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जब धरती पर हुई 10 लाख सालों की बारिश और पैदा हुए डायनोसौर!

वो प्रलय जिसमें 90 % जीव मारे गए और शुरू हुई ऐसी बारिश जो लाखों सालों तक रुकी ही नहीं

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पर्मियन काल में हुई बारिश के बाद 23 करोड़ साल पहले, पहले डायनोसौर पैदा हुए (सांकेतिक तस्वीर: pixabay)

गुलजार जब लिखते हैं, ‘सीलनें इस तरह बहती हैं, जैसे खुश्क रुख़सारों पे गीले आंसू चलते हैं,’. हमें बारिश याद आती है. याद आता है चेरापूंजी. जिसके बारे में सिर्फ़ इतना पता है कि रिकॉर्ड तोड़ बारिश होती है वहां. ये बारिश ही है , जिसने ज़मीन को तरावट दी और जवानों को बचपन की यादें. बारिश के बिना न जिंदगी मुमकिन है न दुनिया. इसलिए बारिश से जुड़ी एक कहानी सुनाएंगे आपको आज. एक ऐसी बारिश जो शुरू हुई और रुकी नहीं. दिन हफ़्ते महीने नहीं, सालों तक. 

कितने साल? 10 लाख सालों तक. जब रुकी तो दुनिया सचमुच बदल चुकी थी. और पैदा हो चुके थे, वो विशालकाय जीव, जिन पर फ़िल्में बनाकर हॉलीवुड आज भी अरबों कमा रहा है. बात कर रहे हैं डायनोसौर की. चलेंगे कुछ 25 करोड़ साल पहले. रुकिए, ऐसे समझ ना आएगा. एक काम करते हैं. बिग बैंग की शुरुआत से आज तक के समय को एक कैलेंडर में तब्दील कर लेते हैं. इसे बुलाएंगे कॉस्मिक केलेंडर. तो इस कैलेंडर के हिसाब से 1 जनवरी की रात 12 बजे हुआ बिग बैंग. और 31 दिसंबर, 10 बजकर 24 मिनट पर पहले इंसान, यानी वो प्रजाति जिन्हें हम होमो कहकर बुलाते हैं, पैदा हुए.

हमारी कहानी के लिए हम चलेंगे इस कैलंडर की 24 दिसंबर की तारीख पर. स्क्रीन पर दिख रहा नक्शा देखिए. चौंकिए नहीं ये अपनी ही दुनिया है, धरती जिसे कहते हैं, 25 करोड़ साल पहले ऐसी दिखती थी. देखिए दाएं लाल गोले में भारत भी दिख रहा है. आज की तरह तब 7 महाद्वीप नहीं थे. सिर्फ एक था. इस महाद्वीप का नाम है पैंजिया. ‘था’ नहीं कह रहे क्योंकि तब नाम देने के लिए इंसान नहीं थे. ये नाम दिया गया 20 वीं सदी की शुरुआत में.

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अल्फ्रेड वेगनर ने 1912 में पहली बार ये थियोरी दी थी कि दुनिया के सभी महाद्वीप पहले जुड़े हुए थे (तस्वीर: Wikimedia Commons)

एक जर्मन वैज्ञानिक थे- अल्फ्रेड वेगनर. एक सुबह वेगनेर दुनिया का नक्शा देख रहे थे. उन्होंने एक दिलचस्प चीज नोटिस की. दक्षिण अमेरिका का पूर्वी तट और अफ्रीकी महाद्वीप का पश्छिमी तट किसी पजल के दो टुकड़ों की तरह थे. जिन्हें आपस में जोड़ो तो एकदम फ़िट बैठरे थे. धीरे-धीरे एक तस्वीर उभरने लगी. मेडागास्कर अफ्रीका के किनारे फिट बैठ रहा था और भारत के पश्चिमी छोर अफ्रीका से यूं जोड़ा जा सकता था, मानों एक ही टुकड़े से दोनों अलग हुए हों. वेगनेर ने इस आधार पर एक हाइपोथिसिस ईजाद की. जो कहती थी कि सातों महाद्वीप कभी एक साथ जुड़े हुए थे. इस सुपरकॉन्टिनेन्ट का नाम उन्होंने पैंजिया रखा. बाद के सालों में वैज्ञानिक ने समुद्र के फर्श की मैपिंग से इस थियोरी को सही प्रूव किया.

पैंजिया बना कब था?

