नीतीश कुमार. बिहार के मुख्यमंत्री. बीते दिन उनकी कई तस्वीरें आईं. कोलकाता से ममता बनर्जी के साथ. लखनऊ से अखिलेश यादव के साथ. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता की कोशिश वाली तस्वीरें. बयान भी आए. लेकिन आज हम उस पर नहीं जाएंगे. हम बात एक तीसरी तस्वीर की करेंगे जो आई पटना के एक सगाई समारोह से. ये समारोह था बिहार के दबंग नेता, सज़ायाफ़ता मुजरिम आनंद मोहन सिंह के बेटे की सगाई का. वही आनंद मोहन सिंह जो विधायक रह चुके हैं, सांसद रह चुके हैं और उन्होंने एक IAS की हत्या के लिए सज़ा काट रहे हैं. सगाई समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहुंचे तो खबरें चलने लगीं कि मुख्यमंत्री खुद आनंद मोहन की परमानेंट रिहाई का आदेश लेकर आए हैं. वही आनंद मोहन सिंह जो 32 अलग-अलग आपराधिक मामलों में आरोपी रह चुका है. वही आनंद मोहन जिस पर IPC की 17 धाराएं हत्या के प्रयास की दर्ज हैं, 3 हत्या के आरोप हैं.
उन्हीं आनंद मोहन सिंह की रिहाई को लेकर बिहार का जेल मैनुअल तक बदल दिया गया है.
आनंद मोहन को रिहा करने के पीछे क्या है नीतीश कुमार का गेम प्लान?
आनंद मोहन को किन-किन पार्टियों ने सपोर्ट किया है?


सहरसा जिले के पचगछिया गांव में एक स्वतंत्रता सेनानी हुआ करते थे. राम बहादुर सिंह. आनंद मोहन का शुरुआती परिचय यही हुआ करता था कि राम बहादुर सिंह उनके दादा हैं. कहा जाता है कि 17 साल की उम्र में ही आनंद मोहन राजनीति में सक्रिय हो गए थे. 1974 में जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान पढ़ाई-लिखाई छूटी. इमरजेंसी के दौरान जेल गए. जेल से बाहर आए तो आनंद मोहन की पहचान युवा राजपूत नेता के तौर पर होने लगी. 1980 में समाजवादी क्रांति सेना बनाई. लोकसभा चुनाव लड़ा. लेकिन हार गए. वो दौर था जब दलित जातियां राजनीतिक रूप से ज़्यादा सजग और एसर्टिव होने लगी थीं. आनंद मोहन सिंह इसे पचा नहीं पा रहे थे. उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स में आनंद मोहन को कुख्यात जातीय गिरोह का अगुआ बताया गया था. उनकी अपनी एक प्राइवेट जातीय सेना थी. ये गिरोह आरक्षण का समर्थन करने वालों को निशाने पर लेता था.
आनंद मोहन सिंह ने कभी सामाजिक परिवर्तन और समाजवाद से आकर्षित होकर राजनीति करने का फ़ैसला किया था. लेकिन बाद में उनका नाम बिहार के अव्वल गैंग्स्टर्स और अपराधियों में गिना जाने लगा. उन पर पुलिस ने इनाम घोषित किया. लेकिन आनंद मोहन के साथ एक दबंग जाति का टैग भी था -- राजपूत. सो उन्हें राजनीतिक दलों का प्रश्रय भी मिला. 1990 में जनता दल ने माहिषी विधानसभा से उन्हें टिकट दिया. आनंद मोहन विधायक बने. लेकिन इसी साल केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का ऐलान कर दिया. इन सिफ़ारिशों के मुताबिक़ सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग या OBC समुदाय को 27 फीसद आरक्षण दिया जाना था. आरक्षण के धुर विरोधी आनंद मोहन का रास्ता यहीं से अलग हो गया. 1993 में आनंद मोहन ने अपनी पार्टी बनाई बिहार पीपल्स पार्टी. BPP.
और ये 90 के दशक का बिहार था. रंगबाज़ी, गुंडई, छिनैती, गैंगवॉर और जातीय नरसंहारों की घटनाओं से अख़बारों की सुर्ख़ियां बनतीं थीं. मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद, बिहार के समाज में जातीय उथल-पुथल मची थी. उसमें कई बड़े नेता अगड़ी और पिछड़ी जातियों के कथित संरक्षक और मसीहा बनकर उभरे थे. उसी बैच के "मसीहाओं" में से एक था आनंद मोहन और दूसरा राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव. तब बिहार का कोसी अंचल इन दोनों बाहुबलियों की ख़ूनी भिड़ंतों से थर्राया रहता था. आनंद मोहन का नाम राजनीति के अपराधीकरण में पहले ही जुड़ गया था. लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वो बदनाम हुआ 1994 में हुई एक आपराधिक घटना के कारण. वैशाली में लोकसभा का उपचुनाव हुआ. सांसद बनीं आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद. आनंद मोहन अब सपरिवार राजनीति में शिफ़्ट हो गए थे.
