर रहे हैं. आजाद कुर्दिस्तान बनने की भले अभी कोई उम्मीद न हो, लेकिन लोग बहुत उत्साहित हैं.
मसूद बरजानी ने कम किया है इराकी कुर्दिस्तान का पक्ष! KRG के राष्ट्रपति हैं मसूद बरजानी. असल में वो भूतपूर्व राष्ट्रपति थे. 2005 में चुने गए. दो बार चार-चार साल का कार्यकाल पूरा किया. 2013 में कार्यकाल दो साल के लिए बढ़ाया गया. कार्यकाल बढ़ाने की एक शर्त थी. अब वो खुद को राष्ट्रपति नहीं कह पाएंगे. बरजानी का एक्सटेंशन 20 अगस्त, 2015 को खत्म हो गया. लेकिन वो गद्दी से नहीं उतरे. न अगला चुनाव होने दिया, न विपक्ष को ही सवाल करने दिया. लोगों को बरजानी में किसी तानाशाह का अक्स नजर आता है. ऐसा शख्स जो तानाशाह होने की राह पर हो. ये आशंका बेबुनियाद नहीं.

दीवार पर नजर आ रहा नक्शा ग्रेटर कुर्दिस्तान का है. इसमें ईरान, तुर्की और सीरिया के हिस्से भी शामिल हैं.
इजरायल के सिवा बाकी सब खिलाफ हैं बरजानी का कहना है कि रेफरेंडम (जनमत संग्रह) जरूरी था. ताकि आजाद कुर्दिस्तान के लिए बातचीत शुरू हो सके. इराक, ईरान और तुर्की इसके खिलाफ हैं. कहते हैं, किसी कीमत पर इसे नहीं मानेंगे. अमेरिका और ब्रिटेन भी इसके खिलाफ हैं. अमेरिका ने KRG को मनाने की पूरी कोशिश की. ताकि रेफरेंडम टाला जा सके. अमेरिका फिलहाल इरबिल और बगदाद के बीच कोई टकराव नहीं चाहता. उसे डर है कि कहीं इस्लामिक स्टेट (ISIS) इस भसड़ का फायदा न उठा ले. ब्रिटेन भी इसके खिलाफ है. संयुक्त राष्ट्र ने भी सोमवार को हुई वोटिंग पर बड़ा खेद जताया है. लेकिन कुर्द अपनी धुन में हैं.

रेफरेंडम के ऐलान के बाद इराक और तुर्की की फौज इराकी कुर्दिस्तान की सीमा के पास साझा सैन्य अभ्यास करती हुई.
आलोचकों को मसूद बरजानी की बातों में थोड़ा झोल नजर आता है आलोचकों का कहना है कि बरजानी आजादी की बात करते हैं, तो शुबहा पैदा होता है. कार्यकाल खत्म होने के दो साल बाद भी वो पद छोड़ने को तैयार नहीं. चुनाव बहुत पहले ही हो जाने चाहिए थे, पर नहीं हुए. अगर बरजानी ने चुनाव होने दिए होते, तो उनकी स्वीकृति बढ़ती. अगर कुर्द अलग देश की मांग करते हैं, तो उन्हें इसके लिए अपनी तैयारी भी दिखानी होगी. जो फिलहाल नहीं है. 1992 में बना था KRG. इतने साल बाद भी वो बुनियादी समस्याओं का हल नहीं खोज पाया. स्वायत्त सरकार होने के बाद भी बिजली और पानी जैसी दिक्कतें नहीं सुलझ पाईं. भ्रष्टाचार के आरोपों से सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है. शायद इसीलिए बरजानी पर भरोसा कर पाना ज्यादा मुश्किल हो रहा है. ऐसा लग रहा है कि वो कुर्दिश आजादी से ज्यादा खुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इस रेफरेंडम के कारण फिलहाल उनके पद पर बने रहने की वैधता से ध्यान हट गया है.

