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पूर्वोत्तर की यात्रा पर ले जाएगी उमेश पन्त की किताब दूर दुर्गम दुरुस्त

उमेश पंत को अमेरिका के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई है

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उमेश पंत को अमेरिका के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई है
उमेश पंत को अमेरिका के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई है. उन्हें ये सम्मान ढींगरा फैमिली फाउंडेशन अमेरिका, शिवना प्रकाशन की ओर से दिया जा रहा है, यह सम्मान हर वर्ष भारतीय और प्रवासी हिंदी साहित्यकारों को उनकी श्रेष्ठ कृतियों के लिए दिया जाता है. उमेश पंत को यह पुरस्कार पूर्वोत्तर पर आधारित उनके यात्रा वृत्तांत ‘दूर दुर्गम दुरुस्त’ के लिए दिया जा रह है. आइए पढ़ते हैं उनकी इस किताब के कुछ अंश. अंकुर को मैंने किसी तरह होटल के कमरे से बाहर निकलने के लिए मनाया. मैं घूमने को लेकर जितना उत्साहित था वो उतना ही उदासीन. बड़ी ज़िद करने पर वो किसी तरह मान गया और हम ओला कैब करके निकल गए. हमने तय किया कि पहले हम कामाख्या मन्दिर जाएँगे. उसके बाद वापस लौटकर लंच करेंगे. इस बीच तय हुआ कि लंच अंकुर की शिलांग से आ रही एक दोस्त के साथ किया जाएगा और लोकल होने के नाते वो जहाँ हमें ले जाएगी हम चल पड़ेंगे. कैब ने हमें क़रीब घंटे भर में कामाख्या मन्दिर के पास पहुँचा दिया. दिन चढ़ चुका था. मुख्य सड़क से एक सीमेंटेड रास्ता हमें मन्दिर तक ले आया. यहाँ बहुत गर्मी थी और बहुत ज़्यादा भीड़ भी. यहाँ इतनी लम्बी लाइन थी कि हमने मन्दिर को बाहर से ही निहार लेने से सन्तुष्ट हो जाना तय किया. भगवान में हम दोनों की ही आस्था नहीं थी. हमारे पितृसत्तात्मक देश में यह मन्दिर एक अपवाद की तरह ही है. जहाँ एक ओर रजस्वला महिलाएँ हमारे यहाँ इतनी अपवित्र समझी जाती हैं कि इन दिनों उनका मन्दिरों में प्रवेश तक वर्जित हो जाता है. गाँवों में तो इन दिनों उन्हें छूने तक से लोग अपवित्र मान लिए जाते हैं. मेरे गाँव के व्यक्तिगत अनुभवों में ऐसी दक़ियानूसी मान्यताओं को अपनाना शामिल रहा है. मासिकधर्म के दौरान महिलाओं को कोई ग़लती से छू दे तो उस व्यक्ति को गाय का मूत्र छिड़ककर पवित्र किया जाता था. एक ओर धर्म की यह पितृसत्तात्मक सत्ता है, जहाँ महिलाओं को देवदासी बनाकर समर्पित कर देने जैसी कुप्रथाएँ आज तक प्रचलित हैं, वहीं कामाख्या देवी के इस मन्दिर में एक रजस्वला महिला की पूजा की जाती है. इस मन्दिर में औरत के शक्ति रूप की उपासना की जाती है. देश के हर मन्दिर की तरह इस मन्दिर की भी एक कहानी है. माना जाता है भगवान शिव और सती की शादी हुई तो इससे सती के पिता दक्ष एकदम ख़ुश नहीं थे. उन्होंने एक हवन किया जिसमें सती और शिव दोनों को नहीं बुलाया गया. सती फिर भी इस यज्ञ में पहुँच गईं. वहाँ दक्ष ने सती और उनके पति दोनों का बहुत अपमान किया. इससे नाराज़ होकर सती यज्ञ के हवन में कूद गईं. जब शिव को इसका पता चला तो वे यहाँ आ धमके. उन्होंने सती के शव को उठाया और ग़ुस्से में वहाँ से लौट गए. ग़ुस्सा इतना था कि वो शव को हाथ में लेकर तांडव नृत्य करने लगे. शिव जी के तांडव से पूरी सृष्टि काँपने लगी तो भगवान विष्णु को बीच में आना पड़ा. उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए. सती के शव के 51 टुकड़े हुए जिनमें से योनि और गर्भ वाला हिस्सा नीलांचल पर्वत पर आकर गिरा. इसी वजह से यहाँ कामाख्या देवी का मन्दिर बनाया गया. माना जाता है कि जून के महीने में तीन दिन कामाख्या माता रजस्वला होती हैं और मन्दिर