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मोदी सरकार के चुनावी बजट और इनकम टैक्स के कन्फ्यूजन का पूरा सच

वित्त वर्ष 2022-23 में सरकार को कितना वित्तीय घाटा हुआ?

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1 फरवरी, 2023 को केंद्रीय बजट 2023-24 पेश किया गया (फोटो: PTI)

मोदी सरकार ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पूर्व अपना आखिरी पूर्ण बजट पेश कर दिया है. परंपरा रही है कि चुनाव से पहले के बजटों में आर्थिक नीति की जगह चुनावी गणित को प्राथमिकता मिलती है. क्या मोदी 2.0 का आखिरी पूर्ण बजट भी ऐसा ही है? या इसने एक नई लकीर खींचने की कोशिश की है? क्या 9 साल से लगातार राज कर रही सरकार ने अपने तय किये लक्ष्यों को पूरा किया? 7 लाख तक की आय वाले लोगों को टैक्स में छूट की तो बहुत चर्चा है, लेकिन जो लोग आयकर नहीं देते, माने हमारे देश के 96 फीसदी लोगों को इस बजट में क्या मिला?

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वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण की पहली लाइन ये थी -

''अध्यक्ष महोदय, मैं साल 2023-24 का बजट पेश कर रही हूं. ये ''अमृत काल'' का पहला बजट है. अपनी आज़ादी के 100 साल पूरे होने पर ये देश कैसा नज़र आएगा, हम उसके ब्लू-प्रिंट पर काम कर रहे हैं. हम एक समावेशी भारत चाहते हैं, जिसमें सभी का विकास हो - खासकर युवा, महिला, किसान, ओबीसी, SC और ST.''

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आज़ादी के 75 साल पूरे होने के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी अमृत काल का ज़िक्र करते रहते हैं. वहीं से ये शब्द वित्तमंत्री के भाषण में आया. अगला कीवर्ड आता है बजट भाषण के दूसरे पैराग्राफ में - ''ब्राइट स्टार'' माने चमकता सितारा. वित्तमंत्री कहती हैं कि कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत दुनियाभर की सारी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है.

इसके बाद वित्तमंत्री के बजट भाषण में 153 पैराग्राफ और आते हैं. जो पहले दो पैराग्राफ की ''कथनी'' को सरकार की ''करनी'' से जोड़ने का प्रयास करते हैं. सबकी बात यहां करना नामुमकिन है. लेकिन कुछ मुख्य बातों पर ध्यान दिया जा सकता है. चूंकि हमारी वित्तीय समझ सीमित है, इसलिए हम ज़्यादातर बातें विशेषज्ञों के हवाले से बताएंगे. कुछ बिंदुओं पर गौर कीजिए -

> अगर कर्ज़ की रकम को छोड़ दें, तो साल 2022-23 में भारत सरकार को कुल 23 लाख 30 हज़ार करोड़ की आय हुई. इसमें से 20 लाख 90 हज़ार करोड़ आपके द्वारा जमा किये अलग-अलग टैक्स से आया. सरकार का कुल खर्च था - 41 लाख 90 हज़ार करोड़. माने देश ने घाटा उठाया. लेकिन अच्छी बात ये रही कि हमारा घाटा GDP के 6.4 फीसदी के बराबर ही रहा. माने सरकार ने बीते साल के बजट में जो लक्ष्य रखा था, उसे पा लिया. कोरोना महामारी के चलते आई मंदी और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते आए दबाव के संदर्भ में देखें, तो ये अच्छी बात है कि सरकार ने घाटे का जो लक्ष्य तय किया था, उसे छू लिया. सरकार चाहती है कि साल 2025-26 तक हमारा घाटा जीडीपी के 4.5 फीसदी के बराबर आ जाए. और उसे उम्मीद है कि ये संभव है.

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> सरकार उम्मीद कर रही है कि साल 2023-24 में उसे 23 लाख 30 हज़ार करोड़ टैक्स से मिलेंगे. और कर्ज़ से इतर कुल आया होगी 27 लाख 20 हज़ार करोड़. माने सरकार का अनुमान है कि तमाम स्रोतों से उसकी आय तकरीबन 3 लाख करोड़ बढ़ेगी. और इतना ही पैसा सरकार अपने खर्च में भी बढ़ाएगी.