मसूद बरजानी की राजनैतिक भूमिका पर कई गंभीर सवाल उठते आए हैं. उन्होंने विपक्ष को जिस तरह दबाने की कोशिश की है, उसकी काफी आलोचना होती है.
रेफरेंडम के नतीजों की जिम्मेदारी कौन लेगा? राष्ट्रवाद का मुद्दा कहीं भी उठे, कट्टरता से खाली नहीं होता. कुर्दिस्तान में भी ये ही हो रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स इसी ओर इशारा करती हैं. जो कुर्द इस वोटिंग के खिलाफ हैं, उन्हें गद्दार माना जा रहा है. लेकिन जिन्होंने वोट किया, वो क्या इसके नतीजों की जिम्मेदारी ले सकेंगे? ईरान, बगदाद और तुर्की बेहद नाराज हैं. तुर्की ने धमकी दी है. इराकी कुर्दिस्तान की कमाई का सबसे बड़ा जरिया है कच्चा तेल. जिसका सबसे बड़ा खरीदार तुर्की है. तुर्की से आए ट्रक खाने-पीने और बाकी जरूरी चीजों की सप्लाई करते हैं. अगर तुर्की ने ये सब बंद कर दिया, तो इराकी कुर्दिस्तान के सामने भूखे मरने की स्थिति पैदा हो जाएगी. और जो हिंसा होगी, उसका क्या? क्या इससे निपटने के लिए KRG के पास कोई रणनीति है? बरजानी भले ही बातचीत से सहमति पर पहुंचने की बात कर रहे हों, लेकिन उनके इरादे टकराव के लग रहे हैं. ये ठीक नहीं है. कुछ महीने पहले 'फॉरेन रिलेशन्स' को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था:
हम (कुर्द जनता) भूखे मरना पसंद करेंगे. अत्याचार और दूसरों के कब्जे में रहने से मरना बेहतर है. अगर रेफरेंडम में बहुसंख्यक कुर्दिश जनता आजाद देश की मांग का समर्थन करती है और इस पर प्रतिक्रिया करते हुए बाकी देश हमें अलग-थलग कर देते हैं, तो हमारे लोगों को मर जाने दीजिए.कुर्दिश जनता को भुगतना होगा, लेकिन जिम्मेदारी बाकी पक्षों की ज्यादा होगी सरकार बाद में झेलती है. सबसे पहला असर तो आम जनता पर पड़ता है. युद्ध हुआ, तो उसमें लड़ने वाले लोग कौन होंगे? अलग-थलग कर दिए गए, तो भूख से कौन मरेंगे? ISIS के खिलाफ चल रही जंग अलग तरह की है. उसमें पेशमेगरा फौज के पास बैकिंग है. अमेरिका और ब्रिटेन साथ हैं. इराकी फौज भी साथ हैं. जाहिर है, टकराव अव्यावहारिक है. लेकिन नुकसान केवल कुर्दों का नहीं होगा. अगर आजाद मुल्क हासिल करने की ये मांग हिंसक हुई, तो इराक और पड़ोसी देश ज्यादा घाटे में रहेंगे. पश्चिमी देशों को भी बहुत कुछ भुगतना होगा. अगर कुर्दिस्तान से उठी मांग जंग में तब्दील होती है, तो इसकी जिम्मेदारी कुर्दों से ज्यादा बाकी पक्षों की होगी.

इराकी कुर्दिस्तान में रेफरेंडम के बाद लोग सामूहिक जश्न मनाते हुए.
तुर्की ने कहा है: भूखा मार देंगे तुर्की के राष्ट्रपति रेजेप ताइप एरोदोगन की धमकी साफ है. उन्होंने कहा कि रेफरेंडम के कारण जंग शुरू हो सकती है. तुर्की की कुल आबादी में करीब 20 फीसद कुर्द हैं. उसे लगता है कि अगर इराकी कुर्दिस्तान आजाद हुआ, तो तुर्की के कुर्द भी ऐसी ही मांग करेंगे. ये अलग बात है कि तुर्की ने कुर्दों पर जुल्म करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी. उन्हें दबाने में पूरा जोर लगाया. इराक और तुर्की की सेना इराकी कुर्दिस्तान की सीमा के पास सैन्य अभ्यास कर रही है. एरोदोगन ने KRG के सामने दो विकल्प दिए हैं: हथियार डाल दो या फिर भूखे मरो. उन्होंने कहा:
मसूद बरजानी और KRG जल्द से जल्द अपनी गलती सुधार लें. वरना आगे इतिहास याद करेगा उनको. कि उनके ही कारण इस पूरे क्षेत्र में सांप्रदायिक हिंसा शुरू हुई.

