ए बबुआ, तनि हथवा पकड़ ले न त तलमला के गिर जाम. गांव में बोला जाने वाला हर दादी का फेवरेट डॉयलग. एकदम से आ गई न गांव की याद. अब गांव का नाम सुनकर आंखों से मोतियां न गिराना. लिए चल रहें हैं, गांव में नहीं उसके जैसे ही एक जगह पर. यहां न तो दादी होंगी और न हीं ये डॉयलग. 1 से 15 फरवरी तक फरीदाबाद में सूरजकुंड मेला लगता है. इस मेले में हर राज्यों के गांव की झलकियां देखने को मिल जाती है. साथ ही भगोरिया, बीन, बिहू, भांगड़ा, चरकुला, कालबेलिया, पंथी, संबलपुरी और सिद्घी गोमा जैसे डांस पर अपनी कमर लचका सकते हैं. मुंह से लार टपकाने वाले स्वादिष्ट पकवान का भी बंदोबस्त होता है वहां. 2. कबूतरबाजी
ये कोई एक दो दिन का इवेंट नहीं. दिसंबर से ले कर फरवरी तक चलता है. लगभग 500 लोग इसमें हिस्सा लेते हैं. लोग अपने कबूतरों की टांग पर नाम, पता सब लगा देते हैं. फिर कबूतरों को छोड़ देते हैं. जिसका कबूतर सबसे लंबा सफर तय कर के वापस आता है, वो आदमी जीत जाता है. जगह जगह रेफरी होते हैं जो चेक करते हैं कौन सा कबूतर कितना उड़ा. और ऐसे कोई भी कबूतर नहीं ले लेते. बाकयदा ट्रेनिंग के बाद लिया जाता है. 3. बुक फेयर
प्रगति मैदान हर साल फरवरी में किताबी कीड़ों को अपने यहां बुलाता है. चाय पर नहीं, बल्कि खाने पर. माने किताबें खरीदने के लिए. यब सिलसिला पिछले 41 साल से चल रहा है. भाई इत्ता बड़ा मेला होता है, इत्ता बड़ा कि बस में बैठ कर एक से दूसरे हॉल में जाना पड़ता है. इत्ती किताबें होती हैं कि सर चकरा जाएगा और घूमते-घूमते पैर दुख जाएगा. नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ट्रेड ऑर्गनाइजेशन के साथ मिलकर इसको ऑर्गनाइज करता है. 2013 से पहले इसकी जिम्मेदारी नेशनल बुक ट्रस्ट के मत्थे थी. पर उससे अपने को क्या. एक बात और, हर तरह की, हर उम्र के लोगों के लिए किताबें बिल जाती हैं. इसलिए विद फैमिली जाओ. और किताबों से लद कर वापस आओ. 4. मुगल गार्डन्स
प्रणब दा का घर है न. रायसीना हिल्स वाला. मललब राष्ट्रपति भवन. उनके घर में एक गॉर्डन है, मुगल गॉर्डन. 15 एकड़ का. वहां तमाम फूल हैं. जो दूर देश में कहीं-कहीं, कभी-कभी ही मिलते हैं. सबसे खास तो ट्यूलिप और गुलाब. ट्यूलिप तो प्रणब दा का फेवरेट भी है. आम जनता के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसे सबसे पहले खोला था. अब तो जो ही राष्ट्रपति आता है उसका पर्सनल टच्च नजर आता है यहां. तो मुगल गार्डन को आम जनता के लिए बसंत में खोला जाता है. यानी मिड-फरवरी से मिड-मार्च तक. दिल्ली में हो तो निकल लेओ. अपनी सफारी या उड़नखटोला ले जाओ या फिर मेट्रो से चले जाओ. सबसे पास का इस्टेशन है केन्द्रीय सचिवालय. वैसे एक बात ध्यान रखना. ब्लडी मंडे को न धमक पड़ना मुगल गार्डन देखने. थोबड़ा लटकाकर लौटोगे. मंडे को बंद रहता है, झाड़ू-फटका भी जरुरी है न. 5. ऑटो एक्सपो
है शौक अगर रापचिक और हवा से बात करने वाली गाड़ियों का तो बंधु कट लो ऑटो एक्सपो की तरफ. जाओ प्रगति मैदान और पड़ जाओ शानदार चमचमाती गाड़ियों के प्यार में. ऑटो एक्सपो हर दो साल पर ये मौका देता है. शंघाइ मोटर शो के बाद एशिया में गाड़ियों का ये दूसरा सबसे बड़ा मेला है. इसे ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एक्मा), भारतीय ऑटोमोबाइल निर्माता संघ (सियाम) और कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज (सीआईआई) मिल कर करते है. 1986 से अभी तक कुल 12 ऑटो एक्सपो हो चुके हैं. दो पहिया मिलेगा चार पहिया मिलेगा, होगी जैसी पसंद सामान वैसा मिलेगा.























