The Lallantop

तालिबान सरकार के विदेश मंत्रालय पर किसने हमला कर दिया?

IS-KP और तालिबान में झगड़े की क्या वजह है?

Advertisement
post-main-image
IS-KP और तालिबान में झगड़े की क्या वजह है?

जनवरी में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल का तापमान अक्सर शून्य से नीचे पहुंच जाता है. 11 जनवरी की शाम भी कुछ-कुछ वैसी ही थी. लोग अपना काम निपटाकर जल्दी घर लौटने की फ़िराक़ में थे. ऐसे लोगों में एक जमशेद करीमी भी थे. वो विदेश मंत्रालय की इमारत के बाहर अपनी टैक्सी लेकर खड़े थे. उन्हें उस पैसेंजर का इंतज़ार था, जो आधे घंटे में लौटकर आने का वादा करके इमारत में गया था. इसी इंतज़ार के बीच एक शख़्स अपने कंधों पर एक भारी-भरकम बैग और राइफ़ल लादे टैक्सी के बगल से गुज़रा.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement

तालिबान के शासन में इस तरह के दृश्य आम दिनचर्या का हिस्सा थे. लेकिन इस बार मामला कुछ अलग था. कुछ ही मिनट बाद वहां पर आग का भभूका उठा. फिर ज़ोर से धमाके की आवाज़ सुनाई दी. इसके बाद तो चीख-पुकार मचने वाली थी. जमशेद करीमी की टैक्सी के बगल से गुजरा शख्स आत्मघाती हमलावर था. वो अपने शरीर पर बम की पेटी बांधकर आया था. उसने मिनिस्ट्री की इमारत में घुसने की कोशिश की थी. जब उसे रोका गया, तब उसने बम का रिमोट दबा दिया. इस हमले में 20 लोगों के मारे जाने की ख़बर है. लगभग 40 घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है. कुछ की हालत गंभीर है. इस हमले की ज़िम्मेदारी इस्लामिक स्टेट के खुरासान विंग (IS-KP) ने ली है.

तो आइए IS-KP और तालिबान के बीच चल रहे झगड़े को विस्तार से समझते हैं.

Advertisement

जैसा कि हमने पहले भी बताया, ISKP का फ़ुल फ़ॉर्म है, इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रॉविंस. ये इस्लामिक स्टेट फ़ॉर इराक़ एंड सीरिया (ISIS) का एक ब्रांच है. जिसके IS या दाएश भी कहते हैं. दाएश पूरी दुनिया में ख़िलाफ़त की स्थापना करना चाहता है. इसके लिए उसने अलग-अलग इलाकों में अपना पांव पसारना शुरू किया. जल्दी ही ये अफ़ग़ानिस्तान में दाखिल होने वाला था. कैसे? दरअसल, 2014 में पाक आर्मी के ऑपरेशन में तहरीके तालिबान पाकिस्तान (TTP) को ज़बरदस्त नुकसान पहुंचा. TTP के कई बड़े कमांडर भागकर अफ़ग़ानिस्तान चले गए. उन्होंने नांगरहार और कुनार जैसे इलाकों में शरण ली. उसी में एक कमांडर मुल्ला सईद ओरकज़ई उर्फ़ हाफ़िज़ सईद ख़ान भी था. वो TTP के फ़ाउंडिंग मेंबर्स में से एक था. अगस्त 2009 में TTP का फ़ाउंडर बैतुल्लाह महसूद एक ड्रोन हमले में मारा गया. इसके बाद ग्रुप की लीडरशिप को लेकर झगड़ा हुआ. इसमें हाफ़िज़ की पसंद को नकार दिया गया. 2013 में TTP लीडर हकीमुल्लाह महसूद भी अमेरिका के ड्रोन अटैक में मारा गया. उस समय जो तीन नाम लीडरशिप के लिए सामने आए, उसमें हाफ़िज़ भी शामिल था. लेकिन एक बार फिर उसको रिजेक्ट कर दिया गया. इससे वो बहुत नाराज़ हुआ. जल्दी ही पाकिस्तान सरकार TTP के ख़िलाफ़ ऑपरेशन शुरू करने वाली थी. इस ऑपरेशन में TTP को भारी नुकसान हुआ. हाफ़िज़ सईद ख़ान के लिए पाकिस्तान में बहुत कम संभावना बची थी.