पोलिंग बूथ के बाहर खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते कुर्द. पड़ोसी देशों की तमाम धमकियों के बावजूद लोगों के जोश में कोई कमी नहीं नजर आई.
इराक का रिऐक्शन इराक के प्रधानमंत्री हैदर अल-अबादी पहले ही रेफरेंडम को असंवैधानिक बता चुके हैं. उन्होंने इस मामले पर बात तक करने से इनकार कर दिया है. इराक सरकार ने KRG से कहा है. कि वो इरबिल और सुलेमानिया एयरपोर्ट उनके हवाले कर दे. लग रहा है कि कुर्दिस्तान के लिए विमान सेवा बंद कर दी जाएगी. एक और भी चक्कर है. आजाद कुर्दिस्तान बनने पर इराक को अपने उत्तरी क्षेत्रों के तेल भंडार से हाथ गंवाना पड़ेगा. इराक लगातार दबाव बना रहा है. अगर बरजानी और KRG पर प्रेशर बढ़ता है, तो इससे कुर्द और संगठित होंगे. न केवल कुर्दिस्तान में, बल्कि बाकी देशों में भी. 2003 से ही इराक में उनके पास स्वायत्त प्रदेश है. इराक की कुल आबादी में करीब 20 फीसद लोग कुर्द हैं. 20 से ज्यादा स्टेट में कुर्द रहते हैं. लेकिन इराकी कुर्दिस्तान में केवल तीन ही स्टेट हैं. कुर्दिश नेता इराकी नेतृत्व पर पक्षपात का आरोप लगाते हैं. उनका कहना है कि इराक सरकार कच्चे तल और बाकी राजस्व के बंटवारों की शर्त पर अमल नहीं कर रही. इसी कारण उनके इलाके में गरीबी है.

एक दूल्हा और दुल्हन रेफरेंडम में अपना वोट डालते हुए.
ईरान का रिऐक्शन ईरान में लाखों कुर्द रहते हैं. उसे भी आजाद कुर्दिस्तान की मांग में खतरा नजर आ रहा है. उसे लगता है कि उसकी कुर्द आबादी भी अलगाववाद की राह पर आगे बढ़ सकती है. यहां भी कुर्दिश आजादी के लिए संघर्ष शुरू हो सकता है, ऐसा हुआ, तो राजनैतिक अस्थिरता का खतरा है. इराक में हुए रेफरेंडम की खुशी ईरानी कुर्दों में भी है. ईरान में रहने वाले कुर्द लंबे समय से अपने राजनैतिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. तमाम आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए ईरान बहुत सावधानी बरत रहा है. इराकी कुर्दिस्तान के लिए सीधी विमान सेवा बंद कर दी गई हैं. चेतावनी के तौर पर कुर्दिश इलाकों के ऊपर सैनिक विमान उड़ाए जा रहे हैं. ईरान ने सुरक्षा कारणों के मद्देनजर अपनी सीमा पर मिसाइल भी तैनात किए हैं.

ईरान आजाद कुर्दिस्तान का समर्थन कभी नहीं करेगा. उसके यहां भी कुर्दों की अच्छी-खासी संख्या है. इराक के कुर्दिस्तान मूवमेंट का असर उसके यहां भी फैल सकता है.
सऊदी अरब का स्टेक क्या है? बीते कुछ समय से ईरान और इराक के बीच अच्छे रिश्ते हैं. ईरान और सऊदी के बीच 36 का आंकड़ा है. सऊदी और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है. सऊदी चाहता है कि ईरान कमजोर हो जाए. उसे लगता है कि इराक कमजोर हो जाए, तो ईरान भी कमजोर होगा. शायद इसी वजह से कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सऊदी आजाद कुर्दिस्तान की मांग को जोर पकड़ता देखकर खुश हो रहा होगा.
मिडिल ईस्ट में कोई और सिविल वॉर नहीं छिड़नी चाहिए इतिहास गवाह है. एक हिस्से को अलग करके उसे अलग देश बनाने से परेशानियों का समाधान नहीं निकलता. हमारे सामने दक्षिणी सूडान का उदाहरण है. युगोस्लाविया का उदाहरण है. इसके अलावा एक अहम चीज है मिडिल ईस्ट की स्थिरता. मध्य एशिया को और कुछ भी चाहिए हो, सांप्रदायिक संघर्ष और गृहयुद्ध तो बिल्कुल नहीं चाहिए. एक और युद्ध का बोझ उठाने की स्थिति में कोई भी नहीं है. जाहिर है, जिसके स्टेक्स ज्यादा हैं उनका नुकसान भी ज्यादा होगा. इस हिसाब से देखा जाए, तो कुर्दों के पास पाने के लिए बहुत कुछ है और खोने के लिए बहुत कम. इराक, ईरान, तुर्की, अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के पास खोने के लिए ज्यादा है. उन्हें ज्यादा संयम और अक्लमंदी दिखाने की जरूरत है.

