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'जब मेरे सैनिक दोस्तों के चिथड़े उड़ रहे थे, तब भारत क्रिकेट के जश्न में था'

3 कश्मीरी लड़कियों और वहां तैनात जवानों की बात

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Photo: Reuters
Anurag arya
अनुराग आर्य पेशे से डॉक्टर हैं, पर उनके झोले में खूब सारी कहानियां होती हैं. स्किन स्पेशलिस्ट हैं, समाज की डेड स्किन भी कुरेदते रहते हैं. ब्लॉग पर 'दिल की बात' लिखते हैं बहुत पहले से. राजनीतिक मसलों पर इंसानियत के एंगल से लिखते हैं. उन्होंने कश्मीर पर लिख भेजा है. तीन कश्मीरी छात्राओं और कुछ जवानों से बातचीत के आधार पर. पढ़िए. सोचिए.



मेरी कश्मीर यात्रा के दौरान श्रीनगर की तीन मेडिकल छात्राओं ने मुझसे कहा था, क्या दुख भौगोलिक भी होते हैं? कभी सोचा है आपने, कश्मीर में पैदा हुआ बच्चा देश के किसी दूसरे हिस्से में पैदा हुए बच्चे से किस तरह अलग होता है? अपना जन्म चुनने की आज़ादी नहीं है उसके पास!
"मानता हूं हमारे-तुम्हारे पॉलिटिकल लीडर्स की नाकाबिलियत ने चीज़ों को मुश्किल किया है. ये भी सच है कि एक ऐसी नस्ल जो बंदूक के साये में पली-बढ़ी होती है, उसमें शक और गुस्सा ज्यादा होता है. सच और अफवाहों में भेद करने की उसकी समझ धुंधली हो जाती है और गुस्सा उसके वजूद को जकड़ लेता है. पूर्वग्रह उसमें जड़ फैला लेते हैं. उससे डील करने के लिए भी अतिरिक्त धैर्य, अतिरिक्त कोशिश और लगातार संवाद की जरूरत होती है.
हां, हमारा लोकतंत्र आदर्श नहीं है. इसमें कई कमियां हैं. छत्तीसगढ़, मणिपुर और दूसरी तमाम जगहों में बहुत कुछ ऐसा है जिसे ठीक करने की जरूरत है. वहां के लोगों को भी लगता है कि दुख भौगोलिक हो गया है. ये भी सच है कि किसी भी क्षेत्र में जब कोई सैन्य बल आता है तो वो कई असामान्य दुखद अलोकतांत्रिक चीज़ें अपने साथ लेकर आता है. किसी अशांत क्षेत्र को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. पर कोई तो वजह होगी कि एक देश अपने ही एक हिस्से में सेना भेजता है?
'वो रैंडमली चूज़ नहीं करता. वो बंगाल में क्यों नहीं भेजता? बिहार में क्यों नहीं?' 'बावजूद इसके फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो लोकतांत्रिक है !' 'फिर भारत में बैठा आम नागरिक क्यों हमारी आवाजों को नहीं सुनता?'
मैंने कहा, 'शायद इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि जब एक लाख से ज्यादा लोगों को यहां से भगाया जा रहा था, तब आप चुप बैठे थे? उन्हें ये मैसेज गया कि आप सिर्फ एक धर्म के लोगों का समूह बनाना चाहते हैं. आपकी ओर से, अवाम की ओर से या आपके नुमाइंदों की ओर से कभी उनकी वापसी के लिए किसी भी मंच से कोई मजबूत संदेश नहीं गया. इससे ये फील गई कि आप भी इसमें मौन सहमति रखते हैं. डायलॉग प्रोसेस में जो सबसे बड़ा "ब्रीच" है वो यही है.
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'पर वहां अल्पसंख्यकों के साथ सौतेला व्यवहार होता है?' उनमें से एक बोली. मैंने उनसे पूछा कि क्या वे जानती हैं कि हिंदुओं के बाद देश में बड़ी आबादी उनके मजहब की है. मैंने फिर पूछा क्या वे फिल्में देखती हैं? उन्होंने कहा, 'हां'. मैंने उनसे पूछा कि उनके फेवरेट एक्टर कौन हैं? एक ने कहा "शाहरुख़, "दूसरी ने "आमिर" और तीसरी ने "रितिक रोशन" का नाम लिया. मैंने उनसे पूछा क्या तुम्हें इन तीनों की बीवियों के नाम पता हैं? उन्होंने 'हां' में सर हिलाया . मैंने कहा, खानों की बीवियां हिंदू हैं और रोशन की बीवी मुस्लिम.
मैंने उनसे पूछा क्या उन्होंने कलाम का नाम सुना है? क्या वे किसी रईस परिवार के बच्चे थे, जो आसानी से राष्ट्रपति के पद पर पहुंच गए? दिल पर हाथ रखकर कहो तुमने पकिस्तान में ऐसा सुना है कि वहां कोई अल्पसंख्यक लोगों के दिलों पर राज करता हो? वहां अल्पसंख्यक वर्ग के एक बड़े हिस्से की मीडिया, सरकार, पार्टियों में भागीदारी हो? दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की आबादी का अनुपात किस देश में घट रहा है और किस देश में बढ़ रहा है?
क्या इससे तुम्हें नहीं लगता कि तमाम कमियों के बावजूद भारत एक आदर्श नहीं, फिर भी एक लोकतान्त्रिक देश है?
क्या वे पकिस्तान की अर्थव्यवस्था से वाकिफ हैं?
वहां शिक्षा के हालात से?
वहां स्त्रियों के हालात से?
ईशनिंदा कानून से?
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क्यों वे आत्महत्या की तरफ खड़े एक देश को चुन रहे हैं, जहां आतंकवाद एक इंडस्ट्री है. विश्व में उसकी सबसे बड़ी फैक्ट्री. गृह युद्ध में उलझे!
उनमें से एक बोली गर वे पकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहें. 'आज़ाद' होना चाहें तो?
मैंने उनसे पूछा कि क्या तुम जानते हो एक आजाद देश कैसे चलता है? उसको चलाने के लिए अर्थव्यवस्था के कुछ साधन होते हैं? क्या तुम आश्वस्त हो कि तुम्हारे आज़ाद होने के बाद चीन या पकिस्तान तुम पर कब्ज़ा नहीं करेगा? चलो मान लिया, नहीं करता? पर क्या तुम आश्वस्त होकर आज़ाद होने के बाद एक ऐसी व्यवस्था दे पाओगे जिसमें सब खुश रहें, वो एक भ्रष्टाचार मुक्त आदर्श शासन हो और समाज के आखिरी तबके को इंसाफ मिले? क्या आज़ाद होने के बाद अगर तुम्हारा कोई हिस्सा नाराज हो तो क्या तुम उसे आजाद कर दोगे?
तुम अपने घर के नाराज बच्चे को मनाने की कोशिश नहीं करते? या उसे घर छोड़कर जाने देते हो?
क्यों नहीं तुम लोग खुद हिस्सेदारी करके अपनी सरकार चुनो. अपने बाशिंदे शामिल करो और उन चीज़ों को दुरुस्त करो, जहां तुम्हें खामियां लगती हैं. लोकतान्त्रिक तरीके भी तो हैं!
"मेरा भाई लापता है 9 साल से. वो 18 का था. क्रिकेट खेलने गया था. पढ़ने में होशियार. पुलिस उठा ले गई थी!'' उनमें से एक बोली, "मेरे मामू को भी आर्मी ने उठाया था. मामी को अब तक नहीं पता वो बेवा हैं कि नहीं?" दूसरी बोली, 'पुलिस से पूछने जाओ तो भगा देती है. सरकार सुनती नहीं. आर्मी सुनेगी नहीं!'
मैं सुन्न हो जाता हूं!