>ऐसे में ये देखना ज़रूरी है कि सरकार अपना खर्च बढ़ा रही है, तो कहां बढ़ा रही है. सरकार बढ़ा रही है कैपिटल एक्सपेंडीचर. कैपिटल एक्सपेंडीचर उस मद को कहते हैं, जिससे सरकार नए एसेट बनाती है. मिसाल के लिए सड़कें, रेल लाइनें, बंदरगाह आदि. इस तरह के खर्च का फायदा ये होता है कि पैसा इनमें फंसा नहीं रहता. आप 100 रुपया लगाएं, तो वो दोगुने तक रिटर्न दे सकता है. वहीं अगर आप रेवेन्यू एक्सपेंडीचर बढ़ाएं - मसलन तनख्वाह, और पुराने ढांचे को चलाने में लगने वाला खर्च, तो रिटर्न 100 से कम भी रह सकता है. इसीलिए कैपिटल एक्सपेंडीचर बढ़ने को एक अच्छा संकेत माना जाता है.

सरकार पिछले साल इस मद में कुल 10 लाख 67 हज़ार करोड़ खर्च करना चाहती थी. लेकिन खर्च कर पाई 10 लाख 53 हज़ार करोड़. लेकिन सरकार के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है. क्योंकि इस साल उसने लक्ष्य रखा है - 13 लाख 70 हज़ार करोड़. मतलब सरकार सीधे सीधे इस मद में 3 लाख करोड़ बढ़ा रही है. तो कल के अखबार में आप जिस कैपेक्स पुश की बात पढ़ेंगे, उसके पीछे यही आंकड़ा है. सरकार की मंशा साफ है - इंफ्रास्ट्रक्चर और नए असेट्स में इंवेस्ट किया जाए, ताकि सरकारी निवेश पर ज़्यादा से ज़्यादा से रिटर्न हासिल हो. पूरे बजट में सरकार इसी भावना से काम करती नज़र आती है.

अगर टैक्स स्लैब को नहीं छेड़ा गया होता, तो सस्ता मंहगा वाला हिस्सा बजट का सबसे दिलचस्प हिस्सा होता. लेकिन मोदी सरकार ने इस बार बहुत बड़े बदलाव किये हैं. सिर्फ टैक्स छूट ही नहीं दी गई है. अब तक आपके पास ऑप्शन था कि आप ओल्ड टैक्स रेजीम के हिसाब से रिटर्न भरें, जिसमें तरह तरह की छूट मिलती थी. और दूसरा तरीका था न्यू टैक्स रेजीम, जिसमें बारीक बारीक कॉलम भरने की आवश्यकता नहीं थी, सीधे एक फ्लैट रेट पर टैक्स देना होता था. भारत एक छूट प्रधान देश है, इसीलिए न्यू टैक्स रेजीम को वैसा रिस्पॉन्स नहीं मिला था. सरकार की मंशा है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग न्यू टैक्स रेजीम से जुड़ें. इसीलिए 146 वें पैराग्राफ में वित्तमंत्री ने इसके तहत टैक्स छूट की सीमा को 5 लाख से बढ़ाकर 7 लाख कर दिया था.

हालांकि अब कई जानकार ये कह रहे हैं कि अगर आपने आयकर रिटर्न में विकल्प नहीं चुना है तो आप अपने आप नई कर व्यवस्था में चले जाएंगे. लेकिन ये केवल उन्हीं लोगों के लिए फायदेमंद है, जो कोई बचत नहीं करते हैं. इसके अलावा टैक्स स्लैब में भी बदलाव किए गए हैं. नई कर व्यवस्था में इनकम टैक्स स्लैब के तहत 3 लाख रुपये तक आय पर कोई टैक्स नहीं है.
>3 से 6 लाख रुपये पर 5 प्रतिशत, 6 से 9 लाख रुपये पर 10 प्रतिशत,
>9 से 12 लाख रुपये पर 15 प्रतिशत और
>12-15 लाख रुपये तक 20 प्रतिशत और
>15 लाख रुपये से ऊपर की आय पर 30% कर लगेगा.