कुर्द रेफरेंडम के दौरान निनेवेह प्लेन्स से बेघर हुए ईसाई समुदाय के लोग इरबिल स्थित एक शरणार्थी कैंप में अपना वोट डालते हुए.
किसी और के संघर्ष की टाइमिंग तय करने वाले हम कौन होते हैं? इस पूरे इलाके को शांति की जरूरत है. मजबूत लोकतंत्र की जरूरत है. स्थिरता की जरूरत है. वैसे भी, पश्चिमी देश लोकतंत्र का काफी हवाला देते हैं. ईरान भी लोकतंत्र है. तुर्की भी लोकतंत्र (टेढ़ा है, लेकिन लड्डू तो है) है. रेफरेंडम भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. इस तस्वीर के और भी टुकड़े हैं. अभी-अभी मोसुल की लड़ाई खत्म हुई है. इस्लामिक स्टेट (ISIS) को हराना अब भी बाकी है. सीरिया में लड़ाई जारी है. ये छोटी सी चुनौती नहीं. इसे निपटाते-निपटाते कितना वक्त खर्च होगा, कहा नहीं जा सकता. आजाद कुर्दिस्तान की मांग अगर हिंसक हुई, तो केवल इराक को नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र को खूनी संघर्ष की ओर ले जा सकती है. वैसे भी, किसी समुदाय के संघर्ष का समय तय करने वाले हम कौन होते हैं! कौन तय करेगा कि उनके संघर्ष की टाइमिंग क्या होनी चाहिए? वो भी तब जब संघर्ष कुर्द जैसी सताई हुई कौम का हो. कब तक धीरज रखेंगे कुर्द?

ऑस्ट्रिया में रह रहे कुर्द रेफरेंडम के समर्थन में प्रदर्शन करते हुए.
चुटकी बजाने जितना आसान नहीं है आजाद कुर्दिस्तान कुर्दों को अपने हक के लिए आवाज जरूर उठानी चाहिए. उन्होंने बहुत भुगता है. उन्हें उनका हक मिलना ही चाहिए. बेहतर प्रशासन. अर्थव्यवस्था में सुधार. बेहतर जीवन स्तर. राजनैतिक अधिकार. लेकिन KRG के सामने अभी खुद को साबित करने की बड़ी चुनौती है. उसे प्रभावी होना होगा. बेहतर नतीजे देने होंगे. टकराव से न कुर्दों का भला होगा, न इराक का और न इस पूरे क्षेत्र का. ये भी सुनिश्चित करना होगा संयम और शांति बरकरार रहें. ISIS साझा दुश्मन है. उसे हराना सबकी जरूरत भी है और जिम्मेदारी भी. इस मुद्दे के कई स्टेकहोल्डर्स हैं. फैसला एकतरफा नहीं हो सकता. सबको बात करनी होगी. ये एक दिन-एक महीने में खत्म होने वाली प्रक्रिया नहीं. बातचीत शुरू होने के बाद भी एकराय कायम होने में बहुत लंबा समय लगेगा. कुर्दों का दर्दनाक अतीत उनके पक्ष में जाता है. इराकी नेतृत्व के अड़ियल होने से बात नहीं बनेगी. ये कह देना कि रेफरेंडम असंवैधानिक है और हम इसे नहीं मानते, समस्या का हल नहीं. उसे कुर्दों की सुननी होगी. पश्चिमी देशों को भी समझना होगा. कुर्द कोई प्लास्टिक के 'यूज ऐंड थ्रो' कप-ग्लास नहीं हैं. इस्तेमाल किया और फेंक दिया. कुर्दों की बात सुनने के अलावा और कोई दूसरी राह नहीं है.
इस वक्त खबरों में रह रहे रोहिंग्या समुदाय के बारे में भी जान लीजिए:
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