हम सबके अंदर ईगो होता है. जो झुकना नहीं जानता है. लेकिन तब, जब हमें पता हो कि हमारी कोई गलती नहीं है. तब क्या हो, जब हम एक ऐसी गलती से घिर जाएं, जो हमारे जीवन, हमारे अस्तित्व पर गहरा दाग लगा दे. और हम खुद को दोषी मानते हुए घुटते रहें.
फ़र्ज़ करिए आप रात किसी सड़क पर अकेले चले जा रहे हों. अचानक कोई आए और आपको पीटकर आपका वॉलेट, चेन, घड़ी सब ले ले. आप जब पुलिस को फोन करें तो पुलिस कहे कि गलती आप ही की है. आप वॉलेट लेकर निकले ही क्यों. चेन क्यों पहन ली. चेन पहनेंगे तो गुंडे आकर्षित होंगे ही लूटने के लिए. और घड़ी लगाना, वो तो सबसे बुरी आदत है. घड़ी तो कभी लगानी ही नहीं चाहिए.
कैसा लगेगा आपको? लगेगा न कि पुलिस पागल हो गई है? अब उन लड़कियों के बारे में सोचिए राह चलते जिन्हें पकड़कर दबोच लिया जाता है, जबरन चूम लिया जाता है, काट लिया जाता है, खरोंचा जाता है. कई बार बलात्कार कर मार डाला जाता है. कई बार जख्मी हालत में मरने के लिए छोड़ दिया जाता है.
ये लड़कियां अगर मर गईं, तो दुनिया को एक दुखद मगर संतुष्ट करने वाला अंत मिल जाता है. मगर जी गईं, तो इनके साथ वही होता है जो हालत ऊपर उस पुरुष की हुई थी जब लुटने के बाद उसने पुलिस को फ़ोन किया था.
तुम बाहर क्यों गई? तुमने कपड़े क्या पहने थे? तुमने नशा किया था? तुम रात को घर पर क्यों नहीं थी? लड़कों से मिली थीं? साथ बॉयफ्रेंड था? लिपस्टिक लगाईं थी? उसने असल में क्या किया तुम्हारे साथ?
तुम एक बुरी लड़की हो. अच्छे घर की लड़की होती तो ऐसा नहीं होता.
और चूंकि ये लड़की बुरी थी, अब इसकी शादी में होने में तकलीफ आएगी. अब जब ये सड़क पर निकलेगी तो इसे देखकर लोग जो पहली चीज सोचेंगे, वो ये कि इसकी वेजाइना अब पवित्र नहीं रही. और चूंकि वेजाइना 'पवित्र' नहीं रही, अब कौन पुरुष इसकी वेजाइना का मालिक बनना चाहेगा.
और इसलिए कि अब इसकी शादी में कोई तकलीफ न आए, सड़क चलते लोग उसकी वेजाइना के बारे में न सोचें, रेप होते हुए उसके शरीर की टुकड़ा-दर-टुकड़ा कल्पना न करें, इसलिए जरूरी है अखबार की रपटों में उसका नाम बदल दिया जाए, तस्वीरों में उसके चहरे ब्लर कर दिए जाएं और प्राइम टाइम पर लोगों के भोग के लिए चल रहे बड़े गुनाहों का 'नाट्य रूपांतरण' करने वाले शो में उसके बयान अंधेरे कमरे में रिकॉर्ड किए जाएं.
लड़की को उसके रेप पर हर बार स्पेसिफिकली शर्मिंदा महसूस नहीं करवाया जाता. मगर वो ऐसे समाज में रहती है कि उसे यकीन होता है कि इस बात को उतनी आसानी से नहीं बता सकते, जितनी आसानी से पर्स लुटने की बात को बताया जा सकता है. इसलिए औरतें न्याय के बारे में तो सोचती ही नहीं हैं. बस इतना सोचती हैं कि किसी को पता न चले. और रेप करने वाला कोई दोस्त या उसका बॉयफ्रेंड है, तब तो ये भूल ही जाएं कि न्याय नाम की कोई चीज होती भी है. अगर वो आपका दोस्त और बॉयफ्रेंड था तो उसकी क्या गलती थी. आपने खुद उसके सामने चांदी की तश्तरी में अपने जिस्म परोसा था.
इंडियन पेनल कोड का सेक्शन 228 A (साल 1983) कहता है:
'जो कोई मीडिया सेक्शन 376, 376A, 376B, 376C या 376D के पीड़ित या कथित रूप से पीड़ित व्यक्ति की पहचान को सार्वजनिक करता है, उसके 2 साल की कैद के साथ जुर्माना भी देना पड़ सकता है.'कानून किसी दैवीय शक्ति के हाथों लिखकर नहीं आते. कानून समाज को देखकर बनाए जाते हैं.
लड़कियों की तस्वीरें हम ब्लर कर देते हैं क्योंकि हमारे अंदर हिम्मत नहीं है इस बात को अपनाने की कि औरतों, समलैंगिकों और हिजड़ों के प्रति समाज हिंसक है. हमें शर्म आती है इस बात को मानने में कि हम बड़ी आसानी से रेप को जस्टिफाई कर लेते हैं. हमें शर्म आती है इस बात को मानने में कि हम एक रेप कल्चर का हिस्सा हैं- स्त्री, पुरुष, बच्चे, हम सब.
और जब अपने पुरुषों के गुनाहों को ढंकने के लिए फोटोशॉप का ये 'टूल' छोटा पड़ जाता है, तो औरत की शक्ल ढंक देते हैं.