बिहार पीपल्स पार्टी का बाहुबली नेता छोट्टन शुक्ला इसी साल केसरिया सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था. छोट्टन उत्तरी बिहार का एक कुख्यात गैंगस्टर था. 4 दिसंबर को मुज़फ़्फ़रपुर में उसकी हत्या कर दी गई. हत्या के अगले दिन पूरे राज्य में तनाव था. ख़ासतौर पर मुज़फ़्फ़रपुर में. शाम को शहर के नया टोला से छोट्टन की शव यात्रा निकाली गई. इसे मुज़फ़्फ़रपुर से वैशाली में छोट्टन शुक्ला के गांव ले जाया जा रहा था. आनंद मोहन और उनकी पत्नी लवली आनंद, अपने समर्थकों के साथ मुजफ़्फ़रपुर पहुंचे. मुज़फ़्फ़रपुर के भगवानपुर चौक पर आनंद मोहन ने भड़काऊ भाषण दिया. सामने खड़ी भीड़ ने सरकार और प्रशासन के ख़िलाफ़ भरसक नारे लगाए. फिर नारे लगाती भीड़ नेशनल हाइवे-28 पर बढ़ने लगी. खबड़ा गांव के पास हाइवे पर एक सफे़द रंग की एंबेसडर आती हुई दिखाई दी. कार के आगे गोपालगंज के ज़िलाधिकारी की नेम प्लेट थी. गोपालगंज के तत्कालीन DM जी कृष्णैया हाजीपुर से गोपालगंज लौट रहे थे.
भीड़ ने आव देखा न ताव. अधिकारी के गार्ड्स ने रोकना भी चाहा, लेकिन आक्रोषित भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया. चश्मदीदों के बकौल, DM कृष्णैया चीख-चीखकर भीड़ को बताते रहे कि वो गोपालगंज के कलक्टर हैं, मुज़फ़्फ़रपुर के नहीं. लकिन भीड़ के कान नहीं होते. DM कृष्णैया को उनकी गाड़ी से बाहर निकाला गया, बुरी तरह पीटा गया और फिर उनकी हत्या कर दी. पुलिस फ़ाइल में दर्ज किया गया है कि कृष्णैया को गोली मारने का आदेश आनंद मोहन सिंह ने दिया. उसके कहने पर छोट्टन शुक्ला के भाई भुटकुन शुक्ला ने गोली चलाई. 35 साल के निर्दोष IAS अधिकारी की हत्या से तमाम सूबे में हड़कंप मच गया. आनंद मोहन और उसकी पत्नी लवली हाजीपुर की तरफ़ फ़रार हो गए. वायरलेस सेट पर आनंद मोहन की गिरफ्तारी का संदेश गूंजने लगा और हाजीपुर से ही आनंद मोहन को गिरफ़्तार कर लिया गया.
वाकये के डेढ़ साल बाद, 1996 में जेल में रहते हुए ही आनंद मोहन बिहार की शिवहर लोकसभा सीट से चुनाव जीत गया. 1998 में दोबारा चुनाव जीता. इसी सीट से. लेकिन इस बार समर्थन मिला लालू प्रसाद यादव का. वही लालू प्रसाद जिनके विरोध में आनंद मोहन अब तक की राजनीति करता आया था. लेकिन ये साथ ज्यादा दिन नहीं रहा. 1999 में आनंद मोहन ने बीजेपी का हाथ पकड़ा. लेकिन इस बार चुनाव जीत नहीं पाया.
इधर कृष्णैया केस में बड़ा मोड़ आया 2007 में. आनंद मोहन को गोपालगंज के डीएम की हत्या में दोषी क़रार दिया गया. उसे फांसी की सजा सुना दी गई. लेकिन फांसी की सजा को हाईकोर्ट ने 2008 में उम्र कैद में बदल दिया. आनंद मोहन फिलहाल इसी केस में अपने गृह ज़िले सहरसा की जेल में सजा काट रहा है, और परोल पर बाहर आया हुआ है.
सज़ा-याफ़्ता होने के बाद आनंद मोहन चुनाव नहीं लड़ सकता था. लेकिन कारावास में होने के बावजूद, प्रदेश की राजनीति में बराबर दख़ल रखता था. 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में उसने अपनी पत्नी लवली आनंद को कांग्रेस से टिकट दिलवाया और चुनाव लड़वाया. फिर 2014 के आम चुनावों में भी सपा के टिकट पर चुनाव लड़वाया. हालांकि, दोनों चुनावों में लवली और आनंद मोहन का रसूख़ विफल रहा. फिर 2020 में राष्ट्रीय जनता दल ने आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद को टिकट दिया. वो शिवहर सीट से विधायक चुना गया. अब आते हैं हाल के अपडेट्स पर.