धरती की शुरुआत से ही जमीन के टुकड़े अलग-अलग आकर में जुड़ते बिखरते रहे हैं. करीब 32 करोड़ साल पहले इन टुकड़ों ने एक सुपर कांटिनेंट का रूप लिया.जीवन अंगड़ाई ले रहा था और प्रजातियों की बड़ी तादाद विकास यात्रा पे थी. इनमें से दो हालांकि सबसे महत्वपूर्ण थीं. सिनैपसिड्स और सौरोपसिड्स. सिनैपसिड्स प्रजाति के ही कुछ जीव आगे जाकर स्तनपायी जीव बने. दूसरी तरफ सौरोपसिड्स थे, जो पक्षियों और सांप आदि रेंगनेवाले जीवों के पूर्वज थे. इनके अलावा पेड़-पौधों, कीड़ों, समुद्री जीवों की भी कई प्रजातियां थीं. जो एकदम अनुकूल वातावरण में फल-फूल रही थीं. लेकिन फिर ये हालात जल्द ही बदलने लगे. जल्द समय हम कॉस्मिक कलेण्डर के हिसाब से कह रहे हैं. असलियत में ये अवधि करोड़ों साल की थी.

साल 2019 में साइंस मैगज़ीन में छपी, स्टैंडफोर्ड युनिवर्सिटी की एक रिसर्च के अनुसार कुछ 25 करोड़ साल पहले धरती पर एक प्रलय आया, जिसमें 90 % के आसपास जीव जंतु ख़त्म हो गए. इस घटना को ‘Permian–Triassic Extinction Event’ कहा जाता है. धरती के शुरुआत से लेकर अब तक 5 बार प्रलय की घटनाएं हो चुकी हैं. आख़िरी बार ऐसा 6.5 करोड़ साल पहले हुआ था. जब धरती से डायनोसौर का नामों निशान मिट गया था. डायनोसौर की विलुप्ति का कारण धरती से एक उल्कापिंड का टकराना था. लेकिन permian–triassic extinction क्यों हुआ, इस पर वैज्ञानिक आज तक एकमत नहीं हो पाए हैं. 

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32 करोड़ साल दुनिया एक महाद्वीप थी -पैंजिया (तस्वीर: getty) 

कुछ थियोरीज़ जरूर हैं. मसलन माना जाता है की शायद ज्वालामुखियों के फटने से ऐसा हुआ था. एक कारण ये भी हो सकता है कि आग लगने के कारण कोयलों से निकली कार्बन मोनो ऑक्साइड ने ग्लोबल वार्मिंग को अंजाम दिया हो. कई और कयास भी हैं. लेकिन एक बात पर सारे वैज्ञानिक सहमत हैं. धरती और समुद्र का तापमान तक बढ़ने लगा था. समंदर उबलने लगे, ऑक्सीजन की कमी होती गई और 90 % समुद्री जीव मारे गए. ऐसा ही कुछ जमीन पर भी हुआ. जहां एसिड की बारिश ने 80% जीवों की प्रजातियां नष्ट कर दीं. इस घटना को वैज्ञानिकों ने ‘Great Dying’ का नाम दिया है.

10 लाख सालों की बारिश 

ग्रेट डाईंग के अगले 1 करोड़ सालों तक हालात ऐसे ही रहे. और फिर शुरू हुई उस काल की जिसे ट्राईएसिक पीरियड कहा जाता है. 1990 तक वैज्ञानिक मानते आए थे कि ट्राईएसिक पीरियड की शुरुआत में जमीन एकदम सूखी और बंजर थी. फिर 1989 में ब्रिटेन के दो जियोलॉजिस्ट्स, माइकल जे सिम्स और एलिस्टर रफल ने एक नई खोज पब्लिश की. चट्टानों की तलहटी से मिले निशानों से उन्होंने पता लगाया कि ट्राईएसिक पीरियड एकदम सूखा नहीं था.

 2 दशक तक इस खोज पर बहस हुई और 2010 के आसपास वैज्ञानिक इस बार पर एकमत हुए कि 23 करोड़ साल पहले धरती पर एक ऐसी बारिश हुई थी, जो 10 लाख सालों तक होती ही रही. थम्ब में हमने ये बात लिखी है. और शायद आपको लगा हो कि क्लिक बेट कर रहे हैं. लेकिन ये बात पूरी तरह विज्ञान द्वारा सत्यापित है. हालांकि यहां ऐसा दावा नहीं है कि ये अंतिम सत्य है. अभी के सुराग ये बता रह हैं, कल कुछ और सुराग मिले, जो दूसरी तरफ इशारा करें तो सच भी बदल जाएगा. यही विज्ञान की खूबसूरती है. यहां बहस की गुंजाइश है. अब देखिए न, वैज्ञानिक तो इस बार पर भी सहमत नहीं हैं कि 10 लाख साल तक बारिश हुई तो हुई कैसे.

