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जब सताए हुए मर्द औरतों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे

और महिलाओं ने पुरुषों को हथियारों से जवाब दिया था. और हां, ये इंडिया में ही हुआ था.

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फोटो - thelallantop
महिलाओं को हक के लिए लड़ते तो बहुत देखा और सुना होगा. लेकिन अपने हक के लिए महिलाओं के खिलाफ मर्दों का विद्रोह कभी देखा या सुना है? 1960 के आस-पास मेघालय में हुआ था यह विद्रोह. मर्दों का प्रदर्शन मातृसत्ता के खिलाफ था.
मातृसत्ता यानी औरतों की सत्ता. हम अक्सर पितृसत्ता की बात करते हैं.
पितृसत्ता यानी पुरुष प्रधान समाज. जिसमें सबकुछ डायेरक्ट या इनडायरेक्ट मर्दों जुड़ा होता है. महिलाएं बस घर संभालने, बच्चे पालन के लिए जरुरी होती हैं. पिता की संपत्ति का वारिस बस बेटे ही होते हैं. संपत्ति तो छोड़िए बेसिक जरुरत जैसे कि पढ़ाई-लिखाई, खान-पान इन पर भी लड़कों का ही हक होता है. लड़कियां बस भाईयों को स्कूल जाते, अच्छा खाते, अच्छे कपड़े पहनते देख ही सकती हैं, अपने लिए सपने और पसंद तो बिल्कुल ही नहीं सोच सकती हैं.
मगर पितृसत्ता को सिर्फ इन सब चीजों में ही नहीं, और बहुत सी चीजों में देखा जाता है. मसलन, एक पुरुष का एक औरत पर कंट्रोल होना. जब हम एक लड़की से कहते हैं कि तुम रात को बाहर घूमने न जाओ या अपनी मर्जी के कपड़े न पहनो, ये असल में एक पितृसत्तात्मक सोच का नतीजा होता है. कुल मिलकर पितृसत्ता वो होती है जिसमें पुरुष औरत का स्वामी होता है. और औरत की फ्रीडम उसकी अपनी नहीं, पुरुष से ली गई फ्रीडम होती है.

अब सोचिए इसका ठीक उल्टा कर दिया जाए!

जिस तरह का पिछड़ापन औरतों के साथ देखा जाता ही, वैसा ही पिछड़ापन कुछ समुदायों में लड़कों के साथ है. बचपन से ही लड़कों की तुलना में लड़कियों के पढ़ाई, पहनाव, लाड़-प्यार हर मामले में ज्यादा ध्यान दिया जाता है. इसके कारण लड़के हीनभावना से ग्रस्त हो जाते हैं. खुद को असुरक्षित मानने लगते हैं, उनके मन में ये बात घर कर जाती है कि वो कुछ नहीं कर सकते हैं.

मेघालय

राज्य की लगभग 80 फीसदी आबादी खासी, गारो और जैंतिया वनवासियों की है. इनके यहां महिलाओं की तूती बोलती है. यहां बेटी जन्माने पर शान बढ़ जाती है.
मेघालय में वंश परंपरा महिलाओं के नाम से चलती है. पैतृक संपत्ति में भी बेटे के जगह बेटियों का वर्चस्व होता है. खासकर छोटी बेटी का. इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि छोटी बेटी ज्यादा दिन तक मां-बाप के पास रहकर उनकी सेवा करती है. किसी परिवार के पास अगर बेटी नहीं है तो उन्हें बेटी गोद लेनी पड़ती है. ताकि उसे वारिस बना सकें. नियमों के अनुसार बेटे संपत्ति के मालिक नहीं हो सकते हैं.
मर्दों का सारा समय नशा करने, जुआ खेलने में चला जाता था. सिर्फ धार्मिक औऱ राजनीति में इनकी दिलचस्पी रह जाती थी. वहीं महिलाएं पूरे परिवार के लिए रोजी-रोटी कमाने से लेकर बच्चे को संभालने का काम करती है. छोटे-बड़े हर फैसले भी महिलाएं ही लेती हैं.
Tribal Khasi village woman shells pineapples at a road side markets at Nongpho, in northeast India's Megahlaya state on August 12, 2003. Megahlaya is dominated by three tribes - Khasis, Jaintias and Garos.
Tribal Khasi village woman shells pineapples at a road side markets at Nongpho, in northeast India's Megahlaya state on August 12, 2003. Megahlaya is dominated by three tribes - Khasis, Jaintias and Garos. REUTERS.