आनंद मोहन ने एक बड़े सरकारी अधिकारी की हत्या की और वो इस अपराध की सज़ा काट रहा था. लेकिन कुछ समय से ऐसे संकेत मिल रहे थे कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उसके प्रति नरम पड़े हैं. इस साल जनवरी में महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि पर आयोजित समारोह में लोगों ने आनंद मोहन को रिहा करने के नारे लगाये. इस पर नीतिश कुमार ने खुलेआम कहा, "ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है. उनकी पत्नी से पूछ लीजिएगा कि हम क्या कोशिश कर रहे हैं. जब उनकी गिरफ़्तारी हुई थी, तो हम लोग जार्ज साहब से मिलने गए लिए. हम लोग लगे हुए हैं जी."
बिहार सरकार की जेल नियमावली में एक नियम है. 10 अप्रैल को बिहार सरकार ने इस जेल नियमावली में संशोधन का एलान किया. ये संशोधन बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसका असर आनंदमोहन सिंह के केस पर पड़ने वाला था. क्या है ये बदलाव? बिहार कारा हस्तक, 2012 के नियम-481(i) (क) में लिखा था कि सरकारी अधिकारियों की हत्या का दोषी, अच्छे व्यवहार के आधार पर रिहाई का हक़दार नहीं होगा. पर अब इस वाक्य को ही हटा दिया गया है. संशोधन के मुताबिक़ अब सर्विंग अफ़सर की हत्या के लिए आजन्म कारावास की सज़ा भुगत रहे दोषी को भी 14 साल की सज़ा काटने के बाद अच्छे व्यवहार का लाभ मिल सकता है. यानी उसे रिहा किया जा सकता है. बिहार की राजनीति समझने वालों का मानना है कि 2012 के बिहार जेल मैनुअल में ये संशोधन सिर्फ़ और सिर्फ़ आनंद मोहन की रिहाई के लिए किया गया है.
अब सवाल ये है कि नीतीश कुमार ऐसा क्यों कर रहे हैं? बाहुबली को बाहर करके नो क्राइम के पर्सेप्शन को डाइल्यूट तो नहीं कर रहे. खासकर आरजेडी के साथ आने के बाद से उनपर यही आरोप है क्राइम को लेकर सॉफ्ट हो गए.
बिहार सरकार के इस फैसले का विरोध भी हो रहा है. सबसे तीखा विरोध बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने किया. उन्होंने 23 अप्रैल, 2023 को ट्वीट किया और कहा,
“बिहार की नीतीश सरकार द्वारा, आन्ध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) महबूबनगर के रहने वाले गरीब दलित समाज से आईएएस बने बेहद ईमानदार जी. कृष्णैया की निर्दयता से की गई हत्या मामले में आनंद मोहन को नियम बदल कर रिहा करने की तैयारी देश भर में दलित विरोधी निगेटिव कारणों से काफी चर्चाओं में है. आनंद मोहन बिहार में कई सरकारों की मजबूरी रहे हैं, लेकिन गोपालगंज के तत्कालीन डीएम कृष्णैया की हत्या मामले को लेकर नीतीश सरकार का यह दलित विरोधी व अपराध समर्थक कार्य से देश भर के दलित समाज में काफी रोष है. चाहे कुछ मजबूरी हो किन्तु बिहार सरकार इस पर जरूर पुनर्विचार करे.”
कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया और उनके कुछ सहपाठियों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है. जब आनंद मोहन की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदला गया था, उस वक्त भी उमा कृष्णैया ने इस फैसले का तीखा विरोध किया था और कहा था कि उनके लिए फांसी की सजा ही उचित है. वहीं बीजेपी सांसद सुशील मोदी ने कहा कि अगर कुछ प्रभावशाली लोगों के गंभीर मामलों में सजा के फैसले पर नियम बदले जा सकते हैं तो फिर अन्य मामलों में क्यों नहीं.
हमने आपको आनंद मोहन के अपराध की राजनीति और राजनीति के अपराध की कहानी बताई. किन-किन पार्टियों ने उसे सपोर्ट किया, ये बताया. और ये भी कि किस पार्टी ने किस नफ़े के लिए उसको अपने पाले में लिया. लेकिन बॉटमलाइन क्या है? एक दुर्दांत अपराधी है, जिसने हिंसा भड़काई थी. एक IAS अफ़सर की हत्या की. और हत्या के इस दोषी की रिहाई की पैरवी ख़ुद राज्य के मुख्यमंत्री कर रहे हैं. क्या ये मान लिया जाए कि बिहार में अपराधियों को संरक्षण मिलना "बंद" हो गया है, या सुशासन के आने के बाद ये बातें पुरानी हो गई हैं.\
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: दलित IAS के हत्यारे आनंद मोहन की रिहाई के पीछे नीतीश कुमार का गेम प्लान ये तो नहीं?






