TTP के लड़ाके 

अक्टूबर 2014 में उसने TTP को छोड़ दिया. इसके बदले उसने दाएश के अबूबक्र अल-बग़दादी को अपना नेता मान लिया. बग़दादी ने जनवरी 2015 में उसको IS की अफ़ग़ानिस्तान ब्रांच की कमान सौंप दी. कायदे से इस ब्रांच का नाम इस्लामिक स्टेट अफ़ग़ानिस्तान होना था. लेकिन इसमें खुरासान कहां से आया? इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है. असल में, ख़ुरासान एक प्राचीन इलाके का नाम है. ये सातवीं सदी में इस्लामी ख़िलाफ़त का हिस्सा था. इसका शाब्दिक अर्थ होता है, उगते सूर्य की धरती. मौजूदा समय में ख़ुरासान के कुछ-कुछ हिस्से अफ़ग़ानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और ईरान में फैले हुए हैं. इस्लामिक स्टेट उस दौर को लौटाना चाहता है. इसलिए, उसने अफ़ग़ानिस्तान वाले ब्रांच को ख़ुरासान का नाम दिया था.

ये तो हुआ ISKP का परिचय. अब एक शंका का समधान कर लेते हैं. दूर से देखने पर तालिबान और इस्लामिक स्टेट एक जैसे लगते हैं.

Advertisement

मसलन,

दोनों कट्टर इस्लामी संगठन हैं.

दोनों शरिया कानून लागू करना चाहते हैं.

दोनों गुट अलक़ायदा और दूसरे आतंकी संगठनों के साथ काम कर चुके हैं.

दोनों पश्चिमी देशों को अपना दुश्मन मानते हैं.

महिलाओं और अल्पसंख्यकों को लेकर दोनों का रवैया लगभग एक जैसा है.

इतनी सारी समानताओं के बावजूद दोनों झगड़ा क्यों करते हैं?

इसके लिए हमें तालिबान और इस्लामिक स्टेट के बीच का बारीक अंतर समझना होगा. तीन बड़े भेद हैं:-

- नंबर एक. IS इस्लाम की सलाफ़ी विचारधारा को मानता है. जबकि तालिबान हनफ़ी विचारधारा का पालन करता है. IS के मुताबिक, हनाफ़ी इस्लाम के असली प्रतिनिधि नहीं हैं.

- नंबर दो. तालिबान अफ़ग़ानिस्तान की सीमा के अंदर रहकर शासन चलाने वाला संगठन है. उसने अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी अमीरात की स्थापना की. दूसरी तरफ़, इस्लामिक स्टेट पूरी दुनिया पर ख़िलाफ़त थोपना चाहता है. उसका मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान पर भी ख़िलाफ़त का राज होना चाहिए. इसलिए, वे तालिबान की सरकार को नहीं मानते हैं.

- नंबर तीन. इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान में भी सरकार को गिराना चाहता है. उसे ईरान की शिया सरकार से भी आपत्ति है. इसके बरक्स तालिबान दोनों देशों के साथ कूटनीतिक संबंध बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है.

- नंबर चार. तालिबान ने 2020 में अमेरिका के साथ शांति समझौता किया. इसमें उन्होंने वादा किया था कि वे अफ़ग़ानिस्तान में ऐसे संगठनों को पनाह नहीं देंगे, जिनसे पश्चिमी देशों को ख़तरा हो. अमेरिका ने इस्लामिक स्टेट को आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है. इसके चलते ISKP को अपनी ज़मीन खोने का डर रहता है. तालिबान सरकार ने पाकिस्तान की मदद से ISKP के ख़िलाफ़ ऑपरेशन भी चलाता रहता है. नवंबर 2021 में तालिबान ने जलालाबाद में इस्लामिक स्टेट के कुछ लड़ाकों को मारकर खुले में टांग दिया था. ये संदेश देने की कोशिश थी. लेकिन उन्हें बहुत सफलता नहीं मिली है.

तालिबान के लड़ाके 

तालिबान की वापसी के बाद पहले साल में आतंकी हमलों की संख्या में 51 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई. इन हमलों में 700 से अधिक लोग मारे गए और लगभग डेढ़ हज़ार घायल हुए.
कुछ बड़े हमलों के बारे में जान लीजिए,

- 26 अगस्त 2021 को काबुल इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर सुसाइड ब्लास्ट. इस धमाके में 183 लोग मारे गए. इनमें से 13 यूएस मिलिटरी से थे. ज़िम्मेदारी ISKP ने ली. बदले में अमेरिका ने नांगरहार में हवाई हमले किए.