और आर्मी वालों का दुख? उसका क्या?

"आपने टूल्स देखे हैं इस्तेमाल होते" आर्मी का वो ऊंचे रैंक का अफसर दोस्त मुझसे कहता है.
हम वो टूल्स हैं. ख़राब होते हैं. बदल दिए जाते हैं. सवाल पूछने की हिदायत नहीं है. देशभक्ति ड्यूटी है हमारी. कौन चाहता है अपने देशवासियों पर गोली चलाना?
वो अखबार उठाता है, जहां देश की एलीट बुद्धिजीवी समझी जाने वाली एक मोहतरमा ने जवानों की गोलीबारी के खिलाफ लिखा है.
"आज के एक एंगल" पर कैमरा रखने पर जो दिखता है, वो मुकम्मल तस्वीर नहीं है. जाने किस प्रदेश से आया है सेना का वो जवान और उसके आस-पास कोई नहीं, जो उसे पसंद करता हो. लोग उसे इंडियन डॉग कहकर गाली भी दे देते हैं. उसे एक ऐसे एरिया में घंटों खड़ा रहना पड़ता है, इस सख्त हिदायत के साथ कि गोली या बल का इस्तेमाल जब जरूरी हो, तभी करना.
वो घंटों वहां खड़ा रहता है. उसे कोई पानी भी नहीं पूछता. वो किसी पर यकीन नहीं कर सकता. 14 साल के बच्चे से लेकर औरतें तक बम विस्फोट कर सकती हैं. सोते वक़्त भी उसे मुस्तैद रहना पड़ता है. उसने अपने उन साथियों को आंखों के सामने चिथड़े उड़ते देखा है, जिनसे वो अभी एक महीने पहले मिला था. उसे याद है पिछली बार उसके तीन साथी जब मरे थे, तो पूरा भारत किसी क्रिकेट मैच की जीत के जश्न में डूबा हुआ था.
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उसके एक साथी पर जांच चल रही है. वो दो रातों से सोया नहीं था. दो दिन पहले ही पत्थरबाज़ी ने उसके माथे को दर्द से भर रखा था. उसके दाएं कान ने सुनना बंद कर रखा था. इस बार की पत्थरबाज़ी ने उसका सब्र छीन लिया था. उसने गुस्से में गोली चला दी थी. भीड़ में एक 19 साल का लड़का था.
मेरी रेजिमेंट का तीसरा जवान है, जिसके बाएं पैर में गोली लगी है और जिस वक़्त मैं आपके साथ बैठा हूं, उसके पैर को काटे जाने से पहले उसके ब्लड टेस्ट हो रहे हैं. उसकी शादी हुए अभी 6 महीने हुए हैं. उसकी आवाज में एक अजीब सी उदासी है. "हम देश के लिए मर रहे हैं और कोई हमारे दुख में शामिल होने नहीं आता." बस उसका गला रूंधा नहीं है.


किसका देश? कैसा देश? कहां है देश? मै देश ढूंढ़ रहा हूं!




पढ़ें: प्रदीपिका की कश्मीर डायरी.

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