स्त्री-पुरूष रेशियो भी यहां बेहतर है. 1050 मर्दों पर 1035 महिलाएं हैं.

केरल में नायर जाति

केरल की नायर जाति में भी मातृसत्ता की व्यवस्था है. सिर्फ निर्णय प्रक्रिया में पुरुषों, खासकर मामा की चलती है. इस व्यवस्था को ‘तारवाड़ व्यवस्था’ कहते हैं. शादी के बाद महिलाएं अपना घर छोड़कर नहीं जाती. पुरुष ससुराल में रात बिताकर वापस अपने घर चले जाते थे. गृहस्थी में पिता और दामाद स्थायी सदस्य नहीं होते हैं. उनकी पहचान तारवाड़ वंश के रुप में होती है. बच्चा अपनी मां के तारवाड़ का स्थायी सदस्य होता है. घर की बुर्जग महिलाएं परिवार में होने वाली शादी-ब्याह, जन्म-मृत्यु किसी भी समारोह या कर्मकांड के लिए निर्णय लेती है. कौन सी महिला कितनी शक्तिशाली हैं, ये उसके उम्र या कार्णवर (ऐसा पुरुष जो संपत्ति की देखभाल करता हो) उसकी नातेदारी से तय होती है.

बिकौवा ब्राह्मण

एक समय बिहार के मिथिलांचल में ऐसी प्रथा थी. जहां पर 'कुलीन' ब्राह्मण अपनी लड़कियों की शादी आर्थिक रुप से कमजोर ब्राह्मण युवा से कर देते थे. ताकि वो उनकी बेटी पर हावी ना हो सके और ससुराल में रह सके. दिलचस्प पहलू ये है कि इन लड़कों की कई बीवियां होती थी, जिनके पास ये बारी बारी से जाते थे. इसका जिक्र नागार्जुन की उपन्यास 'रतिनाथ की चाची' में है.

मगर क्या मातृसत्तात्मक एक अच्छी दुनिया है?

हमें लगेगा कि वाह, ऐसी दुनिया में तो न लड़कियों को छेड़ा जाएगा, न वो किसी से डरेंगी. वो तो मजबूत होंगी, ठीक वैसा ही जैसा हम चाहते हैं. मगर नहीं, किसी भी चीज की अति ख़राब होती है.
पितृसत्ता हो या मातृसत्ता, दोनों ही समाज के लिए हानिकारक हैं. पितृसत्ता का भुगतभोगी तो आज पूरा समाज है. वैसे ही इन दोनों जगहों पर मातृसत्ता की वजह से हाल है. समाज को सही से चलाने के लिए दोनों को ही बराबरी पर रहना होगा.

मगर राजनीति में इसका प्रतिबिंब नहीं दिखता

निजी जीवन में महिलाएं चाहे जितनी सशक्त हो. राजनीतिक पिछड़ापन अभी भी जारी है. देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बहुत ही कम है. बस 9 फीसदी. मेघालय की 60 सीट में महिलाओं की भागीदारी बस 5 फीसदी है.
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आज से लगभग 60 साल पहले हुआ ये छोटा सा विद्रोह जाने कैसा रहा होगा. हमारे पास कोई तस्वीरें नहीं हैं. मगर 1988 की इंडिया टुडे मैगजीन में इसका जिक्र मिलता है.
और हां, जब महिलाएं इस विद्रोह के खिलाफ सशस्त्र प्रदर्शन करने लगी तो मर्दों ने आंदोलन खत्म कर दिया था.


ये स्टोरी भारती ने की है.

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