- 04 मार्च 2022 को ISKP के एक आतंकी ने पेशावर की एक मस्जिद में ख़ुद को बम से उड़ा लिया. इसमें 63 लोग मारे गए थे.

- 29 अप्रैल 2022 को काबुल में सूफी मस्जिद पर बम धमाका. 50 लोगों की मौत.

- 18 जून 2022 को काबुल में एक गुरुद्वारे पर गोलीबारी. ISKP का दावा, नुपूर शर्मा के विवादित बयान का बदला लिया.

- 05 सितंबर 2022 को रूसी दूतावास के बाहर बम धमाका. इसमें आठ लोग मारे गए. इनमें दो रूसी दूतावास के स्टाफ़्स भी थे.

- 30 सितंबर 2022 को दश्त-ए-बार्ची में एक कोचिंग सेंटर में आत्मघाती हमला. न्यूज़ एजेंसी एपी की रिपोर्ट के अनुसार, इस हमले में कम से कम 52 लोग मारे गए. हताहत होने वालों में अधिकतर बच्चे थे.

- 04 दिसंबर को काबुल में पाकिस्तान के मिशन पर हमला. निशाना पाकिस्तान के टॉप डिप्लोमैट थे. लेकिन वो बच गए.

- 12 दिसंबर 2022 को काबुल में लोंगन होटल पर गोलीबारी. ये होटल अफ़ग़ानिस्तान आने वाले चीनी नागरिकों में पॉपुलर था. इसमें किसी भी चीनी नागरिक को नुकसान नहीं पहुंचा. तीनों हमलावरों को मार गिराया गया.

और, अब नए साल में विदेश मंत्रालय की इमारत पर हमला हो गया. अफ़ग़ानिस्तान में शायद ही ऐसी कोई जगह बची है, जहां हमला ना हुआ हो. ये हालात तब हैं, जब तालिबान सरकार में है. एक समय तक ISKP के ढाई से तीन हज़ार सदस्य हुआ करते थे. तालिबान के ऑपरेशन के बाद उनकी संख्या घटी है. इसके अलावा, इराक़ और सीरिया में इस्लामिक स्टेट सिमट चुका है. उसके लीडर्स एक-एक कर मारे जा रहे हैं. इसलिए, वे अफ़ग़ानिस्तान ब्रांच को मदद देने की हालत में नहीं बचे हैं. जानकारों का मानना है कि ISKP तालिबान सरकार के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ सकता. ऐसे में उनके पास अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का इकलौता विकल्प टारगेटेड अटैक है.

इससे ISKP को क्या फायदा होता है?

जानकार बताते हैं कि, ISKP के फायदे से ज़्यादा तालिबान का नुकसान अहम है. तालिबान लगभग सभी वादों को पीछे छोड़ चुका है. वो महिलाओं की पढ़ाई हो, समान अधिकार की बात हो, शासन में लचीलापन का दावा हो, तालिबान ने इन सबसे मुंह फेर लिया है. इसको लेकर बाकी दुनिया में उसकी लानत-मलानत भी हो रही है. ऐसे में सिक्योरिटी वाला पक्ष तालिबान को अपर हैंड देता है. अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन पर पलने वाले आतंक से उसके पड़ोसियों के साथ-साथ पश्चिमी देशों को भी ख़तरा है. दो महाशक्तियों ने अंदर जाकर लड़ने का परिणाम भुगत लिया है. इसलिए, ये देश तालिबान पर भरोसा करने के लिए मजबूर हैं. 

तालिबान के लिए भी अपनी वैधता साबित करने के लिए ISKP या दूसरे चरमपंथी संगठनों को रोकना होगा. अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं तो सत्ता पर से उनका दावा कमज़ोर होता है. फिलहाल के लिए ISKP इसी मकसद के साथ काम कर रही है. उसने सबसे सुरक्षित माने जाने वाले विदेशी दूतावासों और अब विदेश मंत्रालय पर हमला करके इसकी झलक दिखला दी है. अगर समय रहते इस समस्या को रोका नहीं गया तो, ये अफ़ग़ानिस्तान के साथ-साथ बाकी देशों के लिए भी नासूर बन सकता है.

वीडियो: दुनियादारी: बोको हराम वाले नाइजीरिया में नौजवान लोग अपहरण के धंधे में क्यों शामिल हो रहे हैं?

Advertisement