के पास में बने कुंड में पानी की जगह रक्त बहने लगता है. इस समय यहाँ अंबुवाची मेला होता है. जो लोग इन बातों पर भरोसा नहीं करते वो मानते हैं कि इस समय यहाँ इतना सिंदूर चढ़ाया जाता है जिस वजह से पानी लाल हो जाता है. मन्दिर के कपाट बन्द होने से पहले यहाँ सफ़ेद कपड़ा बिछाया जाता है और यहाँ आए श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में लाल कपड़ा दिया जाता है. इसे अंबुवाची प्रसाद कहा जाता है. मान्यता है कि यह कपड़ा माता के रक्त से लाल हुआ है. यह भी रोचक है कि मन्दिर में कोई मूर्ति नहीं है. एक चट्टान है जिसमें योनि का आकार बना हुआ है. 17वीं सदी में बिहार के राजा नारा नारायणा ने यह मन्दिर बनाया और अब देशभर से यहाँ लोगों का जमावड़ा लगा रहता है. धार्मिक आख्यानों को इतिहास मानने के पक्ष में मैं कभी नहीं रहा लेकिन कथाओं के तौर पर ये कई बार अचम्भित सा कर देते हैं. इन कथाओं को बाँचने वाले की रचनात्मकता, कल्पनाशीलता और तार्किकता वाक़ई बेजोड़ लगती है. जिस तरह से ये कथाएँ अलग-अलग भूगोलों को और अलग-अलग लोगों को आपस में जोड़ती हैं वह भी कमाल है. इस देश का बड़ा वर्ग यात्राओं पर निकलता ही इसलिए है क्योंकि यह उसकी धार्मिक आस्थाओं का प्रश्न बन जाता है. कैलास में भोलेनाथ के दर्शन करने दक्षिण के लोग देश के उत्तर से सीमा पार करके तिब्बत तक जा पहुँचते हैं और उत्तर के लोग इसी आस्था के चलते कन्याकुमारी तक जा पहुँचते हैं. यात्रा से जुड़ा यह पक्ष धर्म की कुछ गिनी-चुनी अच्छी बातों में शामिल लगता है मुझे. मैंने इंटरनेट पर पढ़ा था कि कामाख्या मन्दिर के आस-पास कहीं किसी पहाड़ी चोटी से पूरे गुवाहाटी शहर का सुन्दर नज़ारा दिखाई देता है. चढ़ती गर्मी में लगभग ज़बरदस्ती मैं अंकुर को अपने साथ पहाड़ की चोटी पर बने एक मन्दिर की तरफ़ ले गया. वहाँ से ब्रह्मपुत्र नदी दिखाई तो दे रही थी लेकिन मौसम खुला हुआ नहीं था. इसलिए सब कुछ एकदम उदासी से भरा हुआ लग रहा था. गुवाहाटी शहर का नज़ारा यहाँ से बारिश के बाद या शाम के वक़्त अच्छा दिखता होगा लेकिन अभी तो यहाँ आना हमें व्यर्थ लग रहा था. धूप में शरीर पसीने-पसीने अलग हो गया था. हमने लौटने का मन बनाया और कैब बुक कर ली. वापस लौटते हुए गुवाहाटी शहर के ट्रैफ़िक जाम से भी मुलाक़ात हो गई. जो सफ़र घंटे भर का था उसमें क़रीब दो घंटे लग गए. हम होटल लौट आए और अंकुर की दोस्त शीला का इन्तज़ार करने लगे जो अब बस पहुँचने ही वाली थी. शीला ने हमें एक रेस्टोरेंट में बुलाया. हम फिर से ट्रैफ़िक में फँसते हुए उस रेस्टोरेंट में पहुँचे. यहाँ लंच में शीला ने असम की थाली का ऑर्डर दिया. ताम्बे के बर्तन में क़रीने से कटोरियों में परोसी गई कई तरह की सब्ज़ियाँ थीं, चावल था. शीला ने बताया कि इनके नाम चोखा, फ़िश टेंगा, माशेर झोल, बैगुन भाजा, भात और डाइल हैं. खाने के बाद क्रूज़ पर जाने का प्लान था, जिसे गर्मी और आलस के वशीभूत होकर ‘देर हो गई है’ का बहाना बनाकर हम तीनों ने टाल दिया और तय किया कि होटल लौटकर बीयर के साथ भारत और साउथ अफ़्रीका के क्रिकेट मैच का आनन्द लिया जाएगा. शाम को बातचीत के दौरान पता चला कि शीला, दिल्ली में एमसीआरसी, जामिया की मेरी एक क्लासमेट की दोस्त रही हैं. गुवाहाटी में मिली एक अजनबी लड़की दो साल साथ पढ़ी एक सहपाठी की दोस्त निकल आई थी. लग रहा था कि दुनिया वाक़ई बहुत छोटी है.
  • पुस्तक : दूर दुर्गम दुरुस्त
  • लेखक : उमेश पन्त
  • प्रकाशक ‏ : ‎ राजकमल प्रकाशन सार्थक
  • भाषा ‏ : ‎हिंदी
  • पेपरबैक ‏ : ‎222 पेज
  • मूल्य : 210

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