अब आपके मन में सवाल हो सकता है कि जब 3 से 6 लाख पर 5 फीसदी टैक्स है तो फिर 7 लाख तक नो टैक्स क्यों बोला जा रहा है? तो इसको क्लीयर कर देते हैं. 7 लाख तक कोई टैक्स नहीं लगना है. ये स्लैब उससे ऊपर के आमदनी वालों पर लागू होंगे. फर्ज कीजिए कि आपकी सैलरी 12 लाख है. तो पूरे 12 लाख रुपये तक 15%   टैक्स नहीं देना होता है. उसके शुरू के 3 लाख रुपये पर टैक्स नहीं लगता. 3 से 6 लाख तक 5 फीसदी, 6 से 9 लाख पर 10 फीसदी और उसके ऊपर 9 से 12 लाख तक पर 15 फीसदी टैक्स लगता है. इसे और आसान कर देते हैं 7 लाख तक कमाएंगे तो जीरो टैक्स, उसके ऊपर कमाते हैं तो ये स्लैब क्रमानुसार आपकी आमदनी पर लागू होने लग जाएंगे.

तो जाहिर है जिनकी आमदनी कम है, उनको इससे फायदा है. एक बात और, सरकार ने इस बजट के जरिए पूरी कोशिश ये की है कि ज्यादातर टैक्स पेयर नई स्कीम को चुनें. क्योंकि नई टैक्स रीजीम के आ जाने के बावजूद भी ज्यादातर लोग पुरानी रीजीम पर ही कायम थे. क्योंकि उसमें बचत दिखाकर ज्यादा टैक्स बचाया जा सकता है. इस एक पहल से ज़्यादा लोग New Tax System को अपना लेंगे.  80C में लोग टैक्स बचाने के लिए जो सेविंग करते थे, उन्हें उसकी ज़रूरत नहीं रह जाएगी. यानी लोग सेविंग कम करेंगे. इसका एक मतलब ये भी हुआ कि सरकार और प्राइवेट प्लेयर्स को उस सेविंग पर जो इंटरेस्ट देना पड़ता था, जो असल में सरकार का एक बड़ा खर्च था, उससे सरकार को भी कुछ राहत मिल जायेगी.

अब तक देश का माइंडसेट बचत प्रधान रहा है, कुछ जानकार मानते हैं कि 7 लाख वाले ऐलान के बाद ये माइंडसेट बदलने लगेगा. अब इसका अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, ये आने वाला वक्त ज्यादा बेहतर बता पाएगा. भारत की आबादी में से आयकर देने वालों का हिस्सा 4 फीसदी से कुछ ही ज़्यादा है. माने 96 फीसदी आबादी ऐसी है, जिसे इस टैक्स स्लैब के खेल से कोई फर्क नहीं पड़ता. बाकी लोग सरकार के बाकी कदमों से प्रभावित होते हैं, जैसे बैंकिंग सेक्टर में रिफॉर्म या फिर स्वरोज़गार के लिए चलाई गई कौशल विकास योजना, ग्रीन एनर्जी और प्राकृतिक खेती संबंधी ऐलान.

इंडियन एक्सप्रेस अखबार में आर्थिक मामलों पर इंवेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग करने वाले वरिष्ठ पत्रकार पी वैद्यनाथन ऐयर ने बजट पर एक त्वरित, किंतु गंभीर टिप्पणी लिखी है. वो लिखते हैं कि चुनाव से पहले पेश हुए इस पूर्ण बजट में पॉपुलिज़म माने लोकलुभावन योजनाओं के प्रति आग्रह देखने को नहीं मिलता है. लेकिन साथ में एक संतुलन भी. एक उम्मीद जताई गई है -  good economics isn’t necessarily bad politics. माने आर्थिक रूप से सही फैसले अनिवार्य रूप से राजनैतिक गणित खराब करें ये ज़रूरी नहीं है. इस तर्क के समर्थन में वो आगे लिखते हैं -

"सरकार ने इस बात को समझा है कि निजी क्षेत्र बड़ा खर्च करने से कतरा रहा है. इसीलिए सरकार अपने पास से पैसा खर्च कर रही है. लेकिन ये पैसा लोकलुभावन योजनाओं में नहीं बहाया जा रहा."

तो मोदी सरकार ने अपने बजट में कुछ नया करने का इरादा तो दिखाया ही है. अगर आप बजट से जुड़े और पहलुओं पर विस्तार से जानकारी चाहते हैं तो आज दिन भर चली दी लल्लनटॉप के लाइव ब्रॉडकास्ट को ज़रूर देखें. इसके हिस्से आपको हमारे एप, हमारी वेबसाइट और यूट्यूब पर मिल जाएंगे. आने वाले दिनों में बजट की और बारीक समीक्षा होगी. इसपर संसद में बहस भी होगी, जिसपर हमारी नज़र रहेगी. 

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: मोदी सरकार के चुनावी बजट और इनकम टैक्स के कन्फ्यूजन का पूरा सच

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