एक थियोरी बताती है इस वर्षा से पहले 50 लाख सालों तक लगातार ज्वालामुखी फूटे. गर्मी से नमी इतनी बढ़ी कि मई महीने में दिल्ली वाले इससे तुलना कर सकते हैं. जोक्स असाइड, लाखों सालों तक हुई इस बारिश से एक कमाल की चीज हुई. पैंजिया महाद्वीप चूंकि धरती का एक बड़ा टुकड़ा था, समंदर से उठा मानसून अक्सर इसे केंद्र तक नहीं पहुंच पाता था. लेकिन लाखों सालों की बारिश ने पैंजिया के बीच के इलाके को भी झमाझम कर दिया. बूंदो की इस बारिश में कुछ नए सिर उठे. पहले छोटे, उंगली बराबर, और फिर धीरे-धीरे इतने बड़े कि सबसे बड़े सर का आकार डेढ़ मीटर पहुंच गया. कुछ देर पहले हमने आपको बताया था कि पैंजिया पर दो प्रजातियों का वर्चस्व था. सिनैपसिड्स और सौरोपसिड्स. प्रलय के बाद बिचारे सिनेपिड्स लगभग लुप्त हो गए. कुछ एक जीवों को छोड़कर. जो बचे, आगे जाकर स्तनपाई जीवों के रूप में विकसित हुए. 

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25  करोड़ साल पहले आए प्रलय में 90 % समुद्री जीव मर गए थे (तस्वीर: stanford.edu)

दूसरी तरफ़ सौरोपसिड्स की मौज रही. इनसे पक्षियों और रेंगनेवाले जंतुओं का विकास हुआ. और विकास हुआ उस महाकाय जीव का, जिसे हम डायनोसौर के नाम से जानते हैं. हालांकि ऐसा नहीं था कि डायनोसौर शुरुआत से ही विशालकाय हो गए थे. नहीं. शुरुआती डायनोसौर छोटे, लगभग मुर्गी के आकार के. फिर जैसे जैसे तापमान बढ़ा, डायनोसौर का आकार भी बढ़ता गया. क्योंकि पहले महज़ ठंड से बचने में शरीर की सारी ऊर्जा बर्बाद हो जाती थी. इस ऊर्जा को आज़ादी मिली तो उसने शरीर का आक़ार बढ़ाने का काम किया. साथ ही लाखों साल हुई बारिश के बाद पेड़ पौधों को उगने के लिए जमीन मिली थी. इसलिए शुरुआती डायनोसौर में अधिकतर शाकाहारी थे. फिर जैसे जैसे जानवरों की और प्रजातियां विकसित हुईं, कुछ डायनोसौर मांसाहारी बन गए. ये सिलसिला 16 करोड़ साल तक चला. फिर कुछ साढ़े 6 करोड़ साल पहले धरती पर एक और प्रलय आया. जिसमें डायनोसौर का समूल विनाश हो गया.

पैंजिया सुपरकांटिनेंट का क्या हुआ?

करीब 18 करोड़ साल पहले टेक्टोनिक प्लेट्स के मूवमेंट से जमीन का ये विशाल टुकड़ा दो हिस्सों में बंटना शुरू हुआ. 4 इंच प्रति वर्ष की रफ़्तार से. ये दो टुकड़े कहलाए, लॉरेशिया और गोंडवानालैंड. 13 करोड़ साल पहले लॉरेशिया आगे टूटकर यूरोप, एशिया और उत्तर अमेरिका में बंट गया. और गोंडवानालैंड से अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया और साउथ अमेरिका बने. साथ ही बना वो टुकड़ा जिसे हम भारतीय उपमहाद्वीप कहते हैं. भारतीय प्लेट यूरेशिया से टकराई और जन्म हुआ हिमालय का.

 ये विघटन यहीं न रुका. अभी भी हो रहा है और लगातार. शुरुआत एक नक़्शे से की थी. इसलिए अंत में एक और नक्शा दिखाते हैं. हालांकि ये सिर्फ संभावित नक्शा है. 5 करोड़ साल के बाद का. जब अफ्रीका का उत्तरी हिस्सा जाकर यूरोप से टकरा जाएगा. जिससे मेडिटरेनियन सागर ख़त्म हो जाएगा और वहां पहाड़ बन जाएंगे. बाकी हिस्सों में भी अंतर आएगा और भारत भी वैसा नहीं रहेगा जैसा नक्शा हम आज बनाते है. हालांकि तब तक इंसान रहेंगे या नहीं, ये कहना मुश्किल